ग्राउंड रिपोर्ट: अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में 'जनाज़े की नमाज़' पर छात्रों के झगड़े की हक़ीकत

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय
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बुधवार को अलीगढ़ विश्वविद्यालय में मेहमानों का आना-जाना लगा रहा. इनमें कई पूर्व छात्र थे जो अपने संस्थापक सर सैय्यद अहमद के जन्मदिवस को हर साल की तरह मनाने के लिए इकठ्ठा हुए थे. मगर इस बार विश्वविद्यालय के प्रांगण में उत्साह कुछ कम दिखा.

इसकी वजह भी थी. पिछले दिनों विश्वविद्यालय नए विवादों में घिरा रहा. हालांकि विश्वविद्यालय प्रशासन का दावा है कि अब स्थिति सामान्य हो गयी है.

मगर, यहाँ आने पर लगता है कि हालात के सामान्य होने में कुछ और वक़्त लग सकता है.

विश्वविद्यालय में पढ़ रहे कश्मीरी छात्रों ने धमकी दी थी कि वो संस्थापक के जन्मदिवस के दिन ही अपने प्रदेश लौट जाएंगे और अपनी डिग्रियाँ भी लौटा देंगे.

मामला तब शुरू हुआ जब विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र मनान बशीर वानी की 11 अक्तूबर को उत्तरी जम्मू-कश्मीर के कुपवाड़ा में सुरक्षा बलों के साथ हुई मुठभेड़ में मौत हो गयी थी.

वानी अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय कैंपस से एक दिन अचानक लापता हो गए थे.

वो यहाँ पीएचडी की पढाई कर रहे थे. पढाई छोड़कर उन्होंने चरमपंथी संगठन हिज़बुल मुजाहिदीन जॉइन कर लिया था. वो हिज़बुल मुजाहिदीन के कमांडर बन गए थे.

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'कश्मीरियों पर झूठे आरोप'

वानी की मौत के बाद विश्वविद्यालय में कुछ कश्मीरी छात्रों पर आरोप लगा कि उन्होंने जनाज़े की नमाज़ पढ़ने की कोशिश की थी.

इसी दौरान कश्मीरी और ग़ैर-कश्मीरी छात्रों के बीच संघर्ष की भी खबरें आयीं.

जनाज़े की नमाज़ तो नहीं हुई मगर छात्रों के बीच हुई झड़पों के बाद विश्वविद्यालय ने दो कश्मीरी छात्रों को निलंबित कर दिया जबकि नौ अन्य छात्रों को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया.

इस कार्यवाई को लेकर कश्मीरी छात्रों को लगा कि उनके साथ भेदभाव हो रहा है.

सज्जाद राठर जम्मू-कश्मीर से हैं और विश्वविद्यालय छात्र संघ के उपाध्यक्ष भी रह चुके हैं. घटना के बाद विश्वविद्यालय प्रशासन की कार्यवाई से नाराज़ होकर उन्होंने कश्मीरी छात्रों की तरफ से चिट्ठी लिखी और कहा कि 17 अक्तूबर यानी संस्थापक के जन्मदिन के मौक़े पर लगभग 1,200 कश्मीरी छात्र विश्वविद्यालय छोड़कर वापस जम्मू-कश्मीर चले जाएंगे और अपनी डिग्रियां भी वापस कर देंगे.

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बीबीसी से बात करते हुए सज्जाद ने कहा कि कश्मीरी छात्रों पर झूठे आरोप लगाकर उन्हें प्रताड़ित किया जा रहा है.

उनका कहना है कि ना तो वानी के लिए जनाज़े की नमाज़ पढ़ी गयी और ना ही आज़ादी के नारे लगाए गए.

वो कहते हैं, "विश्वविद्यालय में छात्र संघ के चुनावों को लेकर छात्रों का जगह-जगह पर एकजुट होकर आपस में बातचीत करना कोई अप्रत्याशित बात नहीं है. उस दिन भी छात्र जमा थे. सुलेमान हॉल के पास कश्मीरी छात्र भी जमा थे जब वानी के मारे जाने की खबर आयी."

"कश्मीरी छात्र अपने प्रदेश के हालात को लेकर चर्चा कर रहे थे. कुछ जनाज़े की नमाज़ भी पढना चाहते थे. मगर तब तक प्रॉक्टर का दल वहाँ पहुँच गया. उस दल के साथ ग़ैर-कश्मीरी छात्र भी थे. मना करने पर जनाज़े की नमाज़ नहीं पढ़ी गयी. मगर, हम लोगों के साथ दल के लोगों और छात्रों ने बदसुलूकी की."

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'बिना सबूत कार्रवाई'

मामला तूल पकड़ने लगा चूंकि ग़ैर-कश्मीरी छात्रों ने कश्मीरी छात्रों का विरोध करना शुरू कर दिया.

कश्मीरी छात्रों का आरोप है कि विश्वविद्यालय की कार्यवाही 'एक तरफ़ा' थी और सिर्फ़ कश्मीरी छात्रों को प्रताड़ित करने के लिए की गयी जबकि उनपर हमला करने वालों का कुछ भी नहीं हुआ.

सज्जाद का कहना था कि बिना सुबूतों के ही सारी कार्रवाई की गयी. यहाँ तक कि 'देशद्रोह' का मामला भी दायर किया गया.

इसी बीच जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने उच्च शिक्षा मंत्री प्रकाश जावडेकर और अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के कुलपति तारिक़ मंसूर से बात कर कश्मीरी छात्रों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की बात कही.

राज्यपाल की पहल पर विश्वविद्यालय ने तीन-सदस्यों वाली एक उच्च समिति का गठन किया और छात्रों का निलंबन वापस ले लिया.

इस पहल के बाद कश्मीरी छात्रों ने भी वापस लौटने की अपनी बात को वापस ले लिया.

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मामला पुलिस के पास

अब विश्वविद्यालय कह रहा है कि निलंबित किए गए छात्रों को निर्दोष पाया गया है.

हालांकि पुलिस भी मामले की जांच कर रही है क्योंकि दो छात्रों पर राष्ट्रद्रोह का मामला भी दर्ज किया गया है.

वसीम भी जम्मू कश्मीर के रहने वाले हैं और पीएचडी कर रहे हैं.

वो कहते हैं कि पिछले कुछ समय से कश्मीरी छात्र विश्वविद्यालय में असुरक्षा की भावना झेल रहे हैं. वो आरोप लगाते हैं कि जिस तरह जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय और अन्य विश्वविद्यालयों में हो रहा था, वही अब अलीगढ़ विश्वविद्यालय में भी करने की कोशिश की जा रही है.

एक अन्य कश्मीरी छात्र महबूब उल-हक़ कहते हैं कि विश्वविद्यालय प्रशासन के उकसावे पर ग़ैर कश्मीरी छात्रों ने कश्मीरी छात्रों के साथ मारपीट की थी.

उनका कहना था, ''अगर हमारे प्रोफ़ेसर हम पर हाथ उठाते तो वो हमारे माता पिता सामान हैं. मगर छात्रों को कोई हक़ नहीं बनता कि वो दुसरे छात्रों पर हाथ उठाएं.''

महबूब का कहना है कि पिछले दिनों विश्वविद्यालय में जो कुछ हुआ उससे कश्मीरी छात्रों में असुरक्षा की भावना तो पैदा हुई है, साथ में "ये भी सन्देश दिया गया की हमें चुप रहना है".

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संस्था बदनाम न हो, इसलिए कार्रवाई

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष फैज़ुल हसन पर भी कश्मीरी छात्रों के इन सब में शामिल होने का आरोप लगाया है.

मगर हसन कहते हैं कि जब कश्मीरी छात्र बात माने को तैयार नहीं हुए तो दूसरे छात्र आवेश में आ गए.

बीबीसी के साथ बातचीत के क्रम में हसन कहते हैं, ''सब मिलकर कश्मीरी छात्रों को समझा रहे थे कि जनाज़े की नमाज़ मत पढ़िए. हर कोई उनसे मान जाने का अनुरोध कर रहे थे. मगर वो जिद पर अड़े थे."

"मैं तो वहां से चला गया मगर बाद में पता चला कि जब कश्मीरी छात्र नहीं माने तो दूसरे छात्र आवेश में आ गए. इसी दौरान धक्का मुक्की भी हुई मगर तब तक हमलोग वहां पहुंचे और स्थिति को काबू में कर लिया.''

विश्वविद्यालय के प्रशासन का कहना है कि कश्मीरी छात्रों के खिलाफ जो कार्रवाई की गयी है, वो अनुशासन को देखते हुए की गयी ताकि जानी-मानी शैक्षणिक संस्था बदनाम ना हो जाए.

विश्वविद्यालय के प्रवक्ता उमर सलीम पीरज़ादा कहते हैं कि "पहली बात तो किसी भी तरह का आयोजन करने या जमावड़ा लगाने से पहले अनुमति की ज़रूरत होती है. ये एक शैक्षणिक संस्था है जहां नियम, क़ायदे बनाए गए हैं. कोई भी उनका उलंघन नहीं कर सकता है."

पीरज़ादा कहते हैं कि "तीन सदस्यों वाली उच्च समिति को मामले की जांच सौंपी गयी है और उसने अपनी रिपोर्ट भी दे दी जिसमे निलंबित किये गए छात्रों को निर्दोष पाया गया है. दुसरे छात्रों की भूमिका की जांच के बाद उन्हें भी आरोप मुक्त कर दिया जाएगा."

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मगर सज्जाद और दूसरे कश्मीरी छात्र विश्वविद्यालय पर आरोप लगाते हैं कि विश्वविद्यालय प्रशासन ने बिना सोचे समझे कार्यवाही की है.

उनका कहना है कि कई ऐसे कश्मीरी छात्र हैं, जो अपनी पढाई पूरी कर नौकरी करने दूसरे शहरों में रह रहे हैं, उनका नाम भी कारण बताओ नोटिस में शामिल किया गया है.

हालांकि दो कश्मीरी छात्रों का निलंबन रद्द कर दिया गया है, मगर छात्रों में रोष है कि उन छात्रों के खिलाफ देशद्रोह का मामला तो चल ही रहा है.

अब विश्वविद्यालय प्रशासन का कहना है कि वो अपनी जांच कमिटी की रिपोर्ट पुलिस अधिकारीयों को भेजेंगे. उन्होंने उम्मीद जताई है कि राष्ट्रद्रोह का मामला भी जल्द ही वापस ले लिया जाएगा.

अलीगढ़ के वरीय पुलिस अधीक्षक अजय सहनी के अनुसार पुलिस ने विश्वविद्यालय से वो वीडियो और सीसीटीवी फुटेज मांगे हैं जिनसे यह साबित हो सकता है कि कश्मीरी छात्रों ने आज़ादी के नारे लगाए थे या नहीं.

पुलिस का कहना है कि जो सीसीटीवी फुटेज विश्वविद्यालय ने दिए हैं उनमे सिर्फ सुलेमान हॉल के प्रवेश द्वार के फुटेज हैं जबकि घटना पास के मैदान में हुई थी.

पुलिस का कहना है कि विडियो फुटेज मिलने पर वो विशेष जांच दल को दिए जायेंगे जो सत्यापित करेगा कि छात्रों के खिलाफ देशद्रोह का मामला बनता है या नहीं.

वैसे उमर सलीम पीरज़ादा कहते हैं कि विश्वविद्यालय और पुलिस साथ मिल कर काम कर रहे हैं और जल्द ही मामले को सुलझा लिया जाएगा.



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