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Foreign investors exit India: वो 5 कारण, भारत छोड़कर क्यों भाग रहे हैं विदेशी निवेशक, क्या डूबेगा शेयर बाजार?

Foreign investors exit India: नए साल 2026 की शुरुआत के साथ ही भारतीय शेयर बाजार एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहाँ विदेशी निवेशकों का भरोसा डगमगाता दिख रहा है। कल तक जिस भारत को 'निवेश का स्वर्ग' माना जा रहा था, आज वही बाजार वैश्विक दिग्गजों के लिए 'नो-गो' एरिया बनता जा रहा है। बिकवाली का यह सिलसिला इतना तेज है कि इसने दलाल स्ट्रीट के जानकारों को भी सोचने पर मजबूर कर दिया है।

आखिर क्यों अचानक वैश्विक पोर्टफोलियो में भारत का वजन घटने लगा है? यह महज एक बाजार की गिरावट है या किसी बड़े आर्थिक तूफान का संकेत? आइए समझते हैं उन प्रमुख वजहों को जिन्होंने विदेशी निवेशकों को भारत से मुंह मोड़ने पर मजबूर कर दिया है।

Foreign investors exit India

1.6 लाख करोड़ रुपये की भारी बिकवाली

साल 2025 भारतीय शेयर बाजार के लिए एक कठिन दौर रहा, जहां विदेशी निवेशकों ने लगभग 1.6 लाख करोड़ रुपये की भारी बिकवाली की। वर्तमान में जब वैश्विक पैसा अमेरिका से निकलकर अन्य उभरते देशों की ओर जा रहा है, तब भी भारत को इसका लाभ नहीं मिल पा रहा है। विश्लेषकों का मानना है कि अन्य उभरते बाजारों की तुलना में भारत का P/E मल्टीपल काफी ऊंचा (26x) है, जो निवेशकों को निवेश करने से रोक रहा है।

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ट्रंप टैरिफ का डर

विदेशी निवेशकों के पीछे हटने की एक बड़ी वजह भारतीय बाजार का महंगा होना है। MSCI इंडिया इंडेक्स, इमर्जिंग मार्केट्स और अन्य वैश्विक इंडेक्स की तुलना में काफी महंगा है। इसके अलावा, ट्रंप प्रशासन द्वारा लगाए जाने वाले संभावित व्यापारिक टैरिफ (Tariffs) ने भी निवेशकों के मन में अनिश्चितता पैदा कर दी है। केयरएज ग्रुप के अनुसार, विदेशी निवेशक फिलहाल भारत की बुनियादी मजबूती के बजाय वैश्विक सेक्टर रुझानों और व्यापारिक समझौतों पर अधिक ध्यान दे रहे हैं।

अत्यधिक महंगा वैल्यूएशन

भारतीय बाजार का मूल्यांकन (P/E Ratio) वर्तमान में दुनिया के सबसे महंगे बाजारों में से एक है। MSCI इंडिया का P/E मल्टीपल करीब 26x है, जबकि उभरते बाजारों का औसत केवल 17x है। विदेशी निवेशकों के लिए भारत में पैसा लगाना अब जोखिम भरा और कम फायदेमंद लग रहा है, इसलिए वे सस्ते विकल्पों की तलाश में हैं।

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कॉर्पोरेट अर्निंग्स में सुस्ती

पिछले एक साल के आंकड़ों पर नजर डालें तो MSCI इंडिया ने केवल 4.29% का रिटर्न दिया है, जबकि MSCI इमर्जिंग मार्केट्स इंडेक्स ने 34% की शानदार बढ़त दर्ज की है। वैश्विक निवेशक अब चीन, ताइवान और दक्षिण कोरिया जैसे बाजारों को तरजीह दे रहे हैं क्योंकि वहां AI, सेमीकंडक्टर और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे ग्रोथ वाले क्षेत्रों का बोलबाला है। इन इंडेक्स में ताइवान सेमीकंडक्टर और सैमसंग जैसी कंपनियों का दबदबा है, जबकि भारतीय कंपनियों का वेटेज काफी कम है।

AI सेक्टर में बढ़ता वैश्विक निवेश

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) आज दुनिया भर में निवेश का सबसे बड़ा केंद्र बना हुआ है। गोल्डमैन सैक्स के अनुसार, 2026 तक AI पर पूंजीगत व्यय (Capex) बढ़कर 527 अरब डॉलर होने की उम्मीद है। अमेरिकी AI कंपनियां वर्तमान में विकास के शीर्ष पर हैं, जिसके कारण निवेशक वहां बड़े दांव लगा रहे हैं। दुखद यह है कि भारत इस भारी निवेश प्रवाह का हिस्सा नहीं बन पाया है, क्योंकि यहां टेक कंपनियों का मूल्यांकन बहुत ज्यादा है और निवेशक कीमतों के गिरने का इंतजार कर रहे हैं।

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रुपये की कमजोरी और डॉलर की मजबूती

अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरों को ऊंचा रखने और डॉलर के मजबूत होने से रुपया लगातार गिर रहा है। विदेशी निवेशकों के लिए मुद्रा की गिरावट (Currency Depreciation) सीधे उनके मुनाफे को कम कर देती है। 2025 में रुपया करीब 5% तक गिरा, जिससे निवेशकों का 'डॉलर-रिटर्न' काफी कम हो गया।

2026 में कैसा रहेगा हाल?

इतनी निराशा के बावजूद, साल 2026 की तीसरी तिमाही (Q3 FY26) से उम्मीद की किरण नजर आ रही है। मोतीलाल ओसवाल की रिपोर्ट के अनुसार, कंपनियों की कमाई में 16% तक की जोरदार बढ़ोतरी की संभावना है। यह रिकवरी बैंकिंग, टेक्नोलॉजी और अन्य प्रमुख क्षेत्रों में व्यापक होने की उम्मीद है। यदि भारतीय कंपनियां अगले कुछ तिमाहियों में मजबूत नतीजे पेश करती हैं और अमेरिका के साथ व्यापार समझौता होता है, तो विदेशी निवेशकों की वापसी संभव हो सकती है।

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