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नजरियाः क्या जनता के मोहभंग से उपचुनाव हारी भाजपा?

By Bbc Hindi
मोदी और योगी
Getty Images
मोदी और योगी

उत्तर प्रदेश में भाजपा सरकार के एक साल पूरे होने के ठीक पांच दिन पहले मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को करारा झटका लगा है.

उन्हें उस गढ़ में चुनावी शिकस्त का सामना करना पड़ा है, जहां उनका और उनके गुरु महंत अवैद्यनाथ का करीब तीन दशकों तक कब्जा रहा.

योगी आदित्यनाथ ने 2014 के लोकसभा चुनाव में करीब तीन लाख वोटों से जीत हासिल की थी.

गोरखपुर ही नहीं, उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य का लोकसभा क्षेत्र फूलपुर भी भाजपा के खाते से निकल कर समाजवादी पार्टी की झोली में जा गिरा.

अखिलेश यादव
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अखिलेश यादव

योगी आदित्यनाथ और केशव प्रसाद मौर्य के मुख्यमंत्री और उप-मुख्यमंत्री बनने की वजह से ये उप चुनाव हुए थे.

चुनाव के आखिरी क्षण में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के बीच हुए समझौते ने भाजपा को गंभीर चुनौती पेश की.

भगवा ब्रिगेड की उम्मीदें तब धराशायी हो गई जब बसपा ने खुद को चुनावी मैदान से बाहर रखा और अंतिम आठ दिनों में अपने वोटरों को सपा की तरफ भेजने में कामयाबी हासिल की.

योगी सरकार के कामकाज का असर चुनावों पर पड़ा. विकास के बड़े-बड़े दावों का ख़ास असर नहीं दिखा. गोरखपुर और फूलपुर को सरकार की तरफ से कुछ नहीं मिला.

सपा और बसपा
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सपा और बसपा

मठ के लाखों अनुयायी, पर हार गई भाजपा

सरकार लोगों की जीवन में बदलाव लाने में नाकाम रही, जिससे वोटरों का मोहभंग हुआ. इसका असर यह दिखा कि दोनों जगहों पर कम वोट पड़े.

चुनाव में सिर्फ योगी आदित्यनाथ की नहीं थी बल्कि गोरखनाथ मठ की प्रतिष्ठा दाव पर थी, जिसके लाखों अनुयायियों के चलते वो पांच बार लगातार उस क्षेत्र से सांसद रहे. इससे पहले महंत अवैद्यनाथ तीन बार सांसद रहे थे.

एक-दूसरे का विरोध करने वाले सपा और बसपा के अचानक गठजोड़ ने खेल बिगाड़ दिया, जिसके लिए भाजपा पहले से तैयार नहीं थी.

दोनों पार्टियों के बीच निजी दुश्मनी इतनी गहरी थी कि मायावती मुलायम सिंह यादव से हाथ मिलाने के सुझाव का खुला विरोध करती थीं.

मायावती
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मायावती

गठबंधन की ताकत को न समझना भूल

हालांकि राजनैतिक दवाबों के चलते सपा प्रमुख अखिलेश यादव को नया अवतार लेना पड़ा और नए सिरे से मेल-मिलाप के लिए प्रयास करना पड़ा. और ये सब चुनाव के ठीक पहले किया गया.

दोनों पार्टियों के गठबंधन को भाजपा के कार्यकर्ताओं, यहां तक कि बड़े नेताओं ने भी हल्के में लिया और उसे समझने के बजाय उसका माखौल उड़ाते रहे.

पिछले महीने उपचुनाव की घोषणा के साथ ही फूलपुर चुनाव में भाजपा की जीत पर थोड़ा संदेह तो था लेकिन गोरखपुर में स्पष्ट जीत का भरोसा भाजपा नेतृत्व को था.

शायद यह सत्ता का दंभ था, जिसने दोनों जगहों के उम्मीदवार उपेंद्र दत्त शुक्ला (गोरखपुर) और कौशलेंद्र नाथ पटेल (फूलपुर) की स्पष्ट जीत का अति आत्मविश्वास दिया. दोनों जगहों पर ये उम्मीदवार काफ़ी अंतर से चुनाव हारे हैं.

केशव प्रसाद मौर्य
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केशव प्रसाद मौर्य

उपमुख्यमंत्री का दावा

साल 2012 में राजनैतिक सफर की शुरुआत करने वाले केशव प्रसाद मौर्य ने मोदी लहर में 2014 में लोकसभा चुनाव फूलपुर से जीत हासिल की थी.

वो भाजपा अध्यक्ष अमित शाह का विश्वास जीतने में सफल रहे, जिन्होंने उन्हें भाजपा का प्रदेश अध्यक्ष का पद सौंपा था. पिछले साल हुए विधानसभा चुनावों में भाजपा ने रिकॉर्ड जीत हासिल की थी. कुल 403 में से भाजपा ने 324 सीटों पर जीत दर्ज की थी.

उन्होंने पार्टी की जीत का श्रेय खुद को देना शुरू कर दिया. उनका दावा था कि उनके प्रयासों की वजह से पिछड़ी जाति का वोट भाजपा की झोली में आया.

एक लंबी रस्साकशी के बाद वो उपमुख्यमंत्री के पद पर बैठने को तैयार हुए क्योंकि वे मुख्यमंत्री पद का अरमान संजोए बैठे थे.

सपा और बसपा
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सपा और बसपा

अब सपा और बसपा का गठबंधन जाति पर आधारित वोटों के दौर की वापसी का संकेत दे रहे हैं, जिसे 2014 में नरेंद्र मोदी ने ध्वस्त करने में कामयाब रहे थे.

निश्चित तौर पर यह गठबंधन जारी रहा तो भाजपा और उसके सहयोगी दलों के लिए यह एक बड़ी चुनौती होगी, जिसने लोकसभा की 80 में से 73 सीटें जीती थीं.

हालांकि कांग्रेस ने उपचुनाव में गठबंधन से बाहर रहने का फैसला किया था.

योगी आदित्यनाथ अति आत्मविश्वास में कई बार दोनों सीटों पर हुए उपचुनावों को 2019 का रिहर्सल बताया था. अब उन्हें अपनी ग़लती का एहसास हुआ है, उन्होंने मान लिया है कि पार्टी अति-आत्मविश्वास की वजह से हारी.

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BBC Hindi
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English summary
Approach Does the BJP lose the by election disillusionment

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