ग्वालियर में सिंधिया शासक दूरबीन से करते थे इस देवी के दर्शन, खतरे से कर देती थीं आगाह
ग्वालियर में मांढरे की माता हैं सिंधिया घराने की कुलदेवी, सिंधिया शासक करते थे माता के दूरबीन से दर्शन
ग्वालियर, 28 सितम्बर। इन दिनों देशभर में नवरात्रि की धूम मची हुई है लेकिन ग्वालियर की कैंसर पहाड़िया पर स्थित मांढरे की माता पर साल भर भक्तों की भीड़ लगी रहती है। सिंधिया घराने की कुलदेवी मांढरे की माता सिद्धपीठ के रूप में पूजी जाती है। मांढरे की माता की विशेष कृपा सिंधिया घराने पर देखने को मिलती है। बताया जाता है कि हर खतरे के पहले ही माता द्वारा सिंधिया घराने को सपना देकर आगाह कर दिया जाता था।

149 साल पहले की गई थी देवी की स्थापना
मांढरे की माता के पुजारी अशोकराव मांढरे ने जानकारी देते हुए बताया कि मांढरे की माता महाकाली अष्ट भुजाधारी के रूप में यहां विराजमान है। 149 साल पहले महाराष्ट्र के सतारा से माता की मूर्ति को लाकर यहां स्थापित किया गया था। सिंधिया घराने के जयाजीराव सिंधिया ने अपने सेना के कर्नल आनंद राव मांढरे के आग्रह पर महाकाली की मूर्ति को महाराष्ट्र से लाकर ग्वालियर की कैंसर पहाड़ी पर स्थापित किया था।

आनंद राव मांढरे को महाराष्ट्र से लेकर आए थे जयाजीराव सिंधिया
आनंद राव मांढरे महाराष्ट्र के सतारा में महाकाली की पूजा किया करते थे। आनंद राव की कला को देखकर सिंधिया घराने के जयाजीराव सिंधिया आनंद राव मांढरे को अपने साथ ग्वालियर लेकर आई थे। यहां पर उन्होंने आनंद राव मांढरे को अपने लश्कर का कर्नल नियुक्त किया था। आनंद राव मांढरे का लश्कर लगान वसूली का काम किया करता था। आनंद राव मांढरे से जयाजीराव सिंधिया बेहद खुश रहा करते थे।

13 बीघा जमीन देकर मंदिर का करवाया निर्माण
सिंधिया शासक जयाजीराव सिंधिया ने पहाड़िया पर 13 बीघा जमीन देकर मंदिर का निर्माण करवाया। आनंद राव मांढरे के वंशजों द्वारा इस मंदिर की पूजा की जाती रही है। आज भी आनंद राव मांढरे के वंशज इस मंदिर में पुजारी के रूप में मौजूद हैं। आनंद राव मांढरे के वंशज और मंदिर के पुजारी बताते हैं यह माता का मंदिर सिद्ध पीठ के रूप में प्रसिद्ध है यहां पर सच्चे दिल से जो मन्नत मांगी जाती है वह जरूर पूरी होती है।

महाकाली प्रतिमा के दूरबीन से दर्शन करते थे सिंधिया शासक
सिंधिया महल का द्वार और मांढरे की माता मंदिर का द्वार आमने सामने है। जानकार बताते हैं किस सिंधिया शासक दूरबीन के माध्यम से प्रतिदिन मांढरे की माता के दर्शन किया करते थे। मांढरे की माता के दर्शन करने के बाद ही उनके दिन की शुरुआत हुआ करती थी। मांढरे की माता सिंधिया घराने की कुलदेवी भी हैं। यही वजह है कि सिंधिया घराने द्वारा कोई भी शुभ कार्य शुरू करने से पहले कुलदेवी पर दर्शन करने की परंपरा है।

सिंधिया घराने को सपना देकर खतरों से कर देती थीं आगाह
जानकार बताते हैं कि सिंधिया घराने की कुलदेवी मांढरे की माता की सिंधिया घराने पर विशेष कृपा रही है। सिंधिया घराने पर जब भी कोई संकट आता तो मांढरे की माता सपने में आकर उस संकट के बारे में पहले ही सिंधिया घराने को आगाह कर दिया करती थीं।

दशहरे पर सिंधिया घराने के लोग करते हैं शमी पूजा
दशहरे के दिन सिंधिया घराने द्वारा मांढरे की माता मंदिर पर पहुंचकर शमी पूजा की जाती है। अपने राजघराने की पोशाक को धारण करने के बाद सिंधिया घराने के लोग मांढरे की माता मंदिर पर पहुंचते हैं और यहां शमी पूजन करते है। मांढरे की माता मंदिर में मौजूद वृक्ष की सिंधिया घराने के सदस्यों द्वारा विशेष पूजा की जाती है। केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया अपने बेटे महा आर्यमन सिंधिया के साथ हर साल मांढरे की माता मंदिर पर पहुंचते हैं और यहां दशहरे की पूजा करते हैं।












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