खुदीराम बोस: देश की आजादी के लिए 18 साल की उम्र में चूमा था फांसी का फंदा
नई दिल्ली, 11 अगस्त: देश इस साल आजादी के 75 साल पूरे कर रहा है। 15 अगस्त 2021 को देश को आजाद हुए 75 साल पूरे हो जाएंगे। हम जानते हैं कि देश की आजादी के लिए हजारों लोगों ने अपने जानमाल की कुर्बानियां दी थीं। यूं तो पूरा देश की आजादी के लिए एकजुट था लेकिन कई कहानियां ऐसी हैं, जो आज भी रोंगटे खड़े कर देती हैं। ऐसी ही कहानी महान स्वतंत्रता सेनानी खुदीराम बोस की है। बोस ने अंग्रेज जज पर हमला किया था और इसी को लेकर उनको हुकूमत ने फांसी की सजा सुनाई थी। स्वतंत्रता दिवस की 75वीं वर्षगांठ के साथ-साथ खुदीराम बोस को याद करना इसलिए भी अहम है क्योंकि 11 अगस्त को ही 1908 में उनको फांसी हुई थी।
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खुदीराम बोस का जन्म बंगाल के मिदनापुर में हुआ था। बहुत कम उम्र से ही उन्होंने आजादी की लड़ाई के लिए खुद को समर्पित कर दिया। महज 15 साल की उम्र में वो बंगाल में क्रांतिकारी गतिविधियों का प्रचार-प्रसार करने वाली संस्था का हिस्सा बन गए थे। अंग्रेजों के जुल्म देख खुदीराम ने उनसे लड़ने को बम बनाना भी सीखा था। खुदीराम बोस चर्चा में तब आए जब क्रांतिकारियों के खिलाफ सख्त फैसले देने वाले एक जज किंग्सफोर्ड पर उन्होंने हमला किया था। जिसमें किंग्सफोर्ड बच गए थे और उनकी पत्नी मारी गई थीं।
जज पर किया था हमला
अंग्रेज जज किंग्सफोर्ड क्रांतिकारियों को सख्त सजाएं दिया करते थे, इसको लेकर उनके खिलाफ एक रोष था। किंग्सफोर्ड जब मुजफ्फरपुर में तैनात थे तो खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चाकी ने उनके मारने की योजना बनाई। योजना बनाकर अप्रैल 1908 में जज किंग्सफोर्ड की बग्गी पर बम फेंका गया लेकिन उस दिन इत्तेफाक से उनकी जगह बग्गी में उनकी पत्नी और बेटी थीं। बग्गी बंद थी तो अंदर कौन है पता ना चल सका और दोनों क्रांतिकारियों ने बम फेंक दिया।
हमले के बाद फरारी के दौरान प्रफुल्ल चाकी ने पुलिस से घिरने पर खुद को गोली मार ली। वहीं बोस पूसा रोड स्टेशन से गिरफ्तार कर लिए गए। उन पर मुकदमा चलाया गया और कुछ सुनवाई के बाद ही जुलाई 1908 में खुदीराम बोस को फांसी की सजा सुनाई गई। जिसके बाद 11 अगस्त 1908 को उनको फांसी दे दी गई।
बंगाल में बनने लगी थी खुदीराम के नाम की धोती
सिर्फ 18 साल की उम्र में शहीद हुए खुदीराम बोस की शहादत ने युवाओं में आजादी की एक नई अलख जगा दी थी। उनकी लोकप्रियता का यह आलम था कि उनको फांसी दिए जाने के बाद बंगाल के जुलाहे एक खास किस्म की धोती बुनने लगे, जिसकी किनारी पर खुदीराम लिखा होता था और बंगाल के नौजवान बड़े गर्व से वह धोती पहनकर आजादी की लड़ाई में शामिल होते थे। उनके नाम के गीत बंगाल में गाए जाने लगे थे और आज भी पूरा देश उनको बेहद सम्मान से याद करता है।
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