बंटवारे में खत्म हुआ परिवार, 75 साल बाद आज करतारपुर साहिब में अपने भतीजे से मिलेंगे 92 साल के सरवन सिंह
जालंधर, 08 अगस्त। कहते हैं ना अगर आप किसी चीज को शिद्दत से चाहो तो उसे मिलाने पर पूरी कायनाथ आपके साथ खड़ी हो जाती है। हो सकता है कि इसमे लंबा समय लग जाए लेकिन आपकी कोशिश बेकार नहीं जाती है। कुछ इसी तरह का मामला पंजाब में सामने आया है। जब भारत और पाकिस्तान के बीच बंटवारा हुआ तो पंजाब में रहने वाले 92 साल के सरवन सिंह का परिवार इस त्रासदी में तितर-बितर हो गया था। परिवार के 22 सदस्यों की दंगे में मौत हो गई थी। लेकिन बावजूद इसके बुजुर्ग व्यक्ति ने अपने 23वें सदस्य की तलाश को बंद नहीं किया और आज वह पाकिस्तान स्थित गुरुद्वारा दरबार साहिब करतारपुर में अपने भतीजे से 75 साल के बाद मुलाकात करने जा रहे हैं।

बंटवारे में बिछड़े परिवार
1947 में बंटवारे के समय हजारों-लाखों परिवार एक दूसरे से बिछड़ गए थे। कई सालों तक ये लोग एक दूसरे से दूर रहे और एक दूसरे से अंजान हो गए। बंटवारे ने कई परिवारों को तोड़ दिया, कई लोगों की जिंदगियां निगल गया। लोगों से उनका घर छूट गया। इस त्रासदी का गवाह मोहन सिंह भी रहे। जब वह महज 6 साल के थे तो वह अपने परिवार से बिछड़ गए थे। देश के बंटवारे ने उनसे उनका परिवार छीन लिया था। बंटवारे के दौरान दंगों में उनके परिवार के 22 सदस्यों की मौत हो गई थी।

परिवार के 22 सदस्य मारे गए
दंगे में सिंह के परिवार के 22 सदस्यों को दंगाइयों ने मार दिया था। परिवार की महिलाओं ने अपनी इज्जत को बचाने के लिए बच्चों के साथ कुएं में छलांग लगा दी थी। लेकिन मोहन सिंह इस दंगे के दौरान भागने में सफल रहे और अपनी जान बचा ली। उन्हें पाकिस्तान में एक मुस्लिम परिवार ने पाला और उनका नाम अब अब्दुल खालिक है। अब जब देश की आजादी के 75 साल होने जा रहे हैं तो बंटवारे के दंश के भी 75 साल होने जा रहे हैं। 75 साल के बाद सिंह अपने परिवार से फिर से मिलने जा रहे हैं। मोहन सिंह का लालन-पालन पाकिस्तान में एक मुस्लिम परिवार ने किया था और अब वह भारत अपने परिवार के सदस्य से मिलने के लिए आए हैं।

परिवार के सदस्य दंगों में मारे गए
मोहन सिंह जालंधर में रहने वाले अपने चाचा सरवन सिंह से मिलने के लिए के लिए आए हैं। सरवन सिंह के माता-पिता, दो भाई, दो बहनें दंगों में मारी गई थीं। लेकिन बड़े भाई के बेटे मोहन से मिलने के लिए सरवन सिंह कापी उत्साहित हैं। सरवनसिंह की बेटी रछपाल कौर ने बताया कि दंगों में परिवार के जो सदस्य बचे थे उन्हें ढूंढने की हमने बहुत कोशिश की थी, लेकिन वो मिल नहीं सके थे। दंगों के शांत होने के बाद हमने 6 साल के मोहन को तलाशने की बहुत कोशिश की, हम सोचते रहे कि वह कहां है, कैसा होगा।

डॉक्युमेंट्री भी बनी
मोहन सिंह और सरवन सिंह के मिलन की कहानी भी बहुत दिलचस्प है। मोहन के बारे में उनके परिवार को ऑस्ट्रेलिया में रहने वाले भारतीय मूल के एक पंजाबी व्यक्ति गुरदेव सिंह ने दी थी। गुरदेव ने भारत में रह रहे सरवन सिंह को उनके भतीजे मोहन से मिलने मिलाने में काफी मदद की। पंजाबी लेखक सुधृखदीप सिंह बरनाला ने देश के बंटवारे पर एक डॉक्युमेंट्री भी बनाई है, जिसके एक एपिसोड में सरवन सिंह के परिवार का भी जिक्र है। इस सीरीज का नाम द अदर साइड ऑफ फ्रीडम है जोकि यूट्यूब पर उपलब्ध है।

यूट्यूबर ने मिलाया
सरवन सिंह अपने बेटे के साथ ऑस्ट्रेलिया में रह रहे थे, लेकिन कोरोना की वजह से वह वापस भारत आ गए। भारत और पाकिस्तान के दो यूट्यूबर की वजह से सरवन सिंह अपने भतीजे मोहन सिंह से मिलने जा रहे हैं। पाकिस्तान के यूट्यूबर मोहम्मद जावेद इकबाल ने विभाजन की एक स्टोरी शेयर की, जिसमे खालिक का जिक्र था, वह बंटवारे के दौरान अपने परिवार से बिछड़ गए थे। वह हिंदू खत्री परिवार से बिछड़ गए थे।












Click it and Unblock the Notifications