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क्या लिंगायत के लिए अलग धर्म का दर्जा चाहने वाले हिंदू हैं?

ये एक ऐसी बहस है जिसको लेकर कर्नाटक में काफ़ी खून ख़राबा हो चुका है.

मगर विधानसभा के चुनावों से ठीक पहले जब कांग्रेस की सरकार ने लिंगायत को अलग धर्म के रूप में मान्यता देने की सिफ़ारिश अपने मंत्रिमंडल के ज़रिए की तो राजनीतिक हलकों में इसे लेकर काफी हलचल शुरू हो गयी.

लिंगायतों का मानना है कि वो हिंदू नहीं हैं क्योंकि उनका पूजा करने का तरीका हिंदुओं से बिलकुल अलग है. वो निराकार शिव की आराधना करते हैं. वो मंदिर नहीं जाते और ना ही मूर्ति की पूजा करते हैं.

वीरशैव लिंगायत और लिंगायतों में क्या अंतर है?

शिव मूर्ति की पूजा करने वाले लिंगायत कौन?

लिंगायतों में ही एक पंथ वीरेशैव लिंगायत का है जो शिव की मूर्ति की पूजा भी करता है और अपने गले में लिंग धारण भी करता है. वीरेशैवा पंथ के लिंगायत हिंदू धर्म से अलग होने का विरोध करते आ रहे हैं.

वीरेशैवा पंथ की शुरुआत जगत गुरू रेनुकाचार्य ने की. उन्होंने पांच पीठों की स्थापना की जैसे आदि शंकराचार्य ने की थी. इन पांच पीठों में से सबसे महत्वपूर्ण मठ चिकमंगलूर का रंभापूरी मठ है.

इतिहासकार संगमेश सवादातीमठ ने 13वीं शताब्दी के कन्नड़ कवि हरिहर के हवाले से बताया कि वीरेशैवा पंथ काफ़ी प्राचीन है.

वो कहते हैं कि पंथ के संस्थापक जगतगुरु रेनुकाचार्य का उदय आंध्रप्रदेश के कोल्लिपक्का गावं में सोमेश्वर लिंग से हुआ था.

जगत गुरु रेनुकाचार्य के बारे में शिवयोगी शिवाचार्य ने भी लिखा है और संस्कृत में लिखे कई दस्तावेज़ मौजूद हैं जिससे पता चलता है कि वीरेशैवा पंथ के मानने वाले लोग किस तरह उपासना करते हैं.

वो लिंग धारण भी करते हैं और शिव की मूर्ति की पूजा भी करते हैं. वीरेशैवा वैदिक धर्मों में से एक है. मगर 12वीं शताब्दी में बस्वाचार्य का उदय हुआ जो जगतगुरु रेनुकाचार्य के अनुयायी थे.

काम को पूजा मानता है ये पंथ

हालांकि, बाद में बस्वाचार्य यानी बासवन्ना ने सनातन धर्म के विकल्प में एक पंथ खड़ा किया जिसने निराकार शिव की परिकल्पना की.

बासवन्ना ने जाति और लिंग भेद के खिलाफ़ काम करना शुरू किया. उनके वचनों में काम को ही पूजा कहा गया है.

जगतगुरु शिवमूर्ति कहते हैं कि बस्वन्ना के वचनों से प्रभावित होकर सभी जाति के लोगों ने लिंगायत धर्म को अपनाया जिसमे जाति और काम को लेकर कोई मतभेद नहीं था.

वो कहते हैं, "बस इतना कि निराकार शिव की उपासना और आडंबर के खिलाफ़ काम करना ही लिंगायत का कर्म और धर्म है."

जहां वीरेशैवा पंथ को मानने वाले जनेऊ धारण करते हैं. लिंगायत जनेऊ धारण तो नहीं करते हैं लेकिन इष्ट शिवलिंग को अपनाते हैं. उसे धारण करते हैं और उसकी उपासना करते हैं.

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लिंगायत
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वीरशैवा और बासवन्ना उपासकों में अंतर

लिंगायतों के एक महत्वपूर्ण मठ के मठाधीश शिवमूर्ति मुरुगा शरानारु ने बीबीसी से बात करते हुए कहा कि जगतगुरु बासवन्ना ने वैदिक धर्मों को ख़ारिज किया और एक अलग तरीका अपनाया.

जहाँ वीरेशैवा वेद और पुरानों पर आस्था रखते हैं लिंगायत बासवन्ना के 'शरण' यानी वचनों पर चलते हैं जो संस्कृत में नहीं बल्कि स्थानीय भाषा कन्नड़ में हैं.

जब कांग्रेस की सरकार ने लिंगायत को अलग धर्म के रूप में मान्यता देने का प्रस्ताव पारित किया, इसने सियासी गलियारों में काफ़ी उथल पुथल मचा दी.

क्योंकि लिंगायत के वोटों के दम पर बी एस येदुरप्पा ने कर्नाटक में भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनाने में कामयाबी हासिल की.

फिर जब उन्होंने भाजपा से बग़ावत की तो पार्टी को सत्ता गंवानी पड़ी.

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लिंगायत के अलग धर्म बनने की राजनीति

2011 की जनगणना के अनुसार कर्नाटक में लिंगायत समाज की आबादी 17 प्रतिशत बतायी जाती है जिसमे वीरशैवा को भी शामिल किया गया है.

हालांकि, वीरेशैवा पंथ के अनुयायी तीन से चार प्रतिशत तक होने के अनुमान हैं.

वीरेशैवा पंथ के सबसे महत्वपूर्ण मठ रंभापूरी मठ के मठाधीश जगतगुरु वीरा सोमेश्वराचार्य भग्वात्पदारु ने बीबीसी से बात करते हुए कहा कि वीरेशैवा और लिंगायत शिव के उपासक हैं इसलिए सभी एक हैं.

हाल के सरकार के फैसले पर चर्चा करते हुए उन्होंने कहा, "यह धर्म का स्थान है. यहाँ धर्म की बात होती है. धर्म का प्रचार होता है. यहाँ किसी राजनीतिक दल या नेता का प्रचार नहीं होता. ये लोगों की आस्था का स्थान है."

रंभापूरी मठ के संयोजक रवि का कहना था कि कैसे लिंगायत खुद को हिंदू नहीं बताते जबकि वो भी शिव की आराधना करते हैं.

मगर लिंगायत पीठाधीशों के संयोजक एस एम जामदार कहते हैं कि यह द्वन्द हमेशा रहा है कि लिंगायत वीरेशैवा हैं. मगर ऐसा नहीं है. लिंगायत वीरेशैवा से बिलकुल अलग हैं और उनके पूजा और उपासना के तरीके भी हिंदुओं से अलग हैं.

बंगलुरु में लिंगायत महाधिपतियों के सम्मलेन में जब सारे मठाधीशों ने कांग्रेस के समर्थन की घोषणा की तो इस मुद्दे पर एक बार फिर बहस छिड़ गयी कि लिंगायत हिंदू हैं या नहीं.

224 सीटों वाली कर्नाटक की विधान सभा में लगभग 100 ऐसी सीटें हैं जिन पर लिंगायतों का प्रभाव है.

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केंद्र के पाले में गेंद

विश्लेषकों का मानना है कि मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने लिंगायत को अलग धर्म के रूप में मान्यता देने का प्रस्ताव अपने मंत्रिमंडल से पारित करवाकर गेंद केंद्र सरकार के पाले में डाल दी है.

अब भाजपा कांग्रेस की इस चाल में फंसती नज़र आ रही है क्योंकि अगर वो राज्य सरकार के प्रस्ताव को ख़ारिज कर देती है तो लिंगायतों की नाराजगी का सामना उसे करना पड़ सकता है.

और अगर प्रस्ताव को मंज़ूरी दे दी जाती है तो कांग्रेस इसका श्रेय लेने की कोशिश करेगी.

ये भी शतरंज के शह और मात वाली चाल जैसी ही है.

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