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मोदी सरकार के चार साल: नक्सलवाद पर लगाम कसने में कैसे कामयाब हुआ गृह मंत्रालय?

नई दिल्ली। केंद्र में मोदी सरकार को चार साल पूरे हो गए हैं, पिछले चार सालों में मोदी सरकार ने कई अहम फैसले लिए हैं। इस दौरान गृह मंत्रालय का जिम्मा संभाल रहे राजनाथ सिंह के लिए सबसे बड़ी चुनौती नक्सल (लेफ्ट विंग एक्स्ट्रिमिज्म)और आतंकवाद से निपटने की रही है। पिछले चार सालों में एक तरफ जहां नक्सलियों के हमले में कई सेना के जवान शहीद हुए तो जम्मू कश्मीर में भी कई जवानों को जान गंवानी पड़ी है। घाटी में लगातार बढ़ रहे आतंकवाद से निपटना मौजूदा सरकार की सबसे बड़ी चुनौती रही। गृह मंत्रालय की ओर से जो आंकड़े जारी किए गए हैं उसके अनुसार घाटी में पिछले सालो में हिंसक घटनाओं में कमी आई है। हिंसा की घटनाओं में 36.6 फीसदी की कमी आई है, जोकि 6524 से घटकर 4136 हो गई है। आईए डालते हैं विस्तार से पिछले साल मोदी सरकार द्वारा उठाए गए कदम पर।

rajnath singh

नक्सल प्रभावित इलाकों में सड़क निर्माण
केंद्र सरकार ने नक्सल प्रभावित इलाको में दिसंबर 2016 रोड कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट के प्रस्ताव को मंजूरी दी है। इन जगहों पर कुल 5412 किलोमीटर सड़क का निर्माण 44 जिलों में हुआ है। जिसपर कुल 11725 करोड़ रुपए खर्च किए गए हैं। जिसमे से पहले ही राज्य सरकारों को 3775.56 किलोमीटर सड़क बनाने की अनुमति दे दी गई है।

35 सबसे अधिक नक्सल प्रभावति जिलों में स्पेशल सेंट्रल असिस्टेंस
इन जिलों में नक्सल समस्या से निपटने के लिए कमेटी का गठन किया गया जिसकी कमान अडिशनल सेक्रेटरी को दी गई, जोकि यहां हो रहे विकास कार्यों पर नजर रखते हैं। ये केंद्र सरकार के अंतर्गत अलग-अलग विभागों के तहत हैं। मई 2017 में दो कमेटियों की गठन किया गया, जिससे कि इन इलाकों में ऑपरेशन को तेज किया जा सके। जो दो अहम कमेटियां इसके लिए गठित की गई है उसमे कटिंग एज टेक्नोलोजी और अहम क्षेत्रों में विकास कार्यों की रफ्तार पर नजर रखने के लिए बनाई गई है। इस कमेटी ने पहले ही अपनी रिपोर्ट पेश कर दी है। जिसके बाद नई तकनीक लाने के लिए हरी झंडी दे दी गई है।

सुरक्षा से जुड़ी बड़ी उपलब्धि
नक्लस प्रभावित इलाकों में पिछले चार वर्षों में कमी दर्ज की गई है, जिससे इस बात की ओर इशारा मिलता है कि इस क्षेत्र में काफी अहम कदम उठाए गए हैं। हिंसा की घटनाएं घटकर 36.6 फीसदी हो गई है, जोकि 6524 से घटकर 4136 हो गई हैं। एलडबल्युई (लेफ्ट विंग वायोलेंस) से जुड़ी मौत 55.5 फीसदी हो गई है जोकि 2428 से घटकर 1081 हो गई है। एलडबल्यूई के कैडर में भी कमी आई है, जोकि घट गए हैं। 14.5 फीसदी कैडर की सेना ने ढेर किया है जोकि 445 से बढ़कर 510 हो गई है। साथ ही एलडब्ल्यूई के 143 फीसदी कैडर ने आत्मसमर्पण किया है, जोकि 1387 से बढ़कर 3373 तक पहुंच गया है।

भौगोलिक क्षेत्र में आई कमी
राज्यों की रिपोर्ट के अनुसार नक्सलियों का भौगोलिक इलाका काफी कम हुआ है, यह 2013 की तुलना में 2017 में घटकर 10 से 7 ही रह गया है। 2013 में 76 जिलों में हिंसा की घटनाएं होती थी, जोकि 2017 में घटकर 58 हो गए हैं। पुलिस स्टेशन में हिंसा की घटनाओं के मामले भी कम हो गए हैं, 2013 में यह 330 था, जोकि 2017 में 291 हो गया है।

ग्रांट में बढ़ोतरी
एलडब्ल्यूई इलाकों में कैडर्स को आत्मसमर्पण के लिए बढ़ावा देने के लिए 2.5 लाख रुपए से लेकर 5 लाख रुपए का मुआवजा दिया जा रहा है। यह अनुदान शीर्ष रैंक के नक्सलियों को दिया जा रहा है। वहीं मध्य रैंक के कैडर को 1.5 लाख से लेकर 2.5 लाख रुपए दिया जा रहा है। साथ ही उन्हें मासिक स्टाइपेन भी दिया जा रहा है जोकि 4000 रुपए से लेकर 6000 रुपए तक है।

मरने वालों को अधिक मुआवजा
नक्सलियों के हमले में मरने वाले नागरिकों के परिजनों को 1 से 2 लाख रुपए का अनुदान दिया जा रहा है। जबकि सुरक्षा बलों के शहीद होने पर उनके परिजनों को 3 से 20 लाख रुपए दिए जा रहे हैं। संपत्ति को होने वाले नुकसान के लिए भी मुआवजा दिया जा रहा है।

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