हिमाचल प्रदेश: कांग्रेस भी अब वीरभद्र सिंह से करने लगी है किनारा
कांग्रेस पार्टी के हालात अब ऐसे हैं कि वीरभद्र सिंह की मुश्किलें बढ़ती जा रही हैं।
शिमला। चुनावों में मिली करारी शिकस्त के बाद अब कांग्रेस पार्टी अपने कद्दावर नेता वीरभद्र सिंह को भी किनारे लगाने लगी है। हालांकि वीरभद्र सिंह पूरी कोशिश में जुटे हैं कि किसी तरह कांग्रेस विधायक दल के नेता यानी विपक्ष के नेता का पद उनके हाथ लग जाए। पार्टी के हालात अब ऐसे हैं कि वीरभद्र सिंह की मुश्किलें बढ़ती जा रही हैं और पार्टी का बड़ा वर्ग चाह रहा है कि पार्टी में युवा जोश को तरजीह मिले। ताकि सत्तारूढ़ दल से बखूबी मुकाबला किया जा सके। हिमाचल विधानसभा का शीतकालीन सत्र 9 जनवरी से धर्मशाला के तपोवन में होने जा रहा है। इससे पहले विधायक दल का नेता कांग्रेस को चुनना है। पार्टी की ओर से इसके लिए प्रभारी सुशील कुमार शिंदे को तैनात कर दिया गया है लेकिन पिछले दिनों के दौरान जिस तरीके से राजनीतिक घटनाक्रम घट रहे हैं, उससे साफ है कि वीरभद्र सिंह की राहें अब आसान नहीं रहीं।

पिछले दिनों खुद वीरभद्र सिंह ने डिनर डिप्लोमेसी के जरिए लॉबिंग शुरू कर दी थी लेकिन प्रयास सिरे नहीं चढ़ पाए और सर्वसम्मति इस मामले पर नहीं बन पाई। दावा किया जा रहा कि वीरभद्र सिंह के साथ बहुमत है लेकिन वीरभद्र सिंह की ओर से दिए गए डिनर में 21 में से 17 विधायक ही जुट पाए। पार्टी अध्यक्ष सुखविंदर सिंह सुक्खू भी उसमें शामिल नहीं हुए। यही नहीं शुक्रवार को शिमला में राहुल गांधी के दौरे के दौरान भी वीरभद्र समर्थकों को कार्यक्रम से दूर ही रखा गया। उन्हें अंदर जाने की अनुमति नहीं मिल पाई। खुद राहुल गांधी ने पार्टी अध्यक्ष सुखविंदर सिंह सुक्खू और वीरभद्र सिंह के बीच चुनावों के दौरान चली कश्मकश पर नाराजगी जाहिर की।
बताया जा रहा है कि राहुल गांधी वीरभद्र सिंह के मनमाने रवैए से इन दिनों नाराज हैं। उन्होंने हिमाचल कांग्रेस में युवा नेतृत्व को आगे लाने की तैयारी शुरू कर दी है। यही वजह है कि पार्टी में अब वीरभद्र सिंह की साख घटती जा रही है। पार्टी के एक बड़े वर्ग की दलील है कि जब पार्टी अध्यक्ष राजपूत बिरादरी से हैं तो विधायक दल का नेता राजपूत नहीं बल्कि दूसरी जाति का बनाया जाना चाहिए। ताकि जातिगत समीकरण दुरुस्त रहे। पार्टी नेताओं की दलील है कि पार्टी में युवा नेताओं को आगे लाना चाहिए। वीरभद्र सिंह वैसे भी उम्रदराज हो चुके हैं। विपक्ष के नेता के पद के लिए किसी जुझारू नेता की जरूरत रहती है। लिहाजा इसके लिए किसी युवा नेता को ही तरजीह मिलनी चाहिए। माना जा रहा है कि भाजपा की जीत के पीछे भी सबसे बड़ा कारण युवा नेतृत्व ही रहा है। भाजपा ने इस बार युवाओं को ही ज्यादातर टिकटें दीं और चुनाव जीता लेकिन कांग्रेस में अभी भी बदलाव नहीं आ पाया है।












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