Anke Gowda Padma Shri: बस कंडक्टर से पद्मश्री तक, पढ़ने की ऐसी दीवानगी कि बनाई10 लाख किताबों की लाइब्रेरी
Anke Gowda Padma Shri: गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर केंद्र सरकार ने पद्म अवॉर्ड का ऐलान किया है। इस बार भी सरकार ने अलग-अलग क्षेत्रों में जमीनी स्तर पर काम करने वाले कई लोगों को सम्मानित किया है। कर्नाटक के मंड्या जिले से आने वाले अंके गौड़ा भी इसमें शामिल हैं। उन्होंने ज्ञान और किताबों के लिए अपने प्रेम की मिसाल कायम की है।
कभी बस कंडक्टर की नौकरी करने वाले अंके गौड़ा को भारत सरकार ने साहित्य और शिक्षा के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए पद्मश्री सम्मान से नवाजा है। अंके गौड़ा ने अपनी पूरी जिंदगी ज्ञान के प्रसार के लिए समर्पित कर दी। उन्होंने मंड्या में 'पुस्तका माने' यानी किताबों का घर नाम से एक अनोखी लाइब्रेरी की स्थापना की है।

Anke Gowda Padma Shri: कंडक्टर की नौकरी करते हुए बनाई लाइब्रेरी
बस कंडक्टर की नौकरी के दौरान भी अंके गौड़ा किताबों से अपना रिश्ता नहीं तोड़ पाए। उनकी इस निजी लाइब्रेरी में 10 लाख से अधिक किताबें मौजूद हैं, जिनमें 22 भारतीय और विदेशी भाषाओं की पुस्तकें शामिल हैं। कंडक्टर की नौकरी करते हुए उन्होंने अपनी सीमित आमदनी का बड़ा हिस्सा किताबें खरीदने में लगाया। धीरे-धीरे उनका निजी संग्रह इतना बड़ा हो गया कि उन्होंने इसे आम लोगों के लिए खोलने का फैसला किया। आज छात्र, शोधार्थी और पुस्तक प्रेमी बिना किसी शुल्क के किताबें पढ़ सकते हैं। अंके गौड़ा का मानना है कि किताबें समाज को बेहतर बनाने का सबसे सशक्त माध्यम हैं।
Anke Gowda ने घर और जमीन भी समर्पित की लाइब्रेरी को
अंके गौड़ा के लिए पढ़ना और ज्ञान कभी भी व्यावसायिक हितों के लिए नहीं था। उन्होंने कभी इसे व्यापार बनाने की कोशिश नहीं की। यहां तक कि किताबों के लिए उन्होंने अपने घर, जमीन और संसाधनों तक को ज्ञान के इस मंदिर के लिए समर्पित कर दिया। यही वजह है कि लोग उन्हें 'ज्ञान का संरक्षक' भी कहते हैं। भारत सरकार के उन्हें पद्मश्री दिए जाने की घोषणा के बाद पूरे कर्नाटक में खुशी की लहर है। साहित्य और शिक्षा जगत से जुड़े लोगों ने इसे जमीनी स्तर पर किए गए प्रयासों की जीत बताया है।
अंके गौड़ा की कहानी आज के युवाओं के लिए एक प्रेरणा है। उन्होंने साबित कर दिया कि बड़े बदलाव के लिए सिर्फ डिग्री की जरूरत नहीं थी। बड़ी सोच और निष्ठा से भी बदलाव किया जा सकता है। बस कंडक्टर से पद्मश्री सम्मान तक का उनका सफर यह संदेश देता है कि अगर उद्देश्य नेक हो, तो एक व्यक्ति भी पूरे समाज की दिशा बदल सकता है।












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