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2019 में किसका विनिंग फार्मूला अपनाएंगे राहुल गांधी, नेहरू-इंदिरा-राजीव या मां सोनिया गांधी?

By Yogender Kumar
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    नई दिल्‍ली। कांग्रेस अध्‍यक्ष बनने के बाद राहुल गांधी की सबसे बड़ी अग्निपरीक्षा 2019 लोकसभा चुनाव में होने वाली है। गुजरात चुनाव में कांग्रेस का अच्‍छा प्रदर्शन और उपचुनावों में बीजेपी की लगातार हार ने कांग्रेस समर्थकों में 2019 के लिए एक उम्‍मीद जगाई है। हालांकि, इस बात को कांग्रेस के रणनीतिकार भी मान रहे हैं कि मोदी लहर की तरह राहुल गांधी सुनामी का 2019 में आना अब भी मुश्किल है। हालांकि, राजनीति में नामुमकिन कुछ भी नहीं, लेकिन हिंदी हार्टलैंड में दशकों से पिछड़ने के कारण राहुल गांधी सुनामी का आना मुश्किल जरूर है। ऐसे में कांग्रेस के पास सीमित ताकत का बेहतर इस्‍तेमाल कर क्षेत्रीय दलों को आगे कर मोदी-शाह से निपटने का एकमात्र विकल्‍प बचा है। मतलब 2019 में उन 130 से 150 सीटों पर ध्‍यान केंद्रित करना पड़ेगा, जहां उसके पास ज्‍यादा ताकत है। कांग्रेस अध्‍यक्ष के तौर पर राहुल गांधी भी कांग्रेस पार्टी की चुनावी रणनीति पर काम कर रहे हैं। क्‍या है राहुल गांधी की रणनीति और क्‍या हैं उनकी चुनौतियां? विस्‍तार से चर्चा से करते हैं।

    तीन दशक से कांग्रेस को टक्‍कर दे रहा हिंदुत्‍व

    तीन दशक से कांग्रेस को टक्‍कर दे रहा हिंदुत्‍व

    करीब तीन दशक से कांग्रेस पार्टी हिंदुत्‍व का सामना कर रही है। यह बात सच है कि कांग्रेस इस दौरान कई बार सत्‍ता में रही, लेकिन सबसे अहम बात यह है कि वह एक बार अपने दम पर सरकार नहीं बना सकी। उसके हाथ से एक के बाद एक राज्‍य खिसकते गए। अब नौबत यह है कि उसके पास गिने-चुने राज्‍यों में सत्‍ता बची है। 1990 के राम मंदिर आंदोलन से लेकर 2014 की मोदी लहर और उसके बाद 2019 तक कांग्रेस को हिंदुत्‍व से ही टक्‍कर लेनी है। ऐसा नहीं है कि हिंदुत्‍व का तीर विपक्ष के तरकश में 30 साल पहले अचानक से आ गया था। विचाधारा के इस द्वंद्व से जवाहर लाल नेहरू और इंदिरा गांधी को भी दो-चार होना पड़ा था, लेकिन ये फर्क सिर्फ इतना है नेहरू और इंदिरा की राजनीति में राष्‍ट्रवाद उतना ही महत्‍वपूर्ण था, जितना आज आरएसएस और बीजेपी के लिए है।

    नेहरू-इंदिरा-राजीव, आखिर किसके नक्‍शे कदम पर चलेंगे राहुल गांधी?

    नेहरू-इंदिरा-राजीव, आखिर किसके नक्‍शे कदम पर चलेंगे राहुल गांधी?

    यह बात सच है कि विविधता से भरे इस देश में कांग्रेस पार्टी ने वर्षों तक एक उदारवादी विचारधारा के नाम पर शासन किया, लेकिन अल्‍पसंख्‍यकों के तुष्‍टीकरण ने उस पर 'हिंदू विरोधी' का ठप्‍पा लगा दिया। हाल में खुद सोनिया गांधी ने भी इस बात स्‍वीकार किया। अब कांग्रेस के पास न तो हिंदुत्‍व है और न ही राष्‍ट्रवाद। घोटालों की लंबी फेहरिस्‍त ने भी कांग्रेस का काम मुश्किल कर दिया। अब सवाल है कि राहुल गांधी आखिर 2019 में ताल ठोकें तो कैसे? यह सच है कि कांग्रेस अध्‍यक्ष का पद उन्‍हें विरासत में मिला है, लेकिन विरासत के तौर पर मिले इस ताज में कांटे भी हजार हैं। अब क्‍या करेंगे राहुल गांधी? पहला काम- पार्टी में बदलाव भी जरूरी है, क्‍योंकि कांग्रेस का संगठन पुराना पड़ चुका है। दूसरा अहम कदम- मोदी विरोधी दलों का साथ भी लाना है। तीसरी बात- मोदी सरकार की नाकामी को जनता के बीच कैसे उठाया जाए? चौथी और सबसे अहम बात- क्‍या नेहरू-इंदिरा की तरह राहुल गांधी भी राष्‍ट्रवाद को अपनी राजनीति का टूल बनाएंगे या पिता राजीव गांधी की तरह उनकी भी छवि एक मॉर्डन/सॉफ्ट लीडर के तौर पर उभरकर आएगी?

      Rahul के Congress Pandava तो हो गए लेकिन बिना Shri Krishna, BJP को हरा नहीं सकते | वनइंडिया हिन्दी
      पिता राजीव के जैसी लगती है राहुल गांधी की छवि, लेकिन मां सोनिया के नक्‍शेकदम पर चलेंगे नए कांग्रेस अध्‍यक्ष

      पिता राजीव के जैसी लगती है राहुल गांधी की छवि, लेकिन मां सोनिया के नक्‍शेकदम पर चलेंगे नए कांग्रेस अध्‍यक्ष

      एक कार्यक्रम में जम्‍मू-कश्‍मीर के पूर्व सीएम फारूख अब्‍दुल्‍ला ने राजीव गांधी के चार्म का जिक्र किया था। उन्‍होंने पुराने दिन याद करते हुए कहा था कि लड़कियां उनकी एक झलक पाने को बेताब रहती थीं। युवाओं में राजीव का क्रेज था। हालांकि, राजनीति और कूटनीति पर उनकी पकड़ को लेकर उस जमाने भी खूब सवाल उठे, लेकिन कुल मिलाकर राजीव गांधी का देश की चुनावी राजनीति पर असरदार था। वह कांग्रेस पार्टी और गांधी परिवार का आखिरी चेहरा थे, जिसके नाम पर पार्टी को मतदाता ने वोट दिया। उनके बाद सबसे बड़े नेता के तौर पर नरसिम्‍हा राव ने कमान संभाली, जो कि दक्षिण भारत से थे। राव के समय से उत्‍तर भारत में कांग्रेस का सूरज अस्‍त होना शुरू हुआ और अटल-आडवाणी के नेतृत्‍व में बीजेपी का उदय। बाद में कांग्रेस की सोनिया गांधी ने संभाली, लेकिन वो कभी ऐसा चेहरा नहीं रहीं, अपने दम पर चुनावी खेल बना और बिगाड़ सकें। उनसे राजीव, इंदिरा और नेहरू जैसी राजनीति की उम्‍मीद करना भी सही नहीं होगा, लेकिन उन्‍होंने सीमित ताकत के साथ हिंदुत्‍व को टक्‍कर दी। आरएसएस विरोधी खेमे को साथ लाकर सोनिया ने कांग्रेस को 10 साल केंद्र की सत्‍ता में बनाए रखा। ऐसे में उनके पास सबसे बेहतर विकल्‍प यही है कि वह मां सोनिया गांधी की तरह मोदी विरोधी खेमे को एकजुट करें और पंजाब, महाराष्‍ट्र, मध्‍य प्रदेश, राजस्‍थान, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, हरियाणा जैसे राज्‍यों पर फोकस करें। एक बार केंद्र की सत्‍ता आने के बाद वह राज्‍यों में खोई जमीन को हासिल कर सकते हैं।

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      English summary
      analysis: whose winning strategy will rahul gandhi adopt in 2019? nehru, indira gandhi or mother sonia gandhi

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