क्या स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा बनेंगे हिमाचल में भाजपा का चेहरा?

पीएम नरेन्द्र मोदी के शिमला दौरे के साथ ही भाजपा हिमाचल में चुनावी हुंकार भर चुकी है लेकिन आगामी विधानसभा चुनावों में भाजपा की बागडोर कौन संभालेगा, इस बात पर अभी भी संशय अभी बरकरार है।

शिमला। पीएम नरेन्द्र मोदी के शिमला दौरे के साथ ही भाजपा हिमाचल में चुनावी हुंकार भर चुकी है लेकिन आगामी विधानसभा चुनावों में भाजपा की बागडोर कौन संभालेगा, इस बात पर अभी भी संशय अभी बरकरार है। हालांकि पार्टी इस साल के अंत तक होने वाले प्रदेश विधानसभा के चुनावों के लिये पूरी तरह तैयार होने का दम भर रही है लेकिन नेता कौन होाग इसका जवाब कोई भी नहीं दे पा रहा है। दरअसल पूर्व सीएम प्रेम कुमार धूमल और केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा में कौन चुनावों में भाजपा का चेहरा होगा, इस बात को लकरे पार्टी में मंथन जोरों पर है। इसके चलते भाजपा का आम कार्यकर्ता कहीं न कहीं असमंजस में दिख रहा है। धूमल इस साल 74 साल के होने जा रहे हैं जिसके चलते असमंजस का महौल बना है।

 दोनों नेताओं का राज्य में हैं अपना रसूख

दोनों नेताओं का राज्य में हैं अपना रसूख

हालांकि दोनों नेताओं का राज्य में अपना-अपना रसूख है और दोनों के ही वफादारों की अपनी जमात है इसलिए जब तक स्थिति साफ नही हो जाती तब तक दोनों नेताओं के वफादारों में अंदरखाते चल रही खींचतान जारी रहेगी। इस वक्त हालात यह है कि दोनों नेताओं के वफादारों की जमात में शामिल क्षत्रप एक दूसरे को नीचा दिखाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ रहे। यह स्थिति तभी सुधर सकती है जब यह साफ हो जाए कि चुनावों में बतौर सीएम कौन पार्टी का प्रतिनिधित्व करेगा। लेकिन यह फैसला जल्द होता नजर नहीं आ रहा क्योंकि दोनों नेताओं की जड़ें मजबूत हैं और पार्टी हाईकमान भी फैसला नहीं ले रहा। हिमाचल आए पार्टी प्रभारी मंगल पांडे इसका जवाब देने से कतराते रहे। इससे पहले पार्टी अध्यक्ष अमित शाह भी इस सवाल को टाल गये थे।

कांगड़ा इलाके में कमजोर दिख रही है भाजपा

कांगड़ा इलाके में कमजोर दिख रही है भाजपा

प्रदेश में सरकार बनाने में जिला कांगड़ा का योगदान सबसे अहम रहता है। 68 सीटों वाली प्रदेश विधानसभा में 15 विधायक अकेले जिला कांगड़ा से ही चुने जाते हैं। इतिहास गवाह है कि जिसने भी जिला कांगड़ा को हल्के में लिया उसे सत्ता से बाहर रहना पड़ा है। 2012 के विधानसभा चुनावों में भी भाजपा के मिशन रिपीट में कांगड़ा ही रोड़ा बना था। प्रत्याशियों के चयन का खामियाजा भाजपा को कुछ इस तरह से भुगतना पड़ा था कि जो भाजपा के अपने थे ,वही बागी हो गए और चुनाव जीत भी गए। भाजपा ने जहां सीट गंवाई वहीं उन नेताओं को भी खुद से दूर कर लिया। आगामी चुनावों में भी वही नेता भाजपा को खासा नुकसान पहुंचा सकते हैं।

कांगड़ा के 11 विधानसभा भाजपा की नहीं कोई तैयारी

कांगड़ा के 11 विधानसभा भाजपा की नहीं कोई तैयारी

वर्तमान में भी जिला कांगड़ा की ही बात करें तो भाजपा की स्थिति कोई ज्यादा सुखद नहीं है। जसवां परागपुर से विधायक विक्रम ठाकुर और देहरा से रविंद्र रवि ही भाजपा के ऐसे विधायक हैं जो गाहे वगाहे कांग्रेस सरकार के खिलाफ मोर्चा खोलकर अपनी उपस्थिति का एहसास करवाते रहते हैं। सुलह से विपिन परमार और पालमपुर से प्रवीण शर्मा भी चुनाव हारने के बाद भी कहीं न कहीं चर्चा में रहते हैं। इसके अलावा 11 विधानसभा क्षेत्रों में भाजपा नेता सरकार को घेरने की बात तो दूर, अपने ही वजूद को बचाने में जुटे हुए हैं। इन 11 विधानसभा क्षेत्रों में फिलहाल विपक्ष तो कहीं नजर ही नहीं आ रहा।

कैसे पुरा होगा भाजपा का 60+

कैसे पुरा होगा भाजपा का 60+

ऐसे में भाजपा का मिशन 60 प्लस पूरा होगा या नहीं यह अपने आप में एक बड़ा सवाल है। अब जबकि भाजपा चुनावी वर्ष में आक्रामक मुद्रा में आने की बात कर रही है तो शायद कुछ असर दिखे लेकिन जब तक प्रदेश में शीर्ष नेतृत्व से लेकर विधानसभा क्षेत्र तक चेहरों की तस्वीर साफ नहीं होती तब तक मिशन 60 प्लस खुद को वहम में रखने के अलावा भाजपा के लिए कुछ भी नहीं होगा

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