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आंबेडकरः 'गांधी को लोग काफ़ी पहले भुला चुके होते'

By Bbc Hindi

गांधी और आंबेडकर के संबंध कैसे थे? इस सवाल पर लंबी बहसें होती रही हैं और काफ़ी कुछ कहा-सुना जा चुका है.

खुद बाबा साहब आंबेडकर ने तो गांधी को इसलिए कठघरे में खड़ा किया था कि जब आप भंगी नहीं हैं तो हमारी बात कैसे कर सकते हैं?

जवाब में गांधी ने इतना ही कहा कि इस पर तो मेरा कोई बस है नहीं लेकिन अगर भंगियों के लिए काम करने का एकमात्र आधार यही है कि कोई जन्म से भंगी है या नहीं तो मैं चाहूंगा कि मेरा अगला जन्म भंगी के घर में हो.

साल 1955 में डॉक्टर आंबेडकर ने बीबीसी को दिए एक इंटरव्यू में महात्मा गांधी के साथ अपने संबंधों और मतभेदों पर लंबी बात की थी.

https://www.youtube.com/watch?v=MO4nKp6QX1Y

बीबीसी आर्काइव से पेश इस ऐतिहासिक इंटरव्यू के कुछ अंश.

आंबेडकर: मैं 1929 में पहली बार गांधी से मिला था, एक मित्र के माध्यम से, एक कॉमन दोस्त थे, जिन्होंने गांधी को मुझसे मिलने को कहा. गांधी ने मुझे खत लिखा कि वो मुझसे मिलना चाहते हैं. इसलिए मैं उनके पास गया और उनसे मिला, ये गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने के लिए जाने से ठीक पहले की बात है.

फिर वह दूसरे दौर के गोलमेज़ सम्मेलन में आए, पहले दौर के सम्मेलन के लिए नहीं आए. उस दौरान वो वहां पांच-छह महीने रुके. उसी दौरान मैंने उनसे मुलाकात की और दूसरे गोलमेज सम्मेलन में भी उनसे मुलाकात हुई. पूना समझौते पर हस्ताक्षर करने के बाद भी उन्होंने मुझसे मिलने को कहा. लिहाजा मैं उनसे मिलने के लिए गया.

वो जेल में थे. यही वो वक्त था जब मैंने गांधी से मुलाकात की. लेकिन मैं हमेशा कहता रहा हूं कि तब मैं एक प्रतिद्वंद्वी की हैसियत से गांधी से मिला. मुझे लगता है कि मैं उन्हें अन्य लोगों की तुलना में बेहतर जानता हूं, क्योंकि उन्होंने मेरे सामने अपनी असलियत उजागर कर दी. मैं उस शख़्स के दिल में झांक सकता था.

आमतौर पर भक्तों के रूप में उनके पास जाने पर कुछ नहीं दिखता, सिवाय बाहरी आवरण के, जो उन्होंने महात्मा के रूप में ओढ़ रखा था. लेकिन मैंने उन्हें एक इंसान की हैसियत से देखा, उनके अंदर के नंगे आदमी को देखा, लिहाजा मैं कह सकता हूं कि जो लोग उनसे जुड़े थे, मैं उनके मुकाबले बेहतर समझता हूं.

बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर
BBC
बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर

सवाल: आपने जो भी देखा, उसके बारे में संक्षेप में क्या कहेंगे?

आंबेडकर: खैर, शुरू में मुझे यही कहना होगा कि मुझे आश्चर्य होता है जब बाहरी दुनिया और विशेषकर पश्चिमी दुनिया के लोग गांधी में दिलचस्पी रखते हैं. मैं समझ नहीं पा रहा हूं. वो भारत के इतिहास में एक प्रकरण था, वो कभी एक युग-निर्माता नहीं थे.

गांधी पहले से ही इस देश के लोगों के जेहन से गायब हो चुके हैं. उनकी याद इसी कारण आती है कि कांग्रेस पार्टी उनके जन्मदिन या उनके जीवन से जुड़े किसी अन्य दिन सालाना छुट्टी देती है. हर साल सप्ताह में 7 दिनों तक एक उत्सव मनाया जाता है. स्वाभाविक रूप से लोगों की स्मृति को पुनर्जीवित किया जाता है.

लेकिन मुझे लगता है कि अगर ये कृत्रिम सांस नहीं दी जाती तो गांधी को लोग काफ़ी पहले भुला चुके होते.

बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर
BBC
बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर

सवाल: क्या आपको ऐसा नहीं लगता कि उन्होंने मूलभूत बदलाव किए?

आंबेडकरः नहीं, कभी नहीं. बल्कि, वो हर समय दोहरी भूमिका निभाते थे. उन्होंने युवा भारत के सामने दो अख़बार निकाले. पहला 'हरिजन' अंग्रेजी में, और गुजरात में उन्होंने एक और अख़बार निकाला जिसे आप 'दीनबंधु' या इसी प्रकार का कुछ कहते हैं.

यदि आप इन दोनों अख़बारों को पढ़ते हैं तो आप पाएंगे कि गांधी ने किस प्रकार लोगों को धोखा दिया. अंग्रेजी समाचार पत्र में उन्होंने खुद को जाति व्यवस्था और अस्पृश्यता का विरोधी और खुद को लोकतांत्रिक बताया. लेकिन अगर आप गुजराती पत्रिका को पढ़ते हैं तो आप उन्हें अधिक रूढ़िवादी व्यक्ति के रूप में देखेंगे.

वो जाति व्यवस्था, वर्णाश्रम धर्म या सभी रूढ़िवादी सिद्धांतों के समर्थक थे, जिन्होंने भारत को हर काल में नीचे रखा है. दरअसल किसी को गांधी के 'हरिजन' में दिए गए बयान और गुजराती अख़बार में दिए उनके बयानों का तुलनात्मक अध्ययन करके उनकी जीवनी लिखनी चाहिए. गुजराती पेपर के सात खंड हैं.

पश्चिमी दुनिया सिर्फ अंग्रेज़ी पेपर पढ़ती है, जहां गांधी लोकतंत्र में विश्वास रखने वाले पश्चिमी लोगों के सम्मान में खुद को बनाए रखने के लिए लोकतांत्रिक आदर्शों की वकालत कर रहे थे. लेकिन आपको ये भी देखना होगा कि उन्होंने वास्तव में अपने स्थानीय पेपर में लोगों से क्या बात की थी.

ऐसा लगता है कि किसी ने इसका कोई संदर्भ नहीं लिया है. उनकी जितनी भी जीवनियां लिखी गई हैं, वो उनके 'हरिजन' और 'युवा भारत' पर आधारित हैं, और गांधी के गुजराती लेखन के आधार पर नहीं.

बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर
BBC
बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर

सवाल: फिर जाति संरचना में हरिजन को भगवान के रूप में प्रस्तुत करने के पीछे उनका असली इरादा क्या था?

आंबेडकर: वो सिर्फ ऐसा चाहते थे. अनुसूचित जाते के बारे में दो चीज़ें हैं. हम अस्पृश्यता समाप्त करना चाहते हैं. लेकिन साथ ही हम ये भी चाहते हैं कि कि हमें समान अवसर दिया जाना चाहिए ताकि हम अन्य वर्गों के स्तर तक पहुंच सकें. अस्पृश्यता को बिलकुल धो देना कोई अवधारणा नहीं है.

हम पिछले 2000 वर्षों से अस्पृश्यता को ढो रहे हैं. किसी ने इसके बारे में चिंता नहीं की है. हां, कुछ कमियां हैं जो बहुत हानिकारक हैं. उदाहरण के लिए लोग पानी नहीं ले सकते हैं, लोगों के पास खेती करने और अपनी आजीविका कमाने के लिए भूमि नहीं हो सकती है.

लेकिन उससे भी महत्त्वपूर्ण अन्य चीजें हैं, अर्थात् देश में उनकी स्थिति एक समान होनी चाहिए और उनके पास उच्च पदस्थ होने के अवसर भी होने चाहिए, ताकि न केवल उनकी गरिमा बढ़े, बल्कि वो रणनीतिक स्थितियों में रहते हुए अपने लोगों की रक्षा कर सकें. गांधी इस विचार के बिलकुल विरुद्ध थे, बिलकुल ख़िलाफ़.

बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर
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बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर

सवाल: वो (गांधी) मंदिर में प्रवेश होने जैसे मुद्दों से संतुष्ट थे.

आंबेडकरःवो मंदिर में प्रवेश का अधिकार देना चाहते थे. अब हिंदू मंदिरों की कोई परवाह नहीं करता. अस्पृश्य इस बात को अच्छी तरह समझ चुके हैं कि मंदिर जाने का कोई परिणाम नहीं है. वो अस्पृश्य ही बने रहेंगे, चाहे वो मंदिर जाएं अथवा नहीं. उदाहरण के लिए लोग अछूतों को रेलवे में यात्रा करने की इजाज़त नहीं देते.

अब उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि रेलवे उनके लिए अलग से कोई व्यवस्था नहीं करने जा रही. वो ट्रेन में एक साथ यात्रा करते हैं. जब भी रेल में हिंदू और अस्पृश्य साथ यात्रा करते हैं तो वो अपनी पुरानी भूमिका में होते हैं.

बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर
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बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर

सवालः तो क्या आप कहना चाहते हैं कि गांधी रूढ़िवादी हिंदू थे?

आंबेडकरः हां, वो बिलकुल रूढ़िवादी हिन्दू थे. वो कभी एक सुधारक नहीं थे. उनकी ऐसी कोई सोच नहीं थी, वो अस्पृश्यता के बारे में सिर्फ इसलिए बात करते थे कि अस्पृश्यों को कांग्रेस के साथ जोड़ सकें. ये एक बात थी. दूसरी बात, वो चाहते थे कि अस्पृश्य स्वराज की उनकी अवधारणा का विरोध न करें.

मुझे नहीं लगता कि इससे अधिक उन्होंने अस्पृश्यों के उत्थान के बारे में कुछ सोचा.

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English summary
Ambedkar Gandhi will have forgotten people long enough

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