VIDEO: हिमाचल के लल्लन टॉप नेता, नाच-गाकर मांग रहे हैं वोट
शिमला। हिमाचल प्रदेश में चुनावी मैदान में एक ऐसा किरदार भी है, जो अहम ओहदे पर रहते हुये भी लोगों का मनोरंज करके वोट मांग रहा है। यहां बात हो रही है चंबा जिला के भरमौर चुनाव क्षेत्र के कांग्रेस प्रत्याशी के तौर पर चुनाव लड़ रहे ठाकुर सिंह भरमौरी की। भरमौर अनूसूचित जनजाति के लिये आरक्षित चुनाव क्षेत्र है। भरमौरी 2012 में पांचवीं बार विधायक बने तो वीरभद्र सिंह की सरकार में वन मंत्री हैं। एक भेड़ पालक के बेटे के तौर पर राजनिति में आकर उन्होंने खूब नाम कमाया। पहले वह रेडियो सिंगर थे। 70 साल के भरमौरी प्रदेश के ऐसे मंत्री है। जिन्हें नाचने गाने का पूरा शौक है। वह सार्वजनिक तौर पर भी ठुमके लगाने से कभी गुरेज नहीं करते। यही वजह है कि वह सुर्खियों में रहते हैं। वह हमेशा ही खुशमिजाज रहते हैं।

मैं गद्दी हूं यह मेरा स्वभाव है
आम आदमी तक उनकी आसान पहुंच है। लेकिन यही रवैया उनके खिलाफ भी रहा है। विपक्ष उनकी इस खासयित को गैर जिम्मेदाराना रवैया कहता है। भरमौरी 1982, 85, 93 व 2003 और 2012 में विधायक चुने गये। लेकिन इस बार वन मंत्री बने तो उनके कार्यकाल के दौरान कई विवाद उभरे। जिससे उनकी काबिलियत पर सवाल उठते रहे हैं। लेकिन भरमौरी अपने तरीके से जिंदगी जीते हैं। मौजूदा चुनावों में भरमौर से लेकर पांगी तक ठाकुर सिंह भरमौरी की महफिलें सज रही हैं। उनका यह शौक आज लोगों के मनोरंजन का साधन बन गया है। लोग उनकी महफिलों में इकठ्ठा होकर उनके गानों व नाच का पूरा आनंद ले रहे हैं। हालांकि विपक्षी उनके इस शौक पर सवाल भी उठाते हैं। लेकिन खुद भरमौरी इसमें कुछ भी बुरा नहीं मानते है। वह कहते हैं कि मैं गद्दी हूं यह मेरा स्वभाव है।

अपना नृत्य सूबे के सीए वीरभद्र को मंच पर दिखा दिया
एक सभा में तो उन्होंने अपना नृत्य सूबे के सीए वीरभद्र को मंच पर दिखा दिया था। गद्दी बहुल्य भरमौर भौगोलिक दृष्टि से दुर्गम होने के कारण यहाँ की प्राचीन संस्कृति एवं परम्पराएं अपने मौलिक स्वरुप को बनाये रखने में काफी हद तक सफल रही हैं। गद्धी जनजाति मूल रूप से हिमालय की निवासी रही है इस जनजाति का मूल स्थान हिमाचल प्रदेश के चम्बा जिला का भरमौर (पूर्व में ब्रह्मपुर) रहा है गद्धी बहुल स्थान होने के कारण इसे गद्देरण भी कहा जाता है।

छात्र जीवन से ही वे एनएसयूआई में रहे
भरमौरी का जन्म 8 फरवरी 1947 को चंबा जिला के भरमौर में नानक चंद के घर हुआ था। छात्र जीवन से ही वे एनएसयूआई में रहे और फिर पंचायत प्रधान, बीडीसी और गद्दी यूनियन में रहे। भेड़-बकरी पालन गद्धी जनजाति के लोगों की जीवन प्रणाली की अहम् हिस्सा रहा है इसलिए ये लोग भेड़ -बकरियों के चराने के लिए भरमौर से दूसरे स्थानों पर ले जाते थे। भरमौर से धौलाधार -पीरपंजाल के बर्फीले पहाड़ों को लांघते हुए लाहौल-स्पीती, कुल्लू-मंडी, धर्मशाला एवं मैदानी इलाकों पंजाब के होशियारपुर तक भेड़-बकरियां के रेवड़ को चराते हुए बैसाखी को पुन: अपने घर पहुँचते हैं।












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