25 सितम्बर : सारथी वही, ‘कृष्ण’ बदल गए!

अहमदाबाद। भारतीय राजनीति और भारतीय जनता पार्टी.... दोनों में इन दिनों नरेन्द्र मोदी और लालकृष्ण आडवाणी सबसे चर्चित हस्तियाँ हैं। राजनीति तथा पार्टी के ये दोनों महारथी बुधवार को भारत के हृदय कहे जाने वाले मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में एक मंच पर विराजेंगे। हालाँकि दोनों एक ही पार्टी के नेता हैं और इस हिसाब से देखें, तो यह कोई बड़ी बात नहीं है कि दोनों एक मंच पर दिखने वाले हैं, परंतु समय, हालात और पसंद-नापसंदी के हिसाब से सोचा जाए, तो बुधवार का दिन भारत और भाजपा दोनों के लिए महत्वपूर्ण कहलाएगा।

बात जब समय व हालात की है, तो बुधवार की तारीख और महीना भी भाजपा व भारत दोनों के लिए ऐतिहासिक समय व हालात से कम नहीं है। बुधवार को तारीख 25 और महीना सितम्बर है। भाजपा व लालकृष्ण आडवाणी और संभव है कि यह देश भी शायद इस तारीख और महीने को कभी नहीं भुला सकता, क्योंकि यह वही तारीख है, जिस दिन भारतीय राजनीति में भाजपा के उदय के बीज पड़े थे और बीजारोपण करने वाले थे लालकृष्ण आडवाणी, तो दूसरी ओर उस बीज की देखभाल करने वाले थे नरेन्द्र मोदी। 25 सितम्बर बुधवार को भी है और हर साल यह तारीख आती ही है, लेकिन ठीक 23 साल पहले की इस तारीख को भारतीय इतिहास में एक महत्वपूर्ण अध्याय जुड़ा था। 23 साल पहले सोमनाथ से एक रथ निकला था। भाजपा के इस रथ के रथी थे लालकृष्ण आडवाणी तथा सारथी थे नरेन्द्र मोदी। बुधवार को ठीक 23 साल बाद आडवाणी-मोदी भोपाल में एक मंच पर होंगे, लेकिन मोदी आज भी सारथी के रूप में बने हुए हैं, जबकि रथ भी भाजपा का ही है। बदल चुका है तो रथी यानी लालकृष्ण आडवाणी। भाजपा के लिए भी, नरेन्द्र मोदी के लिए भी और समय तथा हालात के लिए भी यह रथी बदल चुका है।

भोपाल में बुधवार यानी 25 सितम्बर, 2013 को जब लालकृष्ण आडवाणी तथा नरेन्द्र मोदी एक मंच पर आने वाले हैं, तब अनायास ही नहीं, बल्कि प्रयत्नपूर्वक 23 साल पहले का वह दिन और महीना याद आ ही जाता है, जब आडवाणी और मोदी एक ही मंच पर थे। वह मंच था सोमनाथ से अयोध्या की ओर प्रयाण करने वाला रथ। आडवाणी 1990 में 25 सितम्बर को गुजरात में सौराष्ट्र स्थित द्वादश ज्योतिर्लिंगों में एक सोमनाथ महादेव मंदिर से अयोध्या तक की राम रथयात्रा पर निकले थे। राम मंदिर निर्माण तथा उसके लिए जागरूकता फैलाने के उद्देश्य से आडवाणी ने यह रथयात्रा निकाली थी और उनके रथ के सारथी थे नरेन्द्र मोदी।

आइए तसवीरों के साथ जानें मोदी-आडवाणी के बारे में :

रथी आडवाणी, सारथी मोदी

रथी आडवाणी, सारथी मोदी

अगर सभी इस बात से वाकिफ हैं कि सोमनाथ-अयोध्या राम रथयात्रा की सफलता में आडवाणी के रथ के सारथी मोदी का सबसे बड़ा योगदान था, तो यह भी बताने की जरूरत नहीं है कि इस रथयात्रा की सफलता ने ही आडवाणी का कद बढ़ाया था और भाजपा राष्ट्रीय स्तर पर छा गई थी। उस वक्त भी भाजपा में अटल बिहारी वाजपेयी आडवाणी से बड़े कद के नेता थे, परंतु लोकप्रियता के मामले में आडवाणी सबसे आगे थे और आडवाणी की सफलता का श्रेय उनके रथ के सारथी यानी नरेन्द्र मोदी को दिया जाता था।

खूब जमाया रंग

खूब जमाया रंग

उसके बाद तो आडवाणी-मोदी की इस जोड़ी ने खूब रंग जमाया। मोदी ने आडवाणी की राजनीतिक सफलता तथा उनकी हर यात्रा में सारथी समान भूमिका निभाई। बदले में आडवाणी ने न केवल मोदी को गुजरात के मुख्यमंत्री की गद्दी पर बैठाया, बल्कि लगातार उनका सिंहासन भी बचाते रहे।

और पड़ी दरार

और पड़ी दरार

हालाँकि आडवाणी-मोदी की इस जोड़ी में पहली बार दरार तब पड़ी, जब आडवाणी ने पाकिस्तान जाकर मोहम्मद अली जिन्ना की तारीफ की। आडवाणी के इस बयान से संघ-विहिप नाराज हुए, तो भाजपा के भीतर भी उनका विरोध हुआ। बस, यहीं से मोदी ने आडवाणी का साथ छोड़ा। मोदी का साथ नहीं मिलने से आडवाणी नाराज हुए और इस जोड़ी की चमक धीरे-धीरे फीकी पड़ती गई।

सद्भावना उपवास में उपस्थिति

सद्भावना उपवास में उपस्थिति

मोदी-आडवाणी के बीच दरार के बावजूद आडवाणी मोदी के सद्भावना उपवास के दौरान उपस्थित रहे थे और उन्होने मोदी की तारीफ भी की थी।

मोदी का बढ़ा कद

मोदी का बढ़ा कद

सद्भावना उपवास तथा गुजरात में लगातार चुनाव जीतते हुए नरेन्द्र मोदी ने अपना कद इतना विराट कर डाला कि आडवाणी की वरिष्ठता भी फीकी पड़ गई। मोदी आज भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार घोषित हो चुके हैं, जबकि इस बात से नाराज आडवाणी पार्टी में अलग-थलग पड़ चुके हैं। मोदी-आडवाणी के सम्बंध इतना तंग हो गए हैं कि अब उनका एक मंच पर आना सुर्खियों में सुमार हो जाता है। फिर वह जेठमलानी के जन्म दिन की पार्टी हो या फिर भोपाल में कल होने वाली रैली।

बहुत पानी बह चुका

बहुत पानी बह चुका

इसीलिए तो बुधवार को जब आडवाणी और मोदी एक मंच पर आ रहे हैं, तब 23 साल पहले की तारीख और महीना यानी 25 सितम्बर, 1990 का वह दिन याद आ जाता है। आज उस समय और हालात को गुजरे 23 साल बीत चुके हैं। इस दौरान यदि अयोध्या स्थित सरयू नदी में बहुत पानी बह चुका, तो दिल्ली की यमुना या अहमदाबाद-गांधीनगर से गुजरने वाली साबरमती नदी का जल भी ठहरा नहीं है और सोमनाथ की हिरण नदी का भी कितना ही पानी अरब सागर की लहरों में घुल चुका है।

पासे सभी पलट गए

पासे सभी पलट गए

25 सितम्बर, 1990 और 25 सितम्बर, 2013... दोनों में 25 सितम्बर तो कॉमन ही है, परंतु बदल चुका है तो केवल साल। इसी प्रकार 23 साल पहले का रथ और सारथी भी कॉमन ही हैं यानी 23 साल पहले भी रथ तो भाजपा का ही था और सारथी भी मोदी ही थे, बस बदला है मात्र रथी। 23 साल पहले रथी थे आडवाणी, जबकि आज भाजपा स्वयं रथ और रथी की शक्ल ले चुकी है और सारथी वही नरेन्द्र मोदी हैं। उस समय के सारथी नरेन्द्र मोदी केवल आडवाणी का रथ खींच रहे थे और भाजपा का रथ आडवाणी के हाथ में था, जबकि 23 साल बद मोदी पर सारथी के रूप में समग्र भाजपा के रथ को खींचने की जिम्मेदारी है।

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