भारत-पाक जंग के 50 साल पूरे: इसी लड़ाई में हरियाणा के सूबेदार मेजर प्रताप ने पुंछ को दुश्मन से बचाया था

(Vijay Diwas 2020 News In Hindi), पानीपत। हिंदुस्तान में आज विजय ​दिवस मन रहा है। 50 बरस पहले हिंदुस्तान-पाकिस्तान का भीषण युद्ध हुआ था। सन् 1971 में पाकिस्तान ने 3 दिसंबर के दिन हिंदुस्तान के कई ठिकानों पर हवाई हमला कर इस युद्ध की शुरूआत की थी। हिंदुस्तान की तीनों सेनाओं ने उसी दिन कुछ ही घंटों के भीतर जवाबी कार्रवाई शुरू कर दी। फिर 13 दिनों तक दोनों देशों के बीच विभिन्न मोर्चों पर तरह-तरह के हथियारों से मुकाबला हुआ। मुख्य मुकाबला तो बांग्ला में चल रहा था, लेकिन पाकिस्तान ने हिंदुस्तान के भी कई ठिकानों पर सीधा हमला किया था। जिनमें कश्मीर, गुजरात और राजस्थान प्रांत के बॉर्डर इलाके शामिल हैं। 16 ​दिसंबर 1971 को पाकिस्तानी जनरल के सरेंडर से ये युद्ध समाप्त हुआ था। हरियाणा के रहने वाले कैप्टन प्रताप सिंह रमन ने भी उस युद्ध में हिस्सा लिया था। प्रताप अपनी बटालियन के साथ कश्मीर के पुंछ में पाकिस्तानियों से लड़े थे। उन्होंने और उनके साथियों ने दुश्मन के दांत खट्टे कर दिए। उसके बरसों बाद प्रताप ने एक बार फिर युद्ध से जुड़ी अपनी वो कहानी सुनाई, जिसे पढ़कर गर्व महसूस होगा।

उस रात 9 बजे शुरू हुई थी लड़ाई

उस रात 9 बजे शुरू हुई थी लड़ाई

84 वर्षीय आॅनरेरी कैप्टन प्रताप सिंह रमन पानीपत जिले के बलाना गांव से ताल्लुक रखते हैं। उन्हें एमएस (सूबेदार-मेजर) बुलाया जाता था। उन्होंने बताया​ कि, हम 8 जाट रेजिमेंट से धर्मशाला में तैनात थे। देश पर खतरे को भांपते हुए 30 नंवबर 1971 को हमारी बटालियन पुंछ पहुंची। जहां 3 ​दिसंबर की रात 9 बजे पाकिस्तान से युद्ध शुरू हो गया था। पहला हमला पाकिस्तानी वायुसेना ने बम ​गिराकर किया। मेरे पास और मेरे पांचों साथियों के पास मशीनगन थीं। दोनों तरफ से धुंआधार गोलियां चलीं। बंकरों के उूपर भी बमबारी हो रही थी।

खाना-पानी की सुध नहीं थी, 3 घंटे ही सो पाते थे

खाना-पानी की सुध नहीं थी, 3 घंटे ही सो पाते थे

प्रताप बोले- ''उस जंग के दौरान गोली लगने से हमारे 2 साथी घायल हो गए थे। हालांकि, कैप्टन राठी बटालियन के जवानों का हौंसला बढ़ाते रहे। कहा गया कि, युद्ध हार गए तो समझो जिंदगी हार गए। उन ​दिनों मुश्किल से 3 घंटे की नींद पूरी हो पाती थी। खाने-पीने की भी किल्लत रही। हम सभी मोर्चे पर डटे रहे और पुंछ सेक्टर को कटने से बचाया। 16 दिसंबर को जब हिंदुस्तान की जीत घोषित हुई, तब हमें बड़ी राहत मिली। उसके बाद 30 दिसंबर 1971 को मैं अपने गांव लौटा। वहां रिश्तेदार और गांववाले इंतजार कर रहे थे। उन्होंने मुझे कंधे पर बैठा लिया और स्वागत किया।

पिता ने कहा- मेरा बेटा सिर है

पिता ने कहा- मेरा बेटा सिर है

पिता फूलसिंह रमन ने कहा था- 'मेरा बेटा शेर है, सीना गर्व से चौड़ा हो गया। वहीं, मेरी पत्नी ने चूरमा बनाकर खिलाया।' प्रताप बोले कि, 'हम अपने गांव से पहले आॅनरेरी कैप्टन हुए। मैं 8 जाट रेजीमेंट में 20 अक्टूबर 1959 को भर्ती हुआ था। हमने 1962 और 1965 की लड़ाई भी लड़ी थी। आॅनरेरी कैप्टन के पद से 1989 में रिटायर ​हुए।''

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