यूएन सदस्यों की भारत से अपील, मानवाधिकारों की रक्षा हो

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संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देशों ने भारत से आग्रह किया है कि अपने यहां धार्मिक आधार पर उत्पीड़न और यौन हिंसा के मामलों को नियंत्रित करे. गुरुवार को भारत में मानवाधिकार उल्लंघन के मामलों पर चर्चा के दौरान यह अपील की गई कि भारत यातना संधि को प्रमाणित करे. भारत ने इस संधि पर हस्ताक्षर तो किए हैं लेकिन इसे रेटिफाई नहीं किया है.

जवाब में, भारत ने मानवाधिकार कार्याकर्ताओं के काम की तारीफ तो की लेकिन मौत की सजा को खत्म करने से इनकार कर दिया और कहा कि दुर्लभ से दुर्लभ मामलों में ही ऐसी सजा दी जाएगी. भारत के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा, "भारत किसी भी तरीके की यातना की निंदा करता है और अन्यायपूर्ण हिरासत, यातना या किसी भी द्वारा बलात्कार के विरोध के अपने रुख पर कायम है."

गुरुवार को जेनेवा में हुई यह चर्चा उस चार वर्षीय समीक्षा का हिस्सा थी, जिससे यूएन के सभी 193 सदस्य देशों को हर चार साल में एक बार गुजरना होता है. यूएन की मानवाधिकार परिषद में अमेरिकी दूत मिशेल टेलर ने कहा कि भारत को यूएपीए का इस्तेमाल कम करना चाहिए.

अल्पसंख्यकों के अधिकारों पर यूएन महासचिव की भारत को सीख

उन्होंने कहा, "हम सिफारिश करते हैं कि भारत यूएपीए और ऐसे ही कानूनों का मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, पत्रकारों और अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों के खिलाफ विस्तृत इस्तेमाल कम करे. कानूनी सुरक्षा हासिल होने के बावजूद लैंगिक और धार्मिक आधार पर भेदभाव और हिंसा जारी है. आतंकवाद-रोधि कानूनों के प्रयोग के कारण मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को लंबे समय तक हिरासत में रखा जा रहा है."

यूएपीए को लेकर भारत में भी लगातार विरोध होता रहा है. मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का आरोप है कि इस कानून का इस्तेमाल विभिन्न सरकारें और पुलिस उत्पीड़न के लिए कर रही हैं. इसी साल अगस्त में भारत के गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने संसद को बताया था कि 2018 से 2020 के बीच 4,690 लोगों को यूएपीए के तहत गिरफ्तार किया गया जबकि सजा सिर्फ 149 लोगों को हुई. 2020 में ही 1,321 लोगों को इस कानून के तहत गिरफ्तार किया गया था और 80 लोगों को दोषी पाया गया था. सबसे ज्यादा गिरफ्तारियां उत्तर प्रदेश में हुई थीं.

भारत को मिलीं नसीहतें

कनाडा ने भारत से अपील की कि यौन हिंसा के सभी मामलों की जांच करे और धार्मिक हिंसा के मामलों की जांच करते हुए "मुसलमानों समेत" सभी के धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार की रक्षा करे. नेपाल ने भी भारत को नसीहत करते हुए कहा कि उसे "महिलाओं और लड़कियों के खिलाफ भेदभाव से लड़ाई की कोशिशों को मजबूत करना चाहिए."

ब्रिटेन के दूत साइमन मैनली ने भारत से आग्रह किया कि "सुनिश्चित किया जाए कि बाल मजदूरी, मानव तस्करी और बंधुआ मजदूरी के खिलाफ मौजूदा कानूनों का पूरी तरह पालन हो." इसी तरह चीन ने कहा कि भारत को मानव तस्करी रोकने के लिए उपाय करने चाहिए और लैंगिक समानता सुनिश्चित करनी चाहिए.

भूटान ने कहा कि भारत को बच्चों व महिलाओं के खिलाफ यौन अपराध रोकने के लिए और ज्यादा कदम उठाने की जरूरत है, जबकि जर्मनी ने "हाशिये पर मौजूद तबकों के अधिकारों को लेकर" चिंता जताई. सऊदी अरब ने भारत से शिशु मृत्युदर कम करने पर काम करने को कहा तो ऑस्ट्रेलिया ने मृत्यु दंड को औपचारिक तौर पर समाप्त करने की अपील की.

स्विट्जरलैंड ने भारत में इंटरनेट पर पाबंदी को लेकर चिंता जाहिर की और कहा कि उसे सुनिश्चित करना चाहिए कि "सभी के पास सोशल नेटवर्क की पहुंच हो और इंटरनेट को बंद करने या धीमा करने की कार्रवाइयां" ना हों.

भारत ने दिया जवाब

अपने जवाब में मेहता ने कहा कि भारत का संविधान सभी को अभिव्यक्ति की आजादी देता है. लेकिन उन्होंने कहा कि "बोलने और अभिव्यक्ति की आजादी संपूर्ण नहीं हो सकती" और भारत की संप्रभुता, एकता, सुरक्षा, विदेशी संबंध की खातिर "उस पर तार्किक पाबंदियां लगाई जा सकती हैं."

उन्होंने कहा, "तार्किक आधार पर पाबंदियां लगाना यह सुनिश्चित करता है कि जहां बोलने और अभिव्यक्ति की आजादी 'हेट स्पीच' में बदल जाए, वहां सरकार उसे काबू कर सके."

बहस के जवाब में भारतीय विदेश मंत्रालय के सचिव संजय वर्मा ने कहा कि वह संयुक्त राष्ट्र की सिफारिशों को सरकार के सामने पेश करेंगे. उन्होंने कहा, "भारत सरकार अपने लोगों के मानवाधिकारों की सुरक्षा और बचाव के लिए प्रतिबद्ध है. दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने के नाते भारत मानवाधिकारों के सर्वोच्च मानकों को लेकर प्रतिबद्ध है."

रिपोर्टः विवेक कुमार (एएफपी)

Source: DW

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