218 साल पहले भी भिड़े थे सिंधिया और दिग्विजय के पूर्वज, जानिए तब किसने जीती थी बाजी?

नई दिल्ली- जो लोग भी राजनीति में थोड़ी भी दिलचस्पी रखते हैं, उन्हें पता है कि मध्य प्रदेश में कांग्रेस के सत्ता में आने के साथ ही दिग्विजय सिंह और ज्योतिरादित्य सिंधिया में सियासी खींचतान चल रही थी। जैसे-जैसे समय निकला ये खींचतान बहुत ही बढ़ती चली गई और आखिरकार जब सिंधिया कांग्रेस में खुद को पूरी तरह से अलग-थलग महसूस करने लगे तो उन्होंने पार्टी को टाटा करने का ऐलान कर दिया। लेकिन, अगर हम इतिहास को पलटकर देखें तो दिग्विजय सिंह के राघोगढ़ और सिंधिया के ग्वालियर राज घराने के बीच की लड़ाई कोई नई नहीं है। सैकड़ों साल पहले भी दोनों खानदान युद्ध के मैदान पर उतरे थे, जिसमें एक बुरी तरह पराजित हो गया था। उस जंग को तब सिंधियाओं ने जीता था और दिग्विजय के पूर्वजों को मात मिली थी। आइए इतिहास की उस घटना और मौजूदा राजनीतिक घटनाक्रम को समग्र रूप में परखने की कोशिश करें।

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    दो राजघरानों की लड़ाई

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    माना जाता है कि पिछले कुछ वर्षों से मध्य प्रदेश कांग्रेस में तीन गुटों का सबसे ज्यादा दबदबा रहा है। छिंदवाड़ा के ताकतवर कांग्रेसी और मौजूदा मुख्यमंत्री कमलनाथ, पूर्व राघोगढ़ राजघराने के वंशज दिग्विजय सिंह और पूर्व ग्वालियर राजघराने के वंशज ज्योतिरादित्य सिंधिया। पार्टी कार्यकर्ताओं में भी इन्हीं तीनों के वफादारों का दबदबा रहा है। ऐसा कहा जाता है कि मौजूदा राजनीति में ज्योतिरादित्य सिंधिया के पिता और दिवंगत कांग्रेस नेता माधवराव सिंधिया के जमाने से ही पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के साथ उनके संबंध अच्छे नहीं रहे हैं। दिलचस्प बात ये है कि अंग्रेजों के जमाने में दिग्विजय सिंह के पूर्वजों ने ग्वालियर के महाराजा के लिए राजस्व जुटाने का काम किया था। लेकिन राजनीति में दोनों के वंशजों के बीच कभी ज्यादा बनती नहीं देखी गई, जबकि सिंधिया पिता-पुत्र और दिग्विजय दोनों एक ही पार्टी में बने रहे।

    218 साल पहले सिंधिया ने दिग्विजय के पूर्वजों को हराया

    218 साल पहले सिंधिया ने दिग्विजय के पूर्वजों को हराया

    इतिहास को टटोलें तो भले ही दिग्विजय के पूर्वजों ने सिंधियाओं के लिए राजस्व वसूलने का काम किया हो, लेकिन दोनों राजघरानों के बीच खुन्नस पुश्तैनी रही है और इसका सिलसिला दो सौ साल से भी पहले ही शुरू हो चुका था। बात 1802 की है। तब ज्योतिरादित्य सिंधिया के पूर्वज दौलतराव सिंधिया ने दिग्विजय सिंह के पूर्वज और राघोगढ़ के सातवें राजा हिंदुपत राजा जय सिंह (1797-1818) को पराजित करके उनकी रियासत को ग्वालियर का जागीर राज्य बना लिया। दोनों घरानों के वंशजों में असल खुन्नस यहीं से शुरू हुई और शायद वह दूरी कभी मिट ही नहीं पाई। जब अंग्रेजों ने सभी देशी रियासतों को अपने अधीन कर लिया, तब भी ग्वालियर 21 तोपों की सलामी वाला राज्य बना रहा और राघोगढ़ बिना तोप की सलामी वाला राज्य रह गया।

    जब राघोगढ़ पड़ा ग्लालियर पर भारी

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    लेकिन, दो साल बाद देश और देशी राजघरानों की स्थिति बदल चुकी थी। कहते हैं कि ज्योतिरादित्य के पिता माधवराव सिंधिया का नाम सीएम पोस्ट के लिए 1985-90 के बीच भी आया था, लेकिन तब भी राजीव गांधी ने अपने दोस्त की जगह अर्जुन सिंह और मोतीलाल वोरा को ही तबज्जो दिया था। 1993 में भी जब एक बार फिर मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री के लिए माधव राव सिंधिया का नाम आगे चल रहा था, तब अपने गुरु अर्जुन सिंह के प्रभाव से दिग्विजय सिंह ने बाजी मार ली थी। इसके बाद मध्य प्रदेश की राजनीति में यह चर्चा शुरू हो गई कि राघोगढ़ के राजा ने ग्वालियर राजघराने से दो सौ साल से भी पुराने पराजय का बदला ले लिया।

    सिंधिया कांग्रेस में हो गए अलग-थलग

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    2018 में कांग्रेस को जब मध्य प्रदेश में भाजपा को 15 वर्षों बाद सत्ता से हटाने का मौका मिला तो माना जा रहा था कि तत्कालीन पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी के करीबी होने के नाते ज्योतिरादित्य सिंधिया को बड़ी जिम्मेदारी मिल सकती है। सिंधिया ने उस चुनाव में कांग्रेस का वनवास खत्म करने के लिए पूरा जोर भी लगाया था। लेकिन, जब बात मुख्यमंत्री बनाने की आई तो कमलनाथ और दिग्विजय सिंह की जुगलबंदी के आगे राहुल से करीबी होने के बावजूद सिंधिया कहीं नहीं टिक सके। बाद में सिंधिया उम्मीद लगाए रहे कि भले ही सीएम का पद हाथ से चला गया हो, प्रदेश का पूर्णकालिक अध्यक्ष बनाने में तो कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए। क्योंकि, कमलनाथ के पास दोनों जिम्मेदारियां थीं। लेकिन, कहते हैं कि दिग्विजय सिंह ने अहमद पटेल के साथ मिलकर सिंधिया के खिलाफ ऐसी लॉबिंग की कि ज्योतिरादित्य की आखिरी उम्मीद भी जाती रही। इतना ही नहीं सिंधिया को यह भी भनक लग गई कि राज्यसभा में भी दिग्विजय सिंह को ही चांस मिलेगा। इस तरह से युद्ध भूमि में भले ही सिंधिया राजघराना भारी पड़ा हो, लेकिन कांग्रेस की राजनीति में राघोगढ़ हमेशा भारी पड़ता रहा है।

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