डियर ज़िंदगी, गुड बाय, मैं जा रहा हूं, मुझे माफ करना
डियर ज़िंदगी
सदा, सांस लेती रहो,
मैं जा रहा हूं बहुत दूर, सांसें थमने के बाद जहां अब मैं चेन की सांस ले सकूंगा। अब ना मुझे ऑक्सीजन की कमी मार सकेगी और ना ही इंसेफेलाइटिस। मेरे मजबूर मां-बाप को भी मुझे गोद में लिए अब खड़ा नहीं रहना होगा, किसी बच्चा वार्ड में भर्ती होने की लंबी लाइन में। मैं जा रहा हूं, मौतों के औसत आंकड़ों की सियासत से बहुत दूर, जहां मेरा आधे से कुछ ज्यादा वजूद होगा। कोई स्वास्थ्य मंत्री मुझे साढ़े चार के आंकड़े में अब गिन नहीं पाएगा। जीवन और मौत के बीच मैं महज एक नंबर बनकर रह जाऊं, ये मुझे गवारा नहीं, इसलिए मैं जा रहा हूं।

डियर ज़िंदगी, तुम्हारे यहां मेरा वजूद मेरे वश में नहीं था, क्योंकि मैं मासूम और निरीह था। मैं चाहकर भी अपना अच्छा इलाज नहीं करा सकता था। मेरे मां-बाप की बदकिस्मती कहिए या फिर मेरी कि, मैं उनके यहां और फिर तुम्हारे उत्तम प्रदेश में पैदा हुआ। मैंने और स्वर्ग सिधार चुके मेरे 60 से ज्यादा दोस्तों ने मंत्री जी के बयान सुने हैं। दरअसल हम ऑक्सीजन की कमी और इंसेफेलाइटिस के शिकार नहीं बल्कि अगस्त के अभागे हैं। अगले साल फिर अगस्त में हमारे जैसे कई मासूमों का नंबर आएगा। आंकड़ा कभी कम तो कभी ज्यादा नजर आएगा। कोई चतुर सुजान प्रवक्ता हमें नंबर में ऐसे उलझाएगा कि सियासत का सितम हम मरे हुओं को दोबारा मार जाएगा।

मैं जानता हूं कि मेरे जाने से कुछ लोगों की छुट्टी होगी, तो कुछ का कम बढ़ जाएगा। कुछ दिन संतरी से लेकर मंत्री तक दौड़े-दौड़े आएंगे। हार के गम में डूबे विपक्ष को हम में कुछ पोंटेशियल नजर आएगा। रपटों पर रपटें और उनमें आख्याएं और टिप्पणियां होंगी, इस तरह नए साल का नया अगस्त आ जाएगा। तुम सब पर पहले टेस्ट सीरीज में श्रीलंका पर व्हाइट वॉश की खुमारी होगी, फिर जश्न-ए-आजादी में डूबोगे। हार्दिक पंड्या के सात छक्के हमारी मांओं-कैमरे पर रोते दादाओं की चीखों को डायवर्ट करने में जरूर कामयाब होंगे। फिर 15 अगस्त पर सेल का बाजार सजेगा। ऑनलाइन गोबर के कंडे-कमाई के फंडे, सब पर भारी छूट होगी। महासेल के इस जश्न में 60 परिवारों के आंसू शायद ही तुम में से किसी को याद रहेंगे। फिर वन-डे में युवराज की छुट्टी और मनीष पांडे की वापसी, टीवी की चर्चाओं में देश के ज्वलंत मुद्दे होंगे।

गोरखपुर को भूलकर तुम सब आजादी के 70 साल का जश्न मनाओगे, कुछ मन से, कुछ बे-मन से वंदे मातरम भी गाओगे। पर हमें इस बात का अफसोस रहेगा कि वक्त से बहुत पहले तुम ने हमें सांस लेते रहने की आजादी से आजाद कर दिया। हमें तो अपने इंसान के तौर पर जनम लेने पर भी अफसोस होता रहेगा। काश हम किसी गाय का बछड़ा होते तो हमारा जीवन काल तुम्हारे यहां शायद इससे कहीं ज्यादा होता।
डियर ज़िंदगी, ज़रा भी अफसोस मत करना। मैं फिर आऊंगा, तुम्हारे यहां, फिर जन्म लूंगा एक वोटर के तौर पर। इस बार पूरे 18 बरस का होकर दिखाऊंगा और 70 बरस के इस महान लोकतंत्र में फिर अपनी आहूति दूंगा।
तुम्हारा अपना
डिओक्सिजिनेटेड भाई
बाबा राघवदास मेडिकल कॉलेज, मॉर्चुरी, हाल मुकाम-गोरखपुर












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