Sumit Raj Vashisht: भारतीय बेटे ने फर्ज निभाया, ब्रिटिश पोते को शिमला में 93 साल बाद दादा की कब्र दिखाई, VIDEO
जानिए कैसे एक भारतीय इतिहासकार के समर्पण के कारण 100 साल से अधिक पुराने रिकॉर्ड हासिल करने में इंग्लैंड की दंपत्ती को कामयाबी मिली। कैसे पूर्वज की कब्र पर जाकर भावुक पोते ने दादा को श्रद्धांजलि दी।

कभी सोने की चिड़िया कहा जाने वाला हिंदुस्तान कई मायनों में खास है। इसे खास बनाते हैं यहां रहने वाले लोग और लोगों का वैल्यू से जुड़ाव। मूल्यों और अपनी जड़ों पर फख्र करने वाली सभ्यता का नाम भारत है। शायद इसी कथन को चरितार्थ करती हैं कवि डॉ कुमार विश्वास की कविता- 'एशिया के हम परिंदे' की चंद पंक्तियां, जिसमें उन्होंने लिखा है, 'जिंदा रहने का असल अंदाज सिखलाया है हमने, जिंदगी है जिंदगी के बाद समझाया है हमने।' इसी कविता की एक और पंक्ति है, 'हमने दुनिया में मोहब्बत का असर जिंदा किया है।' जानिए, मानवता का संदेश देने वाले देश हिंदुस्तान के बेटे- Sumit Raj Vashisht ने कैसे सात समंदर पार से आई दंपत्ती को 100 साल से अधिक समय बाद पूर्वजों की यादों से न केवल झकझोर दिया, बल्कि इनकी आंखों से करुणा भी छलक उठी। (सभी तस्वीरें साभार सोशल मीडिया- @shimlawalks)

ब्रिटिश हुकूमत के दौर में शिमला
कविता की इन पंक्तियों के आधार पर कहना गलत नहीं होगा कि यहां के हर प्रदेश में कई ऐसी कहानियां है, जो रोमांचित करने के साथ भावुक भी करती हैं। हिमाचल की राजधानी शिमला में रहने वाले सुमित राज वशिष्ठ एक ऐसा ही किरदार हैं जो सही मायनों में भारत की परंपरा और यहां की मिट्टी की खुशबू सात समंदर पार तक पहुंचाने का काम करते हैं। ये कहानी है एक ऐसे दंपती की जिनके पूर्वज सरजमीं-ए-हिंद में चिरनिद्रा में विश्राम कर रहे हैं। 100 साल से अधिक समय बीतने के बावजूद सुमित ने दो फिरंगियों को उनके पूर्वजों से मिलाया। कहानी ब्रिटिश हुकूमत वाले वर्षों की है।

भारत में पूर्वजों की तलाश
Shimla Walks Sumit Raj Vashisht की ऐसी अनोखी और सराहनीय पहल है जिसकी मदद से British Ancestors की तलाश में 100 साल से अधिक समय बाद भारत पहुंची दंपत्ती Simon Saily को सफलता मिली। सुमित ने England से शिमला आई दंपत्ती को उनके दादा-पिता के बर्थ और डेश सर्टिफिकेट दिलाए। भावुक दंपत्ती ने दादा की कब्र पर श्रद्धांजलि भी दी।

धार्मिक मान्यताओं का सम्मान, कब्र में हैं पूर्वज
दरअसल, हिमाचल की राजधानी शिमला कई मायनों में ऐतिहासिक शहर है। आज से सैकड़ों साल पहले प्रचंड गर्मी के मौसम में ब्रिटिश हुक्मरान इस शहर को समर कैपिटल बना चुके थे। तत्कालीन अधिकारियों की मौत होने पर यहां की जमीन में उन्हें उनकी धार्मिक मान्यता के आधार पर कब्र के लिए जमीन दी गई। ऐसे ही एक शख्स थे विलियम लिटरस्टर। भारत की आजादी से पहले शिमला नगर निगम में पोस्टेड विलियम का निधन आज से 93 साल पहले- 27 नवंबर, 1930 को हुआ था। विलियम के बेटे सिरिल बीट का जन्म 2 जुलाई, 1916 को शिमला में हुआ था। बाद में उन्होंने सेशंस जज के रूप में सेवाएं दीं।

पूर्वजों की तलाश में भारत के बेटे ने मदद की
अपने दादा-पिता की तलाश में भारत पहुंची दंपती कब्र की तलाश करना चाहती थी। इसमें उनकी मदद शिमला वॉक्स (Shimla Walks) के 56 साल के सुमित राज वशिष्ठ ने की। सुमित सोशल मीडिया पर भी काफी सक्रिय हैं। इसके अलावा वे इंटरनेट के इस दौर में विदेशी मेहमानों को उनके पूर्वजों से मिलाने का हर संभव प्रयास करते हैं। उन्होंने अपनी वेबसाइट बना रखी है। सुमित की पहल शिमला वॉक्स की मदद से ही इंग्लैंड में रहने वाली दंपती- साइमन और सेली को उनके पूर्वजों से जुड़ी यादों को सहेजने का सुनहरा मौका मिला। सुमित बताते हैं कि साइमन शिमला नगर निगम से अपने दादा का बर्थ और डेश सर्टिफिकेट हासिल करना चाहत थे। इसके अलावा उन्होंने पिता का जन्म प्रमाण पत्र भी लेने की ख्वाहिश प्रकट की।

पूर्वजों की यादें और शिमला वॉक्स के प्रयास
सुमित के प्रयासों का ही नतीजा रहा कि सात समंदर पास से भारत और फिर शिमला पहुंचने के बाद साइमन को अपने दादा की कब्र देखने का मौका मिला। उन्होंने फेसबुक पेज- @shimlawalks पर कई तस्वीरें और वीडियो भी शेयर की हैं। इसमें देखा जा सकता है कि दादा की यादों में खोए साइमन भावुक भी हो जाते हैं। उन्होंने मीलों दूर अपने पूर्वज की कब्र पर पहुंचने के बाद भावभीनी श्रद्धांजलि भी दी। साइमन के दादा ईसाई धर्मावलंबी थे, ऐसे में उन्हें निधन के बाद आज से करीब 9 दशक से भी अधिक समय पहले शिमका के संजौली कब्रगाह में पूरे सम्मान के साथ दफनाया गया था। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार सुमित पेशे से इतिहासकार हैं, उन्होंने साइमन के पूर्वजों की जानकारी जुटाने के बाद इंग्लैंड की दंपत्ती की पूरी मदद की। उन्होंने फेसबुक अकाउंट पर VIDEO भी शेयर की है।
नीचे देखिए वीडियो--
इतिहासकार बेटे ने 17 साल पहले शुरू की मुहिम
ब्रिटिश हुकूमत के दौर के सरकारी रिकॉर्ड खंगालने के बाद आजाद भारत में शिमला नगर निगम के अधिकारियों ने इंग्लैंड की दंपत्ती को बिल्कुल निराश नहीं किया। सुमित के प्रसायों से तमाम सूचनाओं का मिलान करने के बाद जन्म और मृत्यु प्रमाण पत्र जाकी कर दिए गए। मीलों दूर से भारत आने वाले विदेशी मेहमानों की मदद के बारे में सुमित बताते हैं कि आज से करीब 17 साल पहले उन्होंने शिमला वॉक्स की शुरुआत 2006 में की। इसका मकसद दूसरे देशों से आने वाले मेहमानों को शिमला में उनसे जुड़ी यादों और परिवारों को तलाशना और संभव होने पर पूर्वजों की तलाश करने वाले लोगों को सही जगह तक पहुंचाना है। बता दें कि मार्च और अप्रैल का महीना विदेशी पर्यटकों के लिहाज से शिमला के लिए काफी बिजी होता है।
पूर्वजों की 100 साल से अधिक पुरानी यादें
सुमित की सोशल मीडिया प्रोफाइल्स मसलन लिंक्डइन, ट्विटर और फेसबुक इस बात की गवाही देते हैं कि उन्होंने कई विदेशी मेहमानों को शिमला में एक इतिहासकार के रूप में सेवाएं दी हैं। इसी मानवीय मुहिम के तहत इंग्लैंड से पहुंची दंपत्ती साइमन और सेली को उनके पूर्वजों की 100 साल से अधिक पुरानी यादों से जुड़ने में कामयाबी मिली। सुमित बताते हैं कि शिमला में बड़ी संख्या में लोग पूर्वजों के रिकॉर्ड की तलाश में पहुंचते हैं। हजार शब्दों के पर्याय इन तस्वीरों और दंपत्ती की भावनाओं को देखकर इतना ही कहा जा सकता है कि शायद अपने पूर्वजों से ये कहना चाहते हैं-- 'धरा गगन के बीच कहां- बैठे हो गुमनाम से तुम'












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