कब बुझेगी भारतीय संघीय ढांचे में लगी ‘आग'?
एक तो किसान अपनी समस्याओं की वजह से आत्महत्याएं कर रहे हैं, दूसरे सरकारी तंत्र इन्हें गोलियां भी मार रहा है। सवाल यह यह है कि देश के संघीय स्वरूप में लगी आग आखिर कब बुझेगी। इसका स्थायी निदान क्या है?
दिल्ली। आजादी के बाद 26 जनवरी, 1950 को देश में संविधान लागू होने के साथ ही एक राष्ट्रीय संघीय संरचना भी स्थापित हुई, जिसमें राज्यों के कर्तव्य व अधिकार को परिभाषित किया गया। यूं कहें कि देश के उत्थान में राज्यों की भूमिका को बिल्कुल कमतर नहीं आंका जा सकता। यानी देश के संघीय ढांचे में राज्यों की भूमिका को भी बेहद खास माना गया। आज देश के कई राज्यों में अलग-अलग मुद्दे पर आंदोलन की आग लगी हुई है। इन मुद्दों पर राजनीतिक दल खूब राजनीति कर रहे हैं। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि इस सुन्दर संघीय ढांचे वाले भारत का चेहरा कुरूप हो चुका है। वरना, भारत में किसानों की आत्म हत्याएं इतना संगीन मामला नहीं बनती। सरकार की तरफ से सुप्रीम कोर्ट को दिए आंकड़ों से साफ होता है कि देश में हर साल 12 हजार से ज्यादा किसान आत्महत्या कर रहे हैं।
सरकार के अनुसार 2015 में कृषि क्षेत्र से जुड़े कुल 12,602 लोगों ने आत्महत्या की। इनमें 8,007 किसान-उत्पादक थे जबकि 4,595 लोग कृषि संबंधी श्रमिक के तौर पर काम कर रहे थे। 2015 में भारत में कुल 1,33,623 आत्म हत्याओं में से अपनी जान लेने वाले 9.4 प्रतिशत किसान थे। 2015 में सबसे ज्यादा 4,291 किसानों ने महाराष्ट्र में आत्महत्या की जबकि 1,569 आत्महत्याओं के साथ कर्नाटक दूसरे स्थान पर रहा। इसके बाद तेलंगाना में 1400, मध्य प्रदेश में 1,290, छत्तीसगढ़ में 954, आंध्र प्रदेश में 916 और तमिलनाडु में 606 किसानों ने आत्महत्या की। 2014 में आत्महत्या करने वाले किसानों की संख्या 12,360 और 2013 में 11,772 थी। यह इसलिए बताना पड़ रहा है कि एक तो किसान अपनी समस्याओं की वजह से आत्महत्याएं कर रहे हैं, दूसरे सरकारी तंत्र इन्हें गोलियां भी मार रहा है। सवाल यह यह है कि देश के संघीय स्वरूप में लगी आग आखिर कब बुझेगी। इसका स्थायी निदान क्या है।

पहले मारो, फिर मुआवजा देने की सियासत
आपको बता दें कि भारत एक विशाल और विविधतापूर्ण देश होने के कारण संविधान-निर्माताओं के द्वारा यहां संघात्मक शासन की स्थापना करना उपयुक्त समझा गया, लेकिन संविधान-निर्माता इतिहास के इस तथ्य से भी परिचित थे कि भारत में जब-जब केन्द्रीय सत्ता दुर्बल होगी, तब-तब एकता भंग होगी। उसे तमाम समस्याओं से जूझना पड़ेगा। इसके अतिरिक्त, संविधान-निर्माता यह भी जानते थे कि वर्तमान में सभी संघात्मक राज्यों में विविध उपायों से केन्द्रीय सत्ता को पहले से अधिक शक्तिशाली बनाने का प्रयत्न किया जा रहा है। अतः संघात्मक व्यवस्था को अपनाते हुए भी संविधान-निर्माताओं ने केन्द्रीय सत्ता को अधिक शक्तिशाली बनाना उचित समझा। बावजूद इसके राज्यों को कमतर नहीं आंका गया। इन्हें ही भारतीय संघ की विशेषताएं कहा जा सकता है। राज्य वित्तीय दृष्टि से आत्मनिर्भर होने के स्थान पर केन्द्र पर निर्भर हैं। केन्द्र के द्वारा राज्यों को विभिन्न प्रकार के अनुदान आदि दिये जाते हैं और आर्थिक सहायता के कारण केन्द्र राज्य पर छाया रहता है। पर, स्थिति बिल्कुल प्रतिकूल सी प्रतीत हो रही है। इसे केन्द्रीय सत्ता की कमजोर बागडोर ही कहेंगे कि देश के कई राज्यों में अलग-अलग मुद्दों पर आग लगी हुई है। हिंसक झड़पें हो रही हैं। लोग मारे जा रहे हैं। दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि संबंधित सरकारें मुआवजे की सियासत कर रही है। यानी पहले मारो, फिर मुआवजा देकर जनता को अपने पक्ष में कर लो। यह कितना दुर्भाग्यपूर्ण है।

मंदसौर आंदोलन में आधा दर्जन किसानों की मौत
मध्यप्रदेश के मंदसौर जिले में पिछले कई दिनों से आंदोलन कर रहे किसानों पर पिछले दिनों हुई पुलिस फायरिंग में आधा दर्जन किसानों की मौत हो गई और दर्जन भर घायल हो गए। ये आंदोलनकारी अपनी फसलों के वाजिब दाम देने और कर्जमाफी वगैरह की मांग कर रहे थे। गौरतलब है कि देश के कई राज्यों में किसान कर्जमाफी की मांग कर रहे हैं। तमिलनाडु, महाराष्ट्र जैसे राज्य मंल भी किसान आंदोलित हैं। मध्यप्रदेश में किसान कई मांगों को लेकर पहली जून से ही मंदसौर और उसके आसपास आंदोलन कर रहे थे। यह सरकार की अदूरदर्शिता ही कही जाएगी कि उसने समय रहते किसानों से बातचीत करने की कोई कारगर पहल नहीं की, जिससे उनके बीच आक्रोश बढ़ता गया। आखिरकार किसानों का भारी जमावड़ा हो गया। वे शांति मार्च निकाल रहे थे, लेकिन वहां मौजूद सुरक्षा बलों को देखते ही भड़क गए। पहले तो किसानों ने कई वाहनों को आग लगा दी। उन्हें काबू करने के लिए सुरक्षा बलों ने गोली चलाई, जिसमें छह लोगों की मौत हुई और दर्जनभर घायल हो गए। सीएम शिवराज सिंह चौहान ने सभी मृतकों के परिजन को एक-एक करोड़ रुपए और घायलों को दस-दस लाख रुपए देने तथा मुफ्त इलाज कराने की घोषणा की है। साथ ही घटना की न्यायिक जांच के आदेश भी दिए हैं। इस घटना का चिंताजनक पहलू यह रहा कि प्रदेश के गृहमंत्री भूपेंद्र सिंह शुरू में कहते रहे कि पुलिस की तरफ से कोई गोली नहीं चलाई गई, बल्कि भीड़ में अराजक तत्त्वों की गोली से किसान मारे गए। हालांकि बाद में उन्होंने भी स्वीकारा कि पुलिस ने गोली चलाई। मध्यप्रदेश को पिछले पांच वर्ष से कृषि कर्मण्य अवार्ड प्राप्त हो रहे हैं, सरकार इसे अपनी उपलब्धियों के ढोल के रूप में बजा रही है। अब शर्मिंदगी उठानी पड़ रही है।

किसी से छिपी नहीं है देश में किसानों की बदहाली
पूरे देश में किसानों की बदहाली किसी से छिपी नहीं है। महाराष्ट्र, पंजाब, आंध्रप्रदेश समेत तमाम राज्यों में किसान लंबे समय से आत्महत्या कर रहे हैं। कहीं बाढ़ तो कहीं सूखा जैसी प्राकृतिक आपदा तो कहीं सरकारी नीतियों की वजह से देश के किसान तबाही के कगार पर हैं। सीमांत और मझोले किसानों की स्थिति ये है कि वे खेती से अपनी लागत भी नहीं वसूल पा रहे हैं। ऐसे में किसानों को सरकारों के आगे हाथ फैलाने के अलावा कोई चारा नहीं है। किसानों का कहना है कि जब कारपोरेट घरानों की कर्जमाफी का सवाल आता है तो सरकार जरा भी नहीं हिचकती, लेकिन जैसे ही किसानों की बात आती है, सरकारें लाठी-गोली पर उतर आती हैं। लोकतांत्रिक व्यवस्था में आंदोलन व हड़ताल एक हथियार की तरह उपयोग किए जाते हैं। ये एक क्रमबद्ध प्रक्रिया की तरह होते हैं। किसानों को अपना एक स्वतंत्र संगठन बनाकर समग्र नीतियों के संदर्भ में अपनी समस्याओं के कारणों का विश्लेषण करना चाहिए जिनमें महंगे कर्ज, खाद, बीज, कीटनाशक दवाओं, बिजली, पानी आदि का महंगा होना, पेटेंटीकरण की नीति, एकाधिकार, कृषि आयात की मात्रात्मक सीमा की समाप्ति की नीति आदि सम्मिलित हैं। इन नीतियों में सुधार, भंडारण सुविधाओं का विस्तार व कृषि उपज के लागत मूल्य का 150 प्रतिशत दाम व कृषि उत्पाद की प्रसंस्करण इकाइयों की स्थापना किसान आंदोलन के प्रमुख मुद्दे होने चाहिए। किसी आंदोलन के पूर्व पूरी तैयारी और आंदोलन में क्रमबद्धता होनी चाहिए वरना दिशाभ्रम का खतरा भी बना रहेगा।

अलग-अलग राज्यों में चल रहे आंदोलन
उधर, महाराष्ट्र की अलग समस्या है। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस द्वारा कर्ज माफी के वादे के बाद महाराष्ट्र में किसानों की हड़ताल जारी रही। हड़ताल को समाप्त करने में विफल राज्य सरकार पर उसके साथी भी हमलावर हैं। राज्य व केंद्र की सत्ता में भाजपा की सहयोगी शिवसेना ने जहां सरकार पर किसानों के प्रति बेपरवाह होने का आरोप लगाया है तो वहीं स्वाभिमानी शेतकरी संघटना ने महाराष्ट्र में गठबंधन सरकार से बाहर होने की धमकी दी है। विपक्षी दलों के साथ-साथ सहयोगी दलों के भी किसानों का समर्थन करने से इस मुद्दे पर फडणवीस अलग-थलग पड़ गए हैं। फडणवीस ने बीते दिनों कहा था कि 31 अक्टबूर से पहले किसानों के कर्ज माफी का फैसला हो जाएगा जो महाराष्ट्र के इतिहास में सबसे बड़ी ऋण माफी होगी। उन्होंने कहा कि वह किसानों से बातचीत के लिए तैयार हैं, बिचौलियों से नहीं। मुख्यमंत्री को भरोसा था कि उनके इस बयान के बाद हड़ताल समाप्त हो जाएगी लेकिन किसान पूर्ण कर्ज माफी की मांग पर अड़े हुए हैं। अब पश्चिम बंगाल को ही लीजिए, यहां भाषा विकराल रूप ले रही है। दरअसल, बंगाल की सीएम ममता बनर्जी के राज्य के स्कूलों में बंगाली पढ़ाए जाने को अनिवार्य किए जाने के फैसले के खिलाफ हो रहा प्रदर्शन हिंसक हो गया है। इस मुद्दे के खिलाफ गोरखा जनमुक्ति मोर्चा पूरे पहाड़ी इलाके में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन कर रही है। गोरखा जनमुक्ति मोर्चा की मांग है कि नेपाली को भाषा के रूप में पढ़ाया जाए या हिंदी पढ़ाया जाए, लेकिन गोरखा जन मुक्ति मोर्चा ममता के निर्णय के बिल्कुल खिलाफ है। जीजेएम के हजारों समर्थकों काले झंडों के साथ सड़कों पर उतर आए हैं। बहरहाल, देश की स्थितियां अनुकूल नहीं हैं। इसी तरह तरह देश के अनेक राज्य अलग-अलग मुद्दों पर आंदोलन की आग में झुलस रहे हैं। देखना क्या होता है।
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