ग्वालियर में गरजी सन 1857 की तोप, साधु-संतों ने उठाए हथियार

दशहरे के पर्व पर गंगादास की बड़ी शाला में चलाई गई सन 1857 की तोप, 1857 के समय के शस्त्रों का किया गया पूजन, इन शस्त्रों ले लड़ा गया ता अंग्रेजों के साथ युद्ध, झांसी की रानी के लिए 745 साधु-संतों ने दी थी शहादत

ग्वालियर, 5 अक्टूबर। दशहरे के पर्व पर ग्वालियर में सन 1857 के समय की तोप चलाई गई। साधु-संतों द्वारा सन 1857 के समय अंग्रेजों के साथ हुए युद्ध के दौरान इस्तेमाल किए गए शस्त्रों की पूजा की गई। यह पूरा नजारा ग्वालियर में स्थित गंगा दास की बड़ी शाला का था। जहां साधु-संतों ने दशहरे के पर्व पर अपने शस्त्रों का पूजन किया।

हर साल धूमधाम से होता है शस्त्र पूजन

हर साल धूमधाम से होता है शस्त्र पूजन

लक्ष्मी बाई समाधि स्थल के ठीक पीछे स्थित गंगा दास की बड़ी शाला में दशहरे के दिन काफी धूमधाम देखने को मिली। दशहरे की सुबह से ही यहां मौजूद साधु-संतों ने दशहरे की तैयारियां शुरू कर दी थी। शहर के गणमान्य नागरिकों समेत साधु-संतों का पहुंचने का सिलसिला गंगा दास की बड़ी शाला में शुरू हो गया। कुछ देर बाद सन 1857 की तोप भी गंगा दास की बड़ी शाला के परिसर में रख दी गई और सन 1857 के शस्त्र भी बाहर निकाल लिए गए।

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    दशहरे के दिन चली तोप, ग्वालियर में चलाई गई तोप
    झांसी की रानी को बचाने के लिए अंग्रेजों से किया था साधु-संतों ने युद्ध

    झांसी की रानी को बचाने के लिए अंग्रेजों से किया था साधु-संतों ने युद्ध

    गंगा दास की बड़ी शाला का अपना ही ऐतिहासिक महत्व है। सन 1857 में जब झांसी की रानी युद्ध में घायल होने के बाद गंगा दास की बड़ी शाला में पहुंची तो यहां उन्होंने अंग्रेजों से खुद की रक्षा के लिए यहां मौजूद साधु-संतों से मदद मांगी, जिसके बाद साधु-संतों ने रानी लक्ष्मीबाई की अंग्रेजों से रक्षा करते हुए यहां युद्ध किया और इस युद्ध में 745 साधुओं ने अपनी शहादत दी थी।

    अंग्रेजों से हुए युद्ध में चली थीं तोप और तलवारें

    अंग्रेजों से हुए युद्ध में चली थीं तोप और तलवारें

    झांसी की रानी को अंग्रेजों से बचाने के लिए गंगा दास की बड़ी शाला में रहने वाले साधुओं ने अंग्रेजों से युद्ध किया। युद्ध के दौरान 745 साधु-संत वीरगति के लिए प्राप्त हुए थे। साधु-संतों ने युद्ध के दौरान जिन शस्त्रों का उपयोग किया था, वह शस्त्र आज भी गंगा दास की बड़ी साला में सुरक्षित हैं। उस युद्ध में प्रयोग की गई तोप भी गंगादास की बड़ी शाला में आज भी महफूज है। दशहरे के दिन इस तोप और शस्त्रों का विशेष पूजन किया गया।

    दूर तक सुनाई दी तोप के धमाके की गूंज

    दूर तक सुनाई दी तोप के धमाके की गूंज

    गंगा दास की बड़ी शाला में मौजूद सन 1857 की तोप को पहले माला पहनाई गई और उसका पूजन किया गया। इसके बाद इस तोप को चलाया गया तो कि धमाके की गूंज काफी दूर तक सुनाई दी। तोप चलने के साथ ही वहां मौजूद लोगों ने बजरंगबली का जयकारा लगाया और जमकर तालियां बजाईं।

    साधु-संतों ने किया शौर्य प्रदर्शन

    साधु-संतों ने किया शौर्य प्रदर्शन

    गंगा दास की बड़ी शाला में रहने वाले साधु-संतों ने तलवार चला कर अपने शौर्य का प्रदर्शन किया। साधु-संतों द्वारा तलवार चला कर यह बताया गया कि अंग्रेजों से किस तरह साधु-संतों ने लोहा लिया था और साधु-संतों की तलवार के सामने अंग्रेज टिक नहीं सके थे।

    लोगों को अपने गौरवशाली इतिहास को नजदीक से जानने का मिला मौका

    लोगों को अपने गौरवशाली इतिहास को नजदीक से जानने का मिला मौका

    शहर के कई लोग गंगा दास की बड़ी शाला में आयोजित शस्त्र पूजन कार्यक्रम में शामिल होने के लिए पहुंचे थे। यहां मौजूद लोगों ने बताया कि यहां आकर उन्हें अपने देश के गौरवशाली इतिहास को नजदीक से जानने का मौका मिला है। 1857 की तोप और तलवारें देखकर यहां के लोग काफी उत्साहित नजर आए।

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