दीपचंद सिंह: कारिगल का वो जांबाज सिपाही जो खाने की जगह मांगते थे गोला-बारूद, पढ़ें शौर्य की गाथा

25 years post-Kargil War, Lance Naik Deep Chand Singh's bravery in 'Operation Vijay' continues to inspire. A missile regiment member, Singh played a critical role in driving away Pakistani intruders.

भारत-पाकिस्तान के बीच 1999 में हुए कारगिल युद्ध के दौरान भारतीय सेनाओं ने जिस शौर्य और अदम्‍य साहस का परिचय दिया। उसकी पूरी दुनिया कायल हो गई। भारत ने दुनिया के सबसे दुर्गम युद्ध क्षेत्र से पाकिस्तानी घुसपैठियों को मार भगाया था। इस घटना को अब 25 साल होने वाले हैं। लेकिन आज भी इस युद्ध के हीरो हमें प्रेरणा दे रहे हैं।

आज हम एक ऐसे ही वॉर हीरो के बारे में बात करने वाले हैं। जिन्होंने अपने शौर्य और अदम्‍य साहस के देश के दुश्मनों को नेस्त-ओ-नाबूद कर दिया था। उनका नाम है दीपचंद सिंह। हरियाणा के हिसार ज़िले के रहने वाले रिटायर्ड लांस नायक दीपचंद सिंह को 1999 में 'कारगिल युद्ध' में 'टाइगर हिल' में तैनात किया गया था। कारगिल युद्ध में मिसाइल रेजीमेंट का हिस्सा रहे दीपचन्द ने 'ऑपरेशन विजय' में तोलोलिंग के ऊपर सबसे पहला गोला दागा था।

Kargil War Hero Deep Chand Singh

दीपचंद वर्ष 1989 में सेना में भर्ती हुए थे। दीपचंद ने खुफिया विभाग में काम करते हुए कश्मीरी लैंग्वेज कोर्स करने के बाद ड्यूटी ज्वाइन की थी। इन्होंने करीब आठ आतंकवादियों को मौत के घाट उतारने में अहम रोल अदा किया था। टाइगर हिल की 17 हज़ार फ़ीट की ऊंचाई पर दीपचंद ने ना सिर्फ दुश्मनों के छक्के छुड़ा दिए, बल्कि अपने कई साथियों की जान भी बचाई।

कारगिल युद्ध के दौरान तोप का गोला फटने से दीपचंद बुरी तरह जख्मी हो गए थे। ये हादसा उस समय हुआ, जब दीपचन्द और उनके साथी ऑपरेशन पराक्रम के दौरान वापसी के लिए सामान बांधने की तैयारी कर रहे थे। इसा दौरान गोले के फटने से जख्मी हुए थे। बुरी तरह से घायल दीपचंद के बचने की उम्मीद ना के बराबर थी। उन्हें बचाने के लिए डॉक्टरों ने उनकी दोनों टांगे और एक हाथ को काट दिया था। उनका इतना खून बह गया था कि उन्हें बचाने के लिए 17 बोतल खून चढ़ाया गया।

एक न्यूज वेबसाइट से बात करते हुए दीपचंद ने बतायाकि, जब उन्हें सप्लाई देने वाले सैनिक आते थे, वह उनसे कहते थे कि, खाना मिले ना मिले, लेकिन गोला बारूद ज्यादा से ज्यादा मिले। उन्होंने बताया कि, हमारी बटालियन ने 10 हजार राउन्ड फायर किए, मेरी बटालियन को 12 गैलेन्टरी अवॉर्ड मिला। हमें कारगिल जीतने का सौभाग्य मिला।

भूतपूर्व सीडीएस जनरल बिपिन रावत द्वारा दीपचंद को उनकी बहादुरी के लिए 'कारगिल योद्धा' की उपाधि से सम्मानित भी किया जा चुका है। दीपचंद फिलहाल 'आदर्श सैनिक फ़ाउंडेशन' के ज़रिए ड्यूटी के दौरान विकलांग हुए सैनिकों के कल्याण के लिए काम करते हैं।

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