Andhra Pradesh: यहां कांग्रेस को मिलते हैं नोटा से भी कम वोट, फिर भाई के खिलाफ बहन को लड़ाने में किसका फायदा?
कर्नाटक और तेलंगाना में सरकार बना लेने के बाद कांग्रेस पार्टी आंध्र प्रदेश में भी जल्द से जल्द सत्ता हथिया लेने के लिए बेचैन दिख रही है। इसी का नतीजा है कि पार्टी ने 50 वर्षीय वाईएस शर्मिला की पार्टी का न सिर्फ कांग्रेस में विलय कराया है, बल्कि आते ही उन्हें मौजूदा प्रदेश अध्यक्ष की जगह नया अध्यक्ष भी बना दिया है।
आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री और वाईएसआर कांग्रेस पार्टी के नेता जगन मोहन रेड्डी और वाईएस शर्मिला रेड्डी भाई-बहन हैं। दोनों ही संयुक्त आंध्र प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और दिग्गज कांग्रेसी वाईएस राजशेखर रेड्डी (YSR) की संतानें हैं।

यूपीए की सरकार बनवाने में वाईएसआर की थी अहम भूमिका
कांग्रेस के लिए वाईएसआर की विरासत कितनी अहम है, इसका अंदाजा इसी बात से लगता है कि केंद्र में दो-दो बार यूपीए की सरकार बनाने में उनका यही रोल था, कि तब संयुक्त आंध्र प्रदेश में उनकी अगुवाई में दोनों बार कांग्रेस को 30 से ज्यादा सीटें मिली थीं।
2009 में हेलीकॉप्टर दुर्घटना में निधन से पहले तक आंध्र प्रदेश की राजनीति से लेकर दिल्ली दरबार तक वाईएसआर का ऐसा दबदबा बन चुका था कि कई जानकार उन्हें कांग्रेस आला कमान के लिए भविष्य की चुनौती की तरह देखने लगे थे। वह राज्य में बहुत ज्यादा लोकप्रिय हो चुके थे।
वाईएसआर के निधन के बाद कांग्रेस से बिगड़ने लगे जगन के रिश्ते
लेकिन, वाईएसआर के निधन ने एक झटके में सबकुछ बदल दिया। कांग्रेस नेतृत्व के साथ उनके बेटे वाईएस जगन मोहन रेड्डी के रिश्ते में बहुत ज्यादा कड़वाहट आने लगी। भ्रष्टाचार के आरोपों में उन्हें जेल में डाल दिया गया।
कांग्रेस नेतृत्व से बगावत कर बनाई थी नई पार्टी
तब जाकर उन्होंने कांग्रेस की तत्कालीन अध्यक्ष सोनिया गांधी पर परिवार को प्रताड़ित करने का आरोप लगाते हुए पिता के नाम पर वाईएसआर कांग्रेस पार्टी बना ली।
आंध्र प्रदेश के विभाजन के चलते कांग्रेस की तबाही शुरू हो गई
कांग्रेस को मालूम था कि आंध्र में उसके वोट बैंक का आधार वाईएसआर की लोकप्रियता थी। जगन मोहन रेड्डी की बगावत के चलते संभावित जनाधार खिसकने के डर से मनमोहन सरकार ने आनन-फानन में आंध्र प्रदेश के विभाजन को हरी झंडी दे दी।
जगन को करीब 16 महीने जेल में गुजरानी पड़ी। उनके लिए बहन शर्मिला ने 3,000 किलोमीटर का पैदल मार्च भी निकाला। सहानुभूति जगन के साथ जुड़ता गया। कांग्रेस की तबाही शुरू हो चुकी थी।
कांग्रेस को दोनों चुनावों में मिले नोटा से भी कम वोट
2019 में हुए लोकसभा और आंध्र प्रदेश विधानसभा दोनों चुनावों में कांग्रेस की औकात घटकर नोटा से भी कम की रह गई। राज्य बंटवारे का जख्म और वाईएसआर के परिवार के साथ उसके कथित सलूक ने मतदाताओं को उससे पूरी तरह से दूर करके रख दिया।
उस साल लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को महज 1.3% वोट मिले तो नोटा के पक्ष में 1.5% वोट पड़े थे। वहीं विधानसभा चुनावों में कांग्रेस किसी तरह से 1.17% वोट जुटा सकी तो नोटा के लिए मतदान करने वालों का शेयर 1.28% रहा।
जगन रेड्डी के सामने भी समस्याएं शुरू हुईं
लेकिन, बीते पांच वर्षों के कार्यकाल के दौरान सीएम जगन मोहन रेड्डी के खिलाफ भी एंटी-इंकंबेंसी फैक्टर के पैदा होने की आशंका पैदा हुई है। इसलिए, उन्होंने कुछ सीटों पर उम्मीदवार बदलने के भी संकते दिए ताकि इस समस्या से निपटा जा सके।
लेकिन, अब उनके परिवार में भी लड़ाई शुरू हो चुकी है। बहन शर्मिला और मां विजयलक्ष्मी उनसे नाराज हो गईं।
शर्मिला ने पहले तेलंगाना में राजनीति चमकाने की कोशिश की थी लेकिन, नाकाम रहीं। पहले परिवार की प्रतिष्ठा को देखते हुए मां के कहने पर भाई के खिलाफ राजनीति से दूर रहना चाहती थीं।
लेकिन, अब हालात बदल चुके हैं। उधर राजशेखर रेड्डी के भाई की हत्या को लेकर भी परिवार के बीच से ही मुख्यमंत्री जगन के खिलाफ नाराजगी बढ़ी है।
कांग्रेस की नजर वाईएसआर की लोकप्रियता भुनाने पर
कांग्रेस ने इन्हीं सारी परिस्थितियों को देखते हुए वाईएस शर्मिला पर दांव लगाया है। पार्टी को लगता है कि अगर जगन रेड्डी के खिलाफ माहौल बनेगा तो वाईएसआर के नाम पर मिलने वाला वोट उनकी बेटी शर्मिला के नाम आ सकता है।
माना जाता है कि मुसलमान, ईसाई और दलितों की माला जाति जगन मोहन रेड्डी की पार्टी का बहुत बड़ा वोट बैंक है, जिसे अपने पक्ष में मोड़ने का कांग्रेस बेहतरीन मौका देख रही है। कहा जाता है कि बीजेपी का डर दिखाकर कर्नाटक और तेलंगाना में भी वह मुस्लिम वोट अपने पक्ष में करने में सफल हो चुकी है।
आंध्र प्रदेश की राजनीति में बहुत अहम फैक्टर हैं चंद्रबाबू नायडू
लेकिन, आंध्र प्रदेश की राजनीति में एक और मजबूत किरदार भी है, जिसे वाईएसआर परिवार के आंतरिक विवाद और जगन रेड्डी सरकार के खिलाफ एंटी-इंकंबेंसी का फायदा मिल सकता है।
ये हैं टीडीपी नेता चंद्रबाबू नायडू। हाल में भ्रष्टाचार के मामले में उनकी गिरफ्तारी ने भी अपने लिए सहानुभूति बटोरने का अवसर दिया है।
तथ्य यह है कि आंध्र प्रदेश में सत्ताधारी पार्टी के बाद टीडीपी ही सबसे मजबूत पार्टी है और वही प्रमुख विपक्ष भी है, जिसके पास संयुक्त आंध्र प्रदेश में सरकार चलाने का लंबा अनुभव है। यही नहीं, चंद्रबाबू की छवि भी विकास करने वाले नेता की रही है।
वाईएसआर के नाम पर वोट विभाजन से मिल सकता है टीडीपी को फायदा
पिछले लोकसभा चुनाव में भी टीडीपी को राज्य में 40% से ज्यादा वोट मिले थे और वह 25 में से 3 सीट भी जीती थी। वहीं विधानसभा चुनावों में भी पार्टी को 39% वोट मिले थे और वह 175 से 23 सीटें जीतकर मुख्य विपक्षी पार्टी बनी थी।
मतलब, शर्मिला अपने पिता के नाम पर जितना भी वोट कांग्रेस के खाते में डलवाएंगी, वाईएसआईसीपी को नुकसान होगा। ऐसे में इसका फायदा पूरी तरह से टीडीपी ज्यादा उठा सकती है।












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