Himachal Pradesh Election 2017: कांग्रेस की परंपरागत सीट 'ठियोग' पर CPM का कब्जा, राकेश सिंघा जीते
हिमाचल प्रदेश विधानसभा में 24 साल बाद वामपंथ की एंट्री हुई है और दिलचस्प बात ये है कि 1993 के चुनाव में जब विधानसभा में सीपीएम का इकलौता विधायक पहुंचा था तो वो भी यही राकेश सिंघा थे।
शिमला। हिमाचल में प्रतिष्ठा का सवाल बनी 'ठियोग' सीट पर सीपीएम ने जीत दर्ज की है। ठियोग से सीपीएम उम्मीदवार राकेश सिंघा ने कांग्रेस प्रत्याशी हर्षवर्धन चौहान और भाजपा के बलदेव तोमर को हरा दिया है। राकेश सिंघा ने इस चुनौती में कांग्रेस उम्मीदवार को मात देते हुए 2131 सीटों से जीत दर्ज की है। हिमाचल विधानसभा चुनाव में जो नतीजे इस बार आए हैं वो लगभग संभावित ही माने जा रहे थे लेकिन एक सीट पर जिस तरह का नतीजा आया है, उससे संकेत मिलता है कि हिमाचल में अगर बीजेपी और कांग्रेस के अलावा कोई तीसरा विकल्प भी मजबूती से खड़ा हो तो जनता उसका साथ देने के लिए तैयार है। बात इन चुनावों में खासी चर्चा में रही सीट ठियोग की हो रही है। इस सीट पर ज्यादातर वक्त कांग्रेस का ही कब्जा रहा है और इस बार भी जब तत्कालीन मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह ने शिमला ग्रामीण की अपनी सीट अपने बेटे विक्रमादित्य के लिए छोड़ने का ऐलान क्या तो उन्होंने ठियोग से ही खुद चुनाव लड़ने की बात कही, हालांकि बाद में वो अर्की सीट से चुनाव मैदान में उतरे लेकिन वीरभद्र सिंह ने ऐसा क्यों किया, चर्चा में दो कारण रहे।

पहला की वीरभद्र के बाद प्रदेश में नंबर दो की नेता विद्या सटोक्स ने ठियोग की अपनी सीट वीरभद्र के लिए छोड़ी लेकिन उनके इस निर्णय से कांग्रेस के स्थानीय कार्यकर्ता नाराज हो गई, कार्यकर्ताओं का कहना था कि सटोक्स के अवाला अगर किसी और को यहां से चुनाव लड़ना है, तो वो स्थानीय नेता ही होना चाहिए। दूसरा कारण ठियोग सीट पर सापीएम के प्रत्याशी का बढ़ता कद चर्चा में रहा और हुआ भी यही कि ठियोग सीट से सीपीएम के उम्मीदवार राकेश सिंघा ने कांग्रेस और दो बार विधायक रहे बीजेपी के प्रत्याशी को पटखनी देते हुए जबरदस्त जीत हासिल की है।
हिमाचल प्रदेश विधानसभा में 24 साल बाद वामपंथ की एंट्री हुई है और दिलचस्प बात ये है कि 1993 के चुनाव में जब विधानसभा में सीपीएम का इकलौता विधायक पहुंचा था तो वो भी यही राकेश सिंघा थे, उस वक्त शिमला सीट से सिंघा ने जीत हासिल की थी। हिमाचल में वामपंथ का चेहरा माने जाने वाले राकेश सिंघा का राजनीतिक सफर काफी लंबा रहा है। इनका छवी हमेशा ही आम लोगों के लिए लड़ने वाले की रही है। राकेश सिंघा का जन्म 1956 में शिमला के कोटगढ़ इलाके में एक किसान परिवार में हुआ, परिवार आर्थिक तौर पर मज़बूत था इसलिए सिंघा को पढ़ाई का अच्छा मौका मिला और उन्होंनें अपनी स्कूली शिक्षा जाने माने स्कूल 'लॉरेंस स्कूल सनावर' से पूरी की इसके बाद स्नातक की पढ़ाई के लिए चंडीगढ़ गए और फिर आगे की उच्च शिक्षा के लिए हिमाचल प्रदेश यूनिवर्सीटी में दिखिला लिया। ये देश में आपातकाल का वक्त था और इसी दौर में राकेश सिंघा वामपंथी विचारों के प्रभाव में आए और यहां से छात्र राजनीति से शुरु हुआ उनका सफर आज भी जारी है। कांग्रेस की परंपरागत सीट ठियोग में उन्होंने 2131 सीटों से जीत दर्ज की है।
हिमाचल में जब भी बात किसानों की हो, कर्मचारियों की, छात्रों की या फिर मज़दूरों की राकेश सिंघा की आवाज़ हमेशा इनके हक के लिए उठी है। सक्रीय राजनीति में सिंघा 1985 में पहली बार शिमला नगर निगम में पार्षद के तौर पर चुने गए इसके बाद 1993 में शिमला से विधायक बने लकिन एक कानूनी मामले में हुई सजा के बाद उनके चुनाव को निरस्त कर दिया गया था। राकेश सिंघा का संघर्ष जारी रहा और नतीजा ये है कि इस बार ठियोग की जनता ने उन्हें एक बार फिर मौका दिया है।












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