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महंगाई किस तरह से बिगाड़ रही है रसोई का बजट

दिल्ली की रहने वाली आरती सभरवाल

नई दिल्ली, 24 मई। बीते दिनों केंद्र सरकार ने आम लोगों को बड़ी राहत देते हुए पेट्रोल पर उत्पाद शुल्क में आठ रुपये और डीजल में छह रुपये प्रति लीटर की कटौती की घोषणा की थी. महंगाई के भारी बोझ तले जनता को ईंधन की कीमतों में कटौती से थोड़ी राहत तो मिली लेकिन हाल के महीनों घर में इस्तेमाल होने वाली हर चीज महंगी ही है.

दिल्ली की रहने वाली आरती सभरवाल पेट्रोल और डीजल के दाम में कटौती होने से थोड़ी राहत तो महसूस कर रही हैं लेकिन उनकी शिकायतें अभी कम नहीं हुईं हैं. गैस चूल्हे पर चाय चढ़ाते हुए, योगा ट्रेनर आरती कहती हैं कि केंद्र सरकार की कुछ नीतियों की वजह से महंगाई बहुत ज्यादा बढ़ गई हैं. आरती के मुताबिक, "आज के समय में हर चीज महंगी हो गई है, चाहे वह फल हों, सब्जियां या फिर चाय की पत्ती ही क्यों ना हो. हम जिस गैस से खाना बनाते हैं, वह भी महंगी है."

आरती के घर पर पाइप लाइन के जरिए गैस की सप्लाई होती है और हाल के दिनों में पीएनजी भी महंगी हो चुकी है. 14 अप्रैल से सरकार ने पीएनजी की कीमत 4.25 रुपये बढ़ाए थे. दिल्ली-एनसीआर में पीएनजी की सप्लाई करने वाली आईजीएल कंपनी के मुताबिक दिल्ली में पीएनजी के दाम 45.96 रुपये प्रति स्टैंडर्ड क्यूबिक मीटर (एससीएम) हो गए. आरती कहती हैं सरकार ने भले ही महंगा गैस सिलेंडर खरीदने वाले गरीबों को राहत दी है लेकिन जिनके घर पाइप से गैस आती है उन्हें कोई राहत नहीं.

खाना बनाना भी महंगा

बीते दिनों सरकार ने उज्ज्वला योजना के लाभार्थियों को 200 रुपये प्रति गैस सिलेंडर (साल में 12 सिलेंडर तक) की सब्सिडी देने की घोषणा की थी. केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा था इससे प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना के नौ करोड़ से अधिक लाभार्थियों को लाभ होगा.

वहीं पेट्रोल और डीजल पर उत्पाद शुल्क घटाने को लेकर सीतारमण ने कहा, "दुनिया इस वक्त मुश्किल वक्त से गुजर रही है. विश्व कोरोना महामारी से उबर ही रहा था कि यूक्रेन संकट आ खड़ा हुआ, जिससे आपूर्ति शृंखला और कई चीजों की कमी हुई है. इसके बावजूद हम आवश्यक वस्तुओं की कीमतों को नियंत्रण में रखने के लिए प्रतिबद्ध हैं."

दिल्ली की गृहिणी महेश कांता डीडब्ल्यू से महंगाई के बारे में बताती हैं कि इससे कोई व्यक्ति अछूता नहीं है. वह कहती हैं, "महंगाई से अमीर से अमीर और गरीब से गरीब इंसान प्रभावित है." वे अपनी रसोई में अरहर की दाल बना रही हैं और कहती हैं, इसे बनाने के लिए दाल के साथ-साथ रिफाइंड ऑयल भी चाहिए. कांता कहती हैं, "गरीब हो या अमीर हर कोई अरहर की दाल खाता है और रिफाइंड ऑयल का दाम ही देख लीजिए, बाजार में वह कहां से कहां पहुंच गया है. गरीब इंसान महंगाई के जाल में फंसता चला जा रहा है वहीं मिडिल क्लास परिवार अपने स्टैंडर्ड ऑफ लिविंग को बनाए रखने के लिए कर्ज लेता चला जाता है. और वह कर्ज के जंजाल में फंसता चला जाता है."

गृहिणी महेश कांता

बड़ी आबादी के लिए महंगाई की मुसीबत

वरिष्ठ आर्थिक पत्रकार प्रकाश चावला कहते हैं कि महंगाई देश की एक बड़ी आबादी के लिए असहनीय हो गई है. प्रकाश चावला डीडब्ल्यू से कहते हैं हर इंसान और हर सेक्टर महंगाई से प्रभावित हैं. चावला के मुताबिक, "आम इंसान, हर परिवार, घर की गृहिणी और घर से बाहर जाकर काम करने वाला हर व्यक्ति महंगाई से त्रस्त है."

वे कहते हैं, "घर से बाहर जाएंगे तो कुछ पैसे परिवहन में खर्च होंगे, बाहर कुछ खाना खाएंगे, किसी से बात करने के लिए टेलीफोन का इस्तेमाल करेंगे तो उसका बिल भी महंगा होगा. कुल मिलाकर आपके घर के बजट पर महंगाई का सीधा असर होता है." चावला कहते हैं कि इकोनॉमी अभी-अभी पटरी पर आनी शुरू हुई है और महंगाई के अनुरूप आमदनी में जो इजाफा होना चाहिए था वह नहीं हो पा रहा है और कंपनियां अब लागत में कटौती कर रही है.

रिकॉर्ड स्तर पर महंगाई

भारत में अप्रैल महीने में थोक महंगाई दर 15 फीसदी के ऊपर पहुंच गई जबकि भारत में महंगाई दर आठ साल के सबसे ऊंचे स्तर परपहुंच कर 7.8 फीसदी रही, जो मई 2014 के बाद सबसे ज्यादा थी. बढ़ती महंगाई के चलते ही इसी महीने भारतीय रिजर्व बैंक ने रीपो रेट को 0.40 फीसदी बढ़ाते हुए माना था कि आने वाले महीनों में जनता को महंगाई की ऊंची दरों से निजात नहीं मिलने वाली है. इन महत्वपूर्ण दरों को बदलने का इस तरह का फैसला आरबीआई ने लगभग दो साल बाद लिया था. पिछली बार मई 2020 में बैंक ने इन दरों में बड़ी कटौती की थी ताकि नकदी की आपूर्ति बढ़े, मांग बढ़े और अर्थव्यवस्था में तेजी आए.

चावला कहते हैं कि इस वक्त पूरी दुनिया में महंगाई की लहर है. वे उदाहरण देते हैं कि रूस-यूक्रेन युद्ध और कोरोना के कारण चीन में सख्त पाबंदी का सप्लाई चेन पर बुरा असर पड़ा है. उनका कहना है कि रूस-यूक्रेन युद्ध का समाधान आने वाले समय में दिखता नजर नहीं आता है. चावला उम्मीद जताते हैं कि अगर मानसून अच्छा हुआ तो हरी सब्जियों के दाम में थोड़ी नरमी देखने को मिल सकती है. साथ ही वे कहते हैं कि कई उत्पाद पैकेज्ड रूप में आते हैं तो उनके दामों कटौती की उतनी गुंजाइश नहीं है क्योंकि कंपनियों पर पहले से ही टैक्सेशन और महंगे कच्चे माल को लेकर काफी दबाव है.

वहीं महंगाई जिस रफ्तार से बढ़ी है और इस साल शेयर बाजार में जो उथल पुथल मची है, उससे आम निवेशक में अलग से ही चिंता है. वह अपने पैसे को सुरक्षित रखने के लिए बैंकों में फिक्स्ड डिपॉजिट कर रहा है लेकिन महंगाई की दर के मुकाबले बैंकों से मिलने वाला ब्याज कम है. चावला कहते हैं कि लोग बैंकों में पैसा तो रख रहे हैं लेकिन उनको उस पैसे के बदले में ब्याज के रूप में उतना मुनाफा नहीं हो रहा जितनी महंगाई दर फिलहाल बनी हुई है.

क्या दुनिया में खाना अब कभी सस्ता नहीं होगा?

महेश कांता उदाहरण देती हैं कि पहले जहां वह बाजार से 10 चीजें जितने पैसे में खरीद लाती थीं, अब उतने पैसों में पांच उत्पाद खरीद कर घर लाने को मजबूर हैं. शहर ही नहीं ग्रामीण इलाकों में भी ग्राहक आवश्यक चीजों को प्राथमिकता दे रहे हैं और गैरजरूरी चीजों को खरीदने से बच रहे हैं.

Source: DW

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