'अल्‍लाह के काम को अंजाम देने गया था इराक'

मुंबई। अभी आपने पढ़ा (CLICK ON PREVIOUS)कि क्‍यों आरिफ को लगने लगा था कि आईएसआईएस कुरान की पाक बातों को गंदा कर रहा है। अब पढ़ें कि जब आरिफ को यह महसूस होने लगा था तो वह क्‍योंं इराक जाकर आईएसआईएस में शामिल हो गया।

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अल्‍लाह के लिए गया इराक

इंडियन एजेंसियों के लिए आरिफ को वतन वापस लाना आसान काम नहीं था। उनका एक भी गलत कदम आरिफ की जान तक ले सकता था। एजेंसी के कुछ अधिकारियों को यहां तक की तुर्की रवाना किया गया ताकि वह आरिफ के साथ संपर्क कर सकें।

एनआईए की ओर से पूछताछ आरिफ से की जा रही है, उससे साफ लगा है कि आरिफ काफी परेशान है। आरिफ ने एजेंसियों को बताया है कि वह इराक अल्‍लाह के काम को अंजाम देने के लिए गया था। उसे लगता था कि आईएसआईएस ही उसकी इस ख्‍वाहिश को पूरा कर सकता है और उसे एक सही प्‍लेटफाफार्म दे सकता है। लेकिन हकीकत कुछ और ही थी।

आरिफ को इस बात का अहसास हो गया कि अब उसे अपने आपको बचाना होगा। न सिर्फ खुद को बल्कि उसके साथ जो बाकी लोग हैं, वह भी इसी बात को महससू करने लगे थे। आरिफ की मानें तो आईएसआईएस में शामिल होने से पहले वह इस बात को महससू करने लगा था कि आईएसआईएस ही वह संगठन है जो शरिया के कानूनों को आगे बढ़ा सकता है। इसी वजह से वह इस संगठन को हिस्‍सा बना।

माजिद ने अपने पूरे सफर को याद करते हुए बताया कि इराक और सीरिया में भारतीयों को अलग ही काम करने को दिए जाते हैं। सूत्रों की ओर से दी गई जानकारी पर अगर यकीन करें तो माजिद को इस बात का पूरा भरोसा था कि आईएसआईएस एक इस्‍लामिक स्‍टेट की स्‍थापना करेगा। धीरे-धीरे वह डरने लगा और संगठन से ऊब गया। एजेंसियों की मानें तो माजिद का केस वह केस है जो इस बात को कायम करता है कि दूर के ढोल हमेशा ही सुहावने नजर आते हैं।

आईबी के मुताबिक आरिफ पूछताछ में कभी एकदम जिद्दी लड़के की तरह बर्ताव करता तो कभी वह एकदम उदास हो जाता है। माजिद कई बातों को लेकर खासा कंफ्यूज है।

घर वापसी के लिए रोता था आरिफ

आईबी के सूत्रों की मानें तो आईएसआईएस का हिस्‍सा बनने से इंटरनेट के जरिए माजिद और उसके बाकी साथियों का ब्रेन वॉश किया गया।आईबी रोजाना इनकी परिवार वालों से हो रही बातचीत पर नजर रखती थी।

जब कभी भी आरिफ अपने घर वालों से बात करता वापस आने को बोलता और खूब रोता। आईबी के एक अधिकारी के मुताबिक कल्‍याण के रहने वाले ये चारों युवक इराक पहुंचने के बाद उनकी नजर से गायब हो गए।

इन लोगों को उस कैंप में रखा गया जिसे सिर्फ भारत से आने वाले लोगों के लिए ही रखा गया था। इन लोगों को कुछ दिनों तक ट्रेनिंग भी दी गई। जैसे ही इन लोगों ने काम करना शुरू किया इन्‍हें लगने लगा कि स्थितियां बिल्‍कुल विपरीत हैं।

ये लोग उन कामों को कर रहे थे जिसकी उम्‍मीद इन्‍हें कभी नहीं थी। जब लड़ाई और गंभीर हो गई तो भी इन्‍हें किसी भी तरह का कोई आदेश नहीं मिला। लड़ाई में यह एक-दूसरे को छिपाते थे लेकिन हवाई हमले और लगातार फायरिंग जारी थी।

इस फायरिंग में माजिद को भी चोट लगी और माजिद के शरीर पर इस चोट के निशान भी मौजूद हैं। माजिद चोट के लिए डॉक्‍टरों की मदद लेने के लिए तुर्की पहुंचा। यही वह समय था जब सबको लगा कि वह मारा गया है। 20 दिन पहले आरिफ ने अपने परिवार में फोन किया। वह फोन पर रो रहा था और उसने अपने घरवालों को कहा कि वह उसे यहां से निकाल लें।

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