असम: ग्वालपाड़ा में क्या 'पुलिस कार्रवाई' से परेशान हो लोगों ने तोड़ा मदरसा? - ग्राउंड रिपोर्ट

असम के कुछ मदरसों में कथित तौर पर 'जिहादी गतिविधियों' का लिंक सामने आने के बाद सरकार लगातार कार्रवाई कर रही है.

ऐसे में असम पुलिस ने दावा किया है कि ग्वालपाड़ा ज़िले के पाखिउरा चर इलाके के दरगाह अलगा गांव में मंगलवार को स्थानीय लोगों ने 'जिहादी गतिविधियों' के लिए कथित तौर पर इस्तेमाल किए जाने के विरोध में एक मदरसे और उससे सटे घर को खुद ही ध्वस्त कर दिया.

Are people upset by the police action in Gwalpara, broke the madrasa?

दरअसल असम पुलिस ने पिछले महीने 20 अगस्त को जिहादी गतिविधियों में शामिल होने के आरोप में माटिया थाना अंतर्गत टिलापारा नतुन मस्जिद के इमाम जलालुद्दीन शेख को गिरफ़्तार किया था.

ग्वालपाड़ा पुलिस का दावा है कि जलालुद्दीन ने दरगाह अलगा गांव के मदरसे में दो फरार बांग्लादेशी नागरिकों को शिक्षक के पद पर रखा था. पुलिस के मुताबिक़ अमीनुल इस्लाम और जहांगीर आलम नामक दोनों संदिग्ध बांग्लादेशी लोग चरमपंथी संगठन अंसारुल्लाह बांग्ला टीम (एबीटी) के सदस्य थे और मदरसे से सटे एक टीन और बांस से बने कच्चे मकान में रहते थे. जब उन दोनों संदिग्धों के बारे में छानबीन शुरू हुई तो वे वहां से फ़रार हो गए.

पुलिस ने जलालुद्दीन के साथ उस मामले में मोरनोई थाना क्षेत्र के तिनकुनिया शांतिपुर मस्जिद के इमाम अब्दुस सुभान को भी गिरफ़्तार किया है.

इससे कुछ दिन पहले अर्थात 27 जुलाई को पुलिस ने दरगाह अलगा गांव के 22 साल के अब्बास अली को एबीटी के एक सदस्य को अपने घर पर आश्रय देने के आरोप में गिरफ़्तार किया था. अब्बास अली पर उस संदिग्ध बांग्लादेशी को एक सिम कार्ड और लॉजिस्टिक सपोर्ट देने के भी आरोप लगे हैं.

गाँव के लोग पूछताछ से परेशान

जब से दरगाह अलगा गांव के मदरसे में पुलिस को जिहादी लिंक मिला है उस समय से गांव के कई लोगों से पूछताछ की जा रही है. इस गांव के कुछ लोगों का कहना है कि मदरसे में दो संदिग्ध बांग्लादेशी नागरिक को पकड़ने को लेकर जब से पुलिस कार्रवाई कर रही है गांव वाले बहुत परेशान हैं.

पाखिउरा चर इलाके में बसे (नदी के बीच का रेतीला इलाका) इस गांव की आबादी करीब 500 है जहां सौ फीसदी बंगाली मूल के मुसलमान बसे हुए हैं. ग्वालपाड़ा शहर से इस गांव तक पहुंचने के लिए नदी पार करनी होती है.

दरगाह अलगा गांव से ताल्लुक रखने वाले जहान अली (बदला हुआ नाम) ने मंगलवार को स्थानीय लोगों द्वारा गांव के मदरसे को तोड़ने के बारे में बीबीसी से कहा,"जब से गांव के मदरसे में जिहादी गतिविधियों के आरोप लगे हैं और कुछ लोगों की गिरफ्तारी हुई है उस समय से यहां के लोग काफी परेशान हैं."

"यह चर इलाके में बसा एक बहुत छोटा सा गांव है. यहां लोग इतने पढ़े-लिखे नहीं है.ज्यादातर दिहाड़ी मजदूरी और किसानी का काम करके अपना गुजारा करते हैं. इसलिए किसी ने भी नहीं सोचा कि मदरसे में पढ़ाने वाले लोगों का किसी जिहादी संगठन से संबंध होगा. या फिर वो लोग बांग्लादेशी नागरिक हैं. जब उनकी पहचान का मामला सामने आया तो वे फ़रार हो गए. इसके बाद से गांव के लोगों से पूछताछ हो रही है."

"इस मामले में मेरे मौसा,मौसी और एक मामा से भी पुलिस ने पूछताछ की है. पुलिस ने गांव के और भी आठ-दस लोगों को पूछताछ के लिए थाने में कई बार बुलाया था. लिहाजा गांव के लोगों ने हाल ही में आपस में एक बैठक कर खुद ही इस मदरसे को तोड़ने का फ़ैसला किया. इस तरह गांव के लोगों ने कल (मंगलवार) दिन के करीब 10 बजे मदरसे के साथ बने उस कच्चे मकान और रसोई को ध्वस्त कर दिया जिसमें वो दोनों संदिग्ध नागरिक रहते थे."

एक सवाल का जवाब देते हुए जहान अली कहते है, "हम गांव वाले किसी भी जिहादी का समर्थन नहीं करते. हम चाहते हैं कि पुलिस ऐसे लोगों के ख़िलाफ़ कड़ी कार्रवाई करें. परंतु गांव के निर्दोष लोगों को परेशान न किया जाए. जब से हमारे यहां के मदरसे में जिहादी गतिविधियों की बात सामने आई है सब परेशान हैं. इस गांव की बहुत बदनामी हुई है, लिहाजा गांव वालों ने इन तमाम परेशानियों से छुटकारा पाने के लिए खुद ही मदरसे और इसमें बने घर को तोड़ दिया. वैसे भी यह मदरसा पिछले क़रीब छह महीने से बंद पड़ा था."

तीन मदरसों को सरकार ने ढहाया

असम में जिहादी गतिविधियों में शामिल होने के आरोप में सरकार ने अबतक बोंगाईगांव, बारपेटा और मोरीगांव जिलों में तीन मदरसों को ध्वस्त कर दिया है.

वहीं पुलिस ने अल-क़ायदा भारतीय उपमहाद्वीप (एक्यूआईएस) और अंसारुल्लाह बांग्ला टीम जैसे चरमपंथी संगठनों के लिए काम करने के आरोप में एक बांग्लादेशी नागरिक समेत 37 लोगों को गिरफ़्तार किया है.

हालांकि सरकार ने मदरसों को तोड़ने के जो आदेश जारी किए है उनमें निर्माण को गैरकानूनी और मानव निवास के लिए संरचनात्मक रूप से कमजोर और असुरक्षित होने का कारण बताया है.

ग्वालपाड़ा ज़िले के दरगाह अलगा गांव में मदरसे जैसे इस्लामिक शिक्षण संस्थान को स्वैच्छिक रूप से गिराने का यह पहला उदाहरण है.

दरअसल ज़िला प्रशासन ने पिछले सप्ताह इस मदरसे को गिराने के लिए नोटिस जारी किया था. ऐसी चर्चा है कि प्रशासन के लिए भी इस अतिक्रमण को हटाने के लिए बुलडोज़र लेकर इस चर इलाके के गांव तक पहुंचना आसान नहीं था.

इस पूरे मामले में बात करते हुए ग्वालपाड़ा ज़िले के पुलिस अधीक्षक वी.वी. राकेश रेड्डी ने बीबीसी से कहा, "उस गांव के मदरसे में जो दो शिक्षक पढ़ाते थे वो दोनों बांग्लादेशी नागरिक थे और जिहादी थे. हमने उस मामले में जलालुद्दीन को गिरफ़्तार किया था. गांव में जिस मदरसे को वहां के लोगों ने कल तोड़ा है उसमें प्रशासन की कोई भूमिका नहीं थी. जब वहां के लोगों को पता चला कि गांव के मदरसे में जलालुद्दीन जिन दो लोगों को शिक्षक बनाकर लाया था वो बांग्लादेशी थे और जिहादी थे तो लोगों ने स्वेच्छा से ही उस मदरसे और वहां बने घर को ध्वस्त कर दिया."

पुलिस की कार्रवाई के डर से गांव वालों द्वारा मदरसे को तोड़ने के एक सवाल का जवाब देते हुए पुलिस अधीक्षक रेड्डी ने कहा,"ऐसी कोई बात नहीं है. लोगों ने मदरसे को स्वेच्छा से ही तोड़ा है. बाकी जगह जो मदरसे टूटे हैं वो अन्य ज़िले के हैं उसपर मैं कोई प्रतिक्रिया नहीं दे सकता लेकिन इस मदरसे को तोड़ने को लेकर प्रशासन की कोई भूमिका नहीं थी. बल्कि गांव के लोगों ने एक मजबूत संदेश देने के लिए ऐसा किया कि वे अपने इलाके में ऐसी कोई भी देश विरोधी ताक़त का समर्थन नहीं करते."

पुलिस अधिकारी की मानें तो ग्वालपाड़ा ज़िले में सौ से अधिक निजी मदरसे चल रहे हैं और उनकी टीम मौजूदा मामलों की जांच कर रही ताकि आगे आवश्यक कार्रवाई की जा सके.

इस बीच मदरसों को तोड़ने की कार्रवाई के विरोध में ऑल असम माइनॉरिटी स्टूडेंट्स यूनियन (आम्सू) के सदस्यों ने गुवाहाटी में धरना प्रदर्शन किया.

असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा को भेजे गए एक ज्ञापन ने संगठन ने कहा कि प्रशासन द्वारा तुच्छ आधार पर धार्मिक संस्थानों को नष्ट करने से मुस्लिम समुदाय की भावनाओं को गहरा ठेस पहुंची है.

इस ज्ञापन में आम्सू ने बोंगाईगांव ज़िले में हाल ही में एक मदरसे को तोड़े जाने की घोर निंदा करते हुए मुख्यमंत्री से इस तरह की कार्रवाई को तुरंत रोकने की अपील की है.

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