आंध्र प्रदेश: राज्य विभाजन के बाद पहला चुनाव, चंद्रबाबू और जगनमोहन की अग्निपरीक्षा

नई दिल्ली- आंध्र प्रदेश से तेलंगाना के विभाजन के बाद आंध्र प्रदेश में पहला चुनाव होने जा रहा है। राज्य में एक साथ लोकसभा की 25 और विधानसभा की 175 सीटों पर चुनाव हो रहे हैं। इस चुनाव में राज्य के मुख्यमंत्री और टीडीपी सुप्रीमो चंद्रबाबू नायडू एवं वाईएसआर कांग्रेस पार्टी के नेता जगनमोहन रेड्डी की राजनीतिक किस्मत दांव पर लगी हुई है। कुछ समय पहले तक लग रहा था कि आंध्र के विशेष राज्य का दर्जा सबसे बड़ा राजनीतिक मुद्दा साबित हो सकता है। लेकिन, पिछले कुछ महीनों में प्रदेश की राजनीति लोकलुभावन वादों और ऐलानों में सिमट कर रह गई है। ऐसे में जगनमोहन रेड्डी का कई वर्षों के जमीनी संघर्ष एवं नए रियाती वादों का पिटारा काम करेगा या जनता चंद्रबाबू के लोकलुभावन योजनाओं की चासनी में लपेटी गई राजनीति पर यकीन करेगी, कहना बहुत मुश्किल है। लेकिन, फिलहाल इतना तो तय ही लग रहा है कि इस लड़ाई में कांग्रेस कहीं नहीं दिख रही है और बीजेपी कितना प्रभाव डालेगी यह अंदाजा लगाना भी दूर की कौड़ी है।

टीडीपी के लिए गेमचेंजर साबित हो सकती हैं घोषणाएं

टीडीपी के लिए गेमचेंजर साबित हो सकती हैं घोषणाएं

इंडियन एक्सप्रेस की खबर के मुताबिक परंपरागत तौर पर आंध्र में पश्चिम और पूर्वी गोदावरी जिलों में जो पार्टी जीतती है, राज्य में उसी की सरकार बनती है। पूर्वी गोदावरी जिले में 19 विधानसभा और 3 लोकसभा एवं पश्चिमी में 3 लोकसभा और 15 विधानसभा सीटें हैं। इन दोनों जिलों के अलावा कृष्णा जिले की राजनीतिक स्थिति भी पिछले एक साल में पूरी तरह पलट चुकी है। पहले चरण में ही 11 अप्रैल को राज्य में विधानसभा और लोकसभा के लिए वोटिंग होनी है। लेकिन, अब यहां कोई भी विशेष दर्जा या चंद्रबाबू के वर्ल्ड क्लास राजधानी के बारे में चर्चा नहीं कर रहा है। अब चर्चा सिर्फ इस बात की है कि पिछले दो-ढाई महीने में घोषित राज्य सरकार की लोकलुभावन योजनाओं का लाभ किसे मिला है और कौन उनसे वंचित रह गए हैं? इसके अलावा दूर-दराज के गांवों में नायडू ने जो इंफ्रास्ट्रक्चर के काम कराए हैं, वह भी लोगों पर असर डालने की स्थिति में है।

माना जा रहा है कि टीडीपी के लिए जो योजना एक बड़ा गेमचेंजर साबित हो सकता है, उसमें लोगों को 2 कमरों वाला घर देने वाली योजना शामिल है। राज्य सरकार का दावा है कि पिछले 4 वर्षों में इसके तहत 11 लाख घर दिए गए हैं। जबकि, पिछले साल फरवरी में बुजुर्गों के लिए शुरू की गई 2,000 रुपये की पेंशन योजना, पिछड़े वर्गों,अनुसूचित जातियों-जनजातियों और ब्राह्मणों के लिए सब्सिडी आधारित लोन की व्यवस्था भी टीडीपी के हक में जाती दिख रही है। ऊपर से महिला स्वयं सहायता समूहों को 10,000 रुपये और स्मार्ट फोन देने की योजना भी नायडू सरकार के इंकम्बेंसी फैक्टर को कम कर सकता है। इसके अलावा अन्नदाता सुखीभव योजना के तहत किसानों को सालाना 10,000 रुपये दिए जाने के पिछले महीने हुए ऐलान से नायडू की हवा बन सकती है। हालांकि, आरोप है कि इन योजनाओं का फायदा देने में जबर्दस्त तरीके से भेदभाव की गई है और पिछड़ों एवं एससी-एसटी वर्ग की घनघोर अनदेखी की गई है। हालांकि, टीडीपी इन आरोपों को सिरे से खारिज कर रही है। गौरतलब है कि राज्य की लगभग 50% आबादी पिछड़े वर्ग की है। इस वर्ग पर टीडीपी और वाईआरएससीपी दोनों की पकड़ है।

जगनमोहन की सियासी चुनौती

जगनमोहन की सियासी चुनौती

आंध्र प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में जगनमोहन रेड्डी का जबर्दस्त जनाधार माना जाता है। चुनावों के मद्देनजर उनकी पार्टी ने भी वादों का पिटारा खोलने में कोई कमी नहीं छोड़ी है। उनकी पार्टी ने 'नवरत्नालु' या 9 कल्याणकारी योजनाओं का वादा किया है। इसमें किसानों को सालाना 50,000 रुपये की सहायता, ग्रैजुएशन तक के छात्रों की पढ़ाई का खर्च, योग्य लाभार्थियों को 1,000 रुपये से अधिक के इलाज का खर्च, शराब पर बैन, बच्चों को स्कूल भेजने में प्रोत्साहन देने के लिए महिलाओं को 15,000 रुपये की सहायता, को-ऑपरेटिव सोसाइटी से लोन ले चुकी महिलाओं की ऋण माफी और 50,000 रुपये तक ब्याज रहित लोन, 45 साल से ज्यादा उम्र की पिछड़ी,एससी,एसटी वर्ग की महिलाओं को 4 साल तक 75,000 रुपये, 5 साल में 25 लाख से ज्यादा घरों का निर्माण, पेंशन पाने की आयु 65 से 60 वर्ष करने, गरीब बुजुर्गों को 2,000 रुपये मासिक पेंशन और दिव्यांगों को 3,000 रुपये की मासिक पेंशन देने जैसे वादे शामिल हैं।

दरअसल, जगन को भरोसा है कि उनके पैतृक गांव इदुपलापाया से शुरू की गई प्रजा संकल्प यात्रा से उनका एक व्यापक जनाधार तैयार हुआ है। 14 महीनों से ज्यादा समय में उन्होंने पैदल चलकर 3,648 किलोमीटर की दूरी पूरी की, जिसमें राज्य के 13 जिलों को कवर किया गया। ये यात्रा 6 नवंबर, 2017 को शुरू हुई थी। इस यात्रा ने जगन को कुछ उसी तरह की लोकप्रियता दिलाने में मदद की है, जैसी उनके पिता ने बनाई थी। 2004 में वाई एस आर रेड्डी ने राज्य में 1,400 किलोमीटर की पदयात्रा की थी, जिसके बाद कांग्रेस प्रचंड बहुमत के साथ राज्य की सत्ता पर काबिज हुई थी। जगनमोहन रेड्डी की पार्टी के नेताओं का दावा है कि अपनी पदयात्रा के दौरान उन्होंने राज्य के 3 करोड़ से ज्यादा लोगों से सीधा संपर्क किया है।

जनता में लोकप्रिय होने के बावजूद जगन की दिक्कत ये है कि वे पार्टी को एकजुट रखने में असफल रहे। 2014 में सिर्फ 2% वोट की कमी के चलते उनके हाथ में सत्ता आते-आते रह गई थी। लेकिन, उस चुनाव के बाद उनकी पार्टी के 24 विधायक टीडीपी में शामिल हो गए थे। हालांकि, पिछले कुछ समय में जिस तरह से करीब दर्जन भर टीडीपी विधायक और दूसरे पार्टी के 15 से ज्यादा विधायक और सांसद उनके साथ जुड़े हैं, उसने उनका सियासी हौसला जरूर बढ़ा दिया है।

लेकिन, जगन की सबसे बड़ी मुश्किल ये है कि उन पर टीआरएस के चंद्रशेखर राव से हाथ मिलाने का ठप्पा लग चुका है। दरअसल आंध्र में तेलंगाना के मुख्यमंत्री के खिलाफ आज भी इतनी ज्यादा नाराजगी है कि जिससे जगन को भी भारी नुकसान पहुंच सकता है। आरोप तो यहां तक लगते हैं कि वाईएसआरसीपी को टीआरएस से आर्थिक सहायता भी मिल रही है। अगर जगन इन आरोपों को जनता की नजर में दूर नहीं कर पाए, तो उनको इसका खामियाजा भी भुगतना पड़ सकता है। ऐसे में चंद्रबाबू एक बार फिर से अपनी खोयी हुई राजनीतिक जमीन आसानी से हासिल कर सकते हैं।

कांग्रेस का खिसकता जनाधार

कांग्रेस का खिसकता जनाधार

अखबार के मुताबिक आंध्र प्रदेश से कांग्रेस के लिए अच्छी खबर नहीं है। चुनाव में कुछ ही दिन बचे हैं, लेकिन पार्टी आंध्र में कहीं नजर नहीं आती। उसे आंध्र के लोग राज्य विभाजन का जिम्मेदार मानते हैं और इसी के कारण पार्टी राज्य में अपना जनाधार लगभग गंवा चुकी है। 2014 में पार्टी न तो लोकसभा में और न ही विधानसभा में एक भी सीट जीत पाई थी और उसे केवल 2.7% वोट ही मिल पाए थे। वैसे कांग्रेस के स्थानीय नेताओं का मानना है कि राष्ट्रीय नेताओं की रैलियों के बाद पार्टी की किस्मत जरूर पलटेगी। गौरतलब है कि राज्य के विभाजन से पहले 2004 में कांग्रेस कुल 294 विधानसभा में से 185 और 43 लोकसभा सीटों में से 30 सीटें जीत गई थी। 2009 में भी पार्टी को क्रमश: 156 एवं 33 सीटों पर सफलता मिली थी। लेकिन, अब विभाजन ने उसे ऐसा जख्म दिया है, जिससे उबरना उसके लिए नाममुकिन लग रहा है।

वहीं, बीजेपी की बात करें तो वह प्रयास तो बहुत कर रही है, लेकिन फिलहाल राज्य में उसके लिए ज्यादा संभावनाएं नजर नहीं आतीं। 2014 में पार्टी को यहां 7.2% वोट मिले थे और पार्टी 2 लोकसभा और 4 विधानसभा क्षेत्रों में जीतने में कामयाब हुई थी। लेकिन, तब उसका टीडीपी के साथ गठबंधन था। वैसे पार्टी के लिए 29 मार्च को कुरनूल से पीएम मोदी ही चुनाव प्रचार का आगाज कर चुके हैं और प्रदेश के नेताओं को भरोसा है वह पूरे राज्य में अच्छा प्रदर्शन करेगी।

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