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Article 324 में क्या है प्रावधान, इलेक्शन कमिश्नर अरुण गोयल का इस्तीफा संवैधानिक संकट है?

Arun Goel resigns: आम चुनावों की घोषणा से ठीक पहले चुनाव आयुक्त अरुण गोयल के इस्तीफे पर राजनीतिक विवाद छिड़ा हुआ है। विपक्ष इसे लोकतंत्र के लिए खतरा तक बहता रहा है। तानाशाही तक के आरोप लगाए जा रहे हैं। ऐसे में यह समझना जरूरी है कि संविधान में चुनाव आयुक्त और मुख्य चुनाव आयुक्त को लेकर प्रावधान क्या है?

संविधान के आर्टिकल 324 में चुनाव आयोग की व्यवस्था है। इसी में यह भी प्रावधान है कि चुनाव आयुक्त या मुख्य चुनाव आयुक्त राष्ट्रपति को इस्तीफा भेजकर अपना पद छोड़ सकता है। चुनाव आयुक्त अरुण गोयल ने उसी व्यवस्था के तहत इस्तीफा दिया है, जिसके कारण पूरी तरह से स्पष्ट नहीं हैं।

arun goel resigns

अरुण गोयल के इस्तीफे पर विवाद
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक उन्होंने 'निजी कारणों' से इस्तीफा दिया है। लेकिन, पहले उनकी जिस तरह से आईएएस से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के तुरंत बाद नियुक्ति में 'जल्दबाजी' को लेकर विवाद हुए, उसी तरह से उनके अचानक इस्तीफे ने भी राजनीतिक बवाल खड़ा कर दिया है।

आर्टिकल 324 (2) में क्या प्रावधान है?
संविधान के आर्टिकल 324 (2) में जो प्रावधान है, उसके मुताबिक चुनाव आयोग में एक मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) और उतने अन्य चुनाव आयुक्त (EC) होंगे, यदि हों, जितने राष्ट्रपति समय-समय पर तय करें।

मतलब, संविधान के मुताबिक चुनाव आयोग में मुख्य चुनाव आयोग (सीईसी) के अलावा अन्य चुनाव आयुक्त के नहीं होने से उसकी संवैधानिकता पर सवाल नहीं किया जा सकता।

आर्टिकल 324 (3) क्या है?
क्योंकि, आर्टिकल 324 (3) में यह स्पष्ट किया गया है कि अगर कोई अन्य चुनाव आयुक्त की इस तरह से नियुक्ति होती है तो मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) चुनाव आयोग (Election Commission) के चेयरमैन (Chairman) के तौर पर कार्य करेगा।

1993 से तीन सदस्यीय रहा है चुनाव आयोग
हालांकि, तथ्य यह है कि 1993 के बाद चुनाव आयोग कभी भी एक सदस्यीय नहीं रहा है। यह तब की बात है जब सीईसी के तौर पर टीएन शेषन मौजूद थे।

उन्होंने जिस तरह से चुनाव सुधार लागू किए और चुनाव आयोग को वास्तव में सरकार से स्वतंत्र एक संवैधानिक संस्था के रूप में स्थापित किया था, उससे तत्कालीन कांग्रेस सरकार से उनकी जोरदार तरीके से ठन गई थी।

शेषन पर नियंत्रण के लिए दो अतिरिक्त चुनाव आयुक्तों की हुई थी नियुक्ति!
तब कांग्रेस सरकार ने आर्टिकल 342 (2)[3] के प्रावधान के तहत एक अध्यादेश के जरिए मुख्य चुनाव आयुक्त के अलावा दो अतिरिक्त चुनाव आयुक्तों की भी नियुक्ति कर दी थी। ये चुनाव आयुक्त थे- एमएस गिल और जीवीजी कृष्णमूर्ति।

शेषन ने सरकार के अध्यादेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि संविधान के तहत एक या अधिक अतिरिक्त चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की जा सकती है।

उसी के बाद से तीन सदस्यीय चुनाव आयोग की परंपरा चल पड़ी, जिसका चेयरमैन मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) होता है।

अभी भी हो सकती है चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति
अभी की स्थिति ये है कि गोयल से पहले चुनाव आयुक्त अनूप चंद्र पांडे पिछले महीने ही 65 साल के होने पर रिटायर हो चुके हैं। उनका पद खाली ही था कि गोयल ने अचानक इस्तीफा दे दिया।

क्या अभी हो सकती है चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति?
हालांकि, सरकार चाहे तो अभी भी चुनाव तारीखों की घोषणा से पहले चुनाव आयुक्तों के दोनों खाली पदों पर नियुक्तियां कर सकती है। लेकिन, इसकी प्रक्रिया बहुत तेजी से पूरी करनी होगी

इसके लिए पहले दोनों पदों के लिए कुछ नाम छांटने पड़ेंगे, जिसपर फैसला प्रधानमंत्री की अगुवाई वाला एक तीन सदस्यीय पैनल लेगा। सीईसी और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति वाला यह कानून पिछले साल के आखिर में ही संसद से पास हुआ है।

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इसमें प्रधानमंत्री के अलावा उनकी ओर से नियुक्त एक केंद्रीय मंत्री और लोकसभा में नेता विपक्ष या सबसे बड़े विरोधी दल के नेता शामिल होंगे।

लेकिन, आम चुनावों की घोषणा से ठीक पहले इस तरह की नियुक्ति को लेकर प्रश्नचिन्ह लगना स्वाभाविक है। इससे पहले 2020 में एक और चुनाव आयुक्त अशोक लवासा भी इसी तरह से मुख्य चुनाव आयुक्त बनने से पहले ही अपना पद छोड़ चुके हैं।

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