आजादी के 75 साल: खत्म नहीं हो रही भारत में गरीबी

Provided by Deutsche Welle

नई दिल्ली, 12 अगस्त। गरीबी से परेशान होकर मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले के रहने वाले खुमान अहीरवार 2014 में दिल्ली चले आए थे. दिल्ली आने के बाद उन्होंने पहले तो चौकीदारी का काम किया फिर निर्माण क्षेत्र में मजदूरी करने लगे. कोरोना लॉकडाउन के दौरान वह अन्य श्रमिकों की तरह गांव वापस चले गए और लॉकडाउन खत्म होने के बाद दोबारा दिल्ली लौटे. दिल्ली लौटने के बाद उन्हें काम नहीं मिला, जिसके बाद उन्होंने अपने अन्य जान पहचान वालों के साथ नोएडा के एक ठेकेदार के पास दिहाड़ी मजदूरी का काम करना शुरू किया.

500 रुपये दिहाड़ी पर उन्होंने एक साल तक काम किया. ठेकेदार ने उनसे काम तो देह-तोड़ कराया लेकिन पैसे सिर्फ उतने ही दिए जितने से उनके चार सदस्यों के परिवार का खर्च निकल पाए. यही नहीं उनके 15 साल के बेटे ने भी काम किया लेकिन पैसे उसे भी पूरे नहीं मिले. अहीरवार ने पहले तो कई दिनों तक पैसे के लिए ठेकेदार के पास चक्कर काटे फिर उन्होंने दिल्ली में एक ऐसे संगठन से मदद मांगी जो अहीरवार की तरह शोषित लोगों की मदद करता है.

दिहाड़ी मजदूर खुमान अहीरवार

नेशनल कैंपेन कमिटी फॉर इरैडिकेशन ऑफ बॉन्डेड लेबर ने मामले की गंभीरता को लेते हुए नोएडा अथॉरिटी और श्रम आयुक्त से इस मामले की शिकायत की. अहीरवार जिस ठेकेदार के पास काम करते थे वह नोएडा अथॉरिटी का ठेका लेता है.

अहीरवार डीडब्ल्यू हिंदी से बताते हैं कि ठेकेदार उन्हें पैसे देने का भरोसा देता रहा लेकिन पैसे नहीं दिए. अहीरवार कहते हैं कि एक साल तक ठेकेदार ने पैसे ठीक से दिए लेकिन अगले साल उसने उतने ही पैसे दिए जिससे भोजन का इंतजाम हो जाए. मतलब एक सप्ताह में सिर्फ दो हजार रुपये. अहीरवार बताते हैं, "बिना काम के दो महीने तक नोएडा में रहना पड़ा फिर उसके बाद मजबूरी में दिल्ली लौटना पड़ा." दिल्ली आने के बाद उन्होंने एक कपड़े की दुकान में काम करना शुरू किया.

अहीरवार का बेटा मनोज (बदला हुआ नाम) जो कि 15 साल से कम उम्र का था उसने भी नोएडा में उसी ठेकेदार के पास मजदूरी की. वैसे भारत में 14 साल से कम उम्र के बच्चों से मजदूरी जैसा शारीरिक काम कराना जुर्म है. नेशनल कैंपेन कमिटी फॉर इरैडिकेशन ऑफ बॉन्डेड लेबर के राष्ट्रीय संयोजक निर्मल गोराना अग्नि डीडब्ल्यू से कहते हैं भारत में श्रम कानून तो है लेकिन एक श्रमिक किस वातावरण में काम करेगा या वह कहां काम कर रहा है इसको लेकर कोई नीति नहीं है.

निर्मल गोराना कहते हैं, "देश में बेरोजगारी की दर लगातार बढ़ रही है और युवाओं के पास भी काम नहीं है. अगर लोगों को रोजगार नहीं मिलेगा तो देश का विकास कैसे होगा? जिन लोगों को काम मिल भी रहा है तो उनको उसके बदले सही भुगतान नहीं हो रहा है. अगर काम का दाम नहीं मिल रहा है तो यह एक तरह की गुलामी है."

निर्मल गोराना सवाल करते हैं कि मनोज को मजदूरी क्यों करनी पड़ी. उनका कहना है कि अगर वह काम नहीं करता तो परिवार के पास खाने के पैसे नहीं होते. गोराना कहते हैं, "मनोज को स्कूल जाने की जगह काम क्यों करना पड़ा क्योंकि स्थितियां ऐसी बन गई थीं कि काम नहीं करने पर परिवार को कोरोना काल में भूखा रहना पड़ता. पिता ने भी काम किया और बेटे ने भी. अगर वह काम नहीं करते तो उनके ऊपर कर्ज बढ़ता जाता. यह सब चीजें गुलामी का संकेत हैं. कामगार को काम तो मिल रहा है लेकिन मेहनत का पैसा नहीं मिल रहा है."

नहीं बदली गरीबों की स्थिति

मानसून सत्र के दौरान गरीबी पर पूछे गए एक सवाल के जवाब में वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी ने बताया था कि देश में करीब एक दशक में कोई आकलन जारी नहीं हुआ है. पिछला आकलन 2011-12 में जारी हुआ था. इसमें देश में गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले लोगों की संख्या 27 करोड़ आंकी गई थी. सरकार का कहना है कि देश की 21.9 फीसदी आबादी आज भी गरीबी रेखा से नीचे है. सरकार का कहना है कि गांवों में रहने वाला व्यक्ति हर दिन 26 रुपये और शहर में रहने वाला व्यक्ति 32 रुपये खर्च नहीं कर पा रहा है तो वह गरीबी रेखा से नीचे माना जाएगा.

राज्यों की बात की जाए तो छत्तीसगढ़ सबसे ज्यादा गरीब राज्य है. झारखंड, मध्य प्रदेश, ओडिशा और असम में भी गरीबी चरम पर है.

बच्चों पर भी असर

गरीबी में जीता परिवार उनके बच्चों के लिए मूलभूत सुविधाएं नहीं दे पाता है जिसकी जरूरत उन्हें होती है, उदाहरण के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य और पर्याप्त भोजन. कोरोना काल में आजीविका के नुकसान के कारण गरीब परिवारों को ऊंची दरों पर कर्ज लेकर परिवार चलाना पड़ा. इस दौरान बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हुई, उन्हें पोषण नहीं मिल पाया और यहां तक कि स्वास्थ्य को लेकर भी परिवार को समझौता करना पड़ा. किस तरह से कोविड के वर्षों के दौरान आजीविका के नुकसान ने बच्चों को प्रभावित किया इसको समझाते हुए 'चाइल्ड राइट्स एंड यू' की सीईओ पूजा मारवाह डीडब्ल्यू से कहती हैं "पिछले दो वर्षों में हमने भारत में आजीविका का भारी नुकसान देखा है, जिसका प्रभाव बच्चों पर पड़ा है. विशेष रूप से हाशिए के समुदायों पर. ऐसे समुदाय काफी हद तक प्रभावित हुए हैं."

मारवाह कहती हैं, "हालिया सीएमआईई (सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी) के आंकड़ों से पता चलता है कि बेरोजगारी दर मई 2022 में 7.1 प्रतिशत से बढ़कर जून 2022 में 7.8 प्रतिशत हो गई, जिसमें ग्रामीण भारत में बेरोजगारी 1.4 प्रतिशत अंक बढ़ गई. शहरी संदर्भ में जुलाई 2022 में बेरोजगारी दर 8.21 प्रतिशत है, हालांकि ग्रामीण भारत की स्थिति में कुछ सुधार दिखाई देता है. अंडरसर्व्ड समुदायों के बच्चों के साथ काम करने के क्राई के अनुभव से पता चलता है कि अत्यधिक गरीबी, वयस्कों के लिए आजीविका के अवसरों में अचानक गिरावट से बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण और सुरक्षा से संबंधित अवसरों तक पहुंचने की बात आती है तो बच्चों को और अधिक कमजोर बना दिया है."

कई राज्यों में रोजगार के अवसर बहुत कम

भारत के बच्चों पर महामारी के प्रभाव के बारे में विस्तार से बताते हुए, मारवाह ने डीडब्ल्यू को बताया, "स्कूलों को बंद करने से उन्हें करीब दो साल तक शिक्षा से दूर रखा गया, जिससे ड्रॉप-आउट का खतरा बढ़ गया. ऑनलाइन शिक्षा का लाभ आखिरी छोर तक पहुंचने में विफल रहा, इस प्रकार एक ऑनलाइन विभाजन पैदा हुआ. इसलिए, इस बात की बहुत अधिक संभावना है कि हाशिए के समुदायों के बच्चों को शिक्षा से हटाकर बाल श्रम और बाल विवाह की ओर धकेल दिया जाता है. ऐसे बच्चे अधिक संवेदनशील हो जाते हैं. स्कूलों के लंबे समय तक बंद रहने से बच्चों के मानसिक-सामाजिक कल्याण को भी नुकसान पहुंचा है."

ई-लर्निंग की मदद से शिक्षा के करीब आते गरीब बच्चे

CRY और TISS द्वारा संयुक्त रूप से किए गए एक हालिया अध्ययन के मुताबिक लगभग आधे बच्चों ने बताया कि उनकी दैनिक दिनचर्या "बहुत बदल गई है" और 50 प्रतिशत से थोड़ा कम ने "चिंतित महसूस करना" या "ऊबाऊ" होने की सूचना दी. लॉकडाउन के महीनों के दौरान आईसीडीएस और मिड डे मील भोजन सेवाओं में व्यवधान के साथ बहुआयामी गरीबी से पीड़ित परिवारों के बच्चे पोषण की कमी से प्रेरित प्रतिरक्षा से समझौता करने के लिए अतिसंवेदनशील हो सकते हैं.

मारवाह कहती हैं, "कुल मिलाकर, पिछले कुछ दशकों में हमारे बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण, मानसिक कल्याण और सुरक्षा के मुद्दों को सुरक्षित करने के लिए यह एक कठिन लड़ाई रही है और इस बात की बहुत अधिक संभावना है कि जो इस क्षेत्र में प्रगति हुई है वह अधूरी रह सकती है."

मनोज और उनके पिता की तरह हर दिन सैकड़ों लोग अपनी मेहनत की कमाई वापस पाने के लिए निर्मल गोराना जैसे लोगों के पास आते हैं. गोराना कहते हैं कि अहीरवार जैसे 10 पीड़ित हर दिन सिर्फ दिल्ली में उनके दफ्तर में अपनी गुहार लेकर पहुंचते हैं.

Source: DW

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