MP News: ग्वालियर हाईकोर्ट में अंबेडकर प्रतिमा विवाद ने लिया जातीय तनाव, भीम आर्मी नेता से वकीलों ने की मारपीट
MP News: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ के बाहर शनिवार को एक बार फिर हालात बेकाबू हो गए। डॉ. भीमराव अंबेडकर की प्रतिमा स्थापना को लेकर उठे विवाद ने अब खुले जातीय टकराव का रूप ले लिया है। कोर्ट परिसर में वकीलों और दलित संगठन भीम आर्मी के बीच तीखा टकराव हुआ, जो हाथापाई तक पहुंच गया।
हाईकोर्ट के बाहर सिटी सेंटर स्थित सड़क पर वकीलों ने भीम आर्मी के प्रदेश अध्यक्ष रूपेश केन और उनके साथियों के साथ पुलिस की मौजूदगी में मारपीट की। यह घटना पूरे प्रदेश में न्यायिक परिसर में कानून व्यवस्था और सामाजिक सौहार्द की स्थिति को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर रही है।

कैसे शुरू हुआ मूर्ति स्थापना का विवाद?
हाईकोर्ट परिसर में संविधान निर्माता डॉ अंबेडकर की प्रतिमा लगाने की पहल कुछ दलित वकीलों द्वारा की गई थी। उनका कहना था कि उनके पास प्रतिमा स्थापना की विधिवत अनुमति है, और यह संविधान के प्रति सम्मान का प्रतीक है।
हालांकि, ग्वालियर बार एसोसिएशन ने इस प्रस्ताव का कड़ा विरोध किया। उन्होंने कहा कि हाईकोर्ट की सात सदस्यीय बिल्डिंग कमेटी ने परिसर में किसी भी मूर्ति लगाने की अनुमति नहीं दी है। इसके बावजूद अंबेडकर अनुयायी एक क्रेन के जरिए मूर्ति लेकर कोर्ट पहुंच गए।
- इससे अदालत परिसर में भारी हंगामा हुआ और स्थिति बिगड़ने पर पुलिस प्रशासन को हस्तक्षेप करना पड़ा।
- वकीलों की चेतावनी और भीम आर्मी की एंट्री
- घटनाओं की कड़ी तब तेज हुई जब दो दिन पहले कुछ वकीलों ने मीडिया के सामने बयान देते हुए कहा:
- "यह कोर्ट है, कोई गली-मोहल्ला नहीं, भीम आर्मी को आकर दिखाना चाहिए।"
इस पर प्रतिक्रिया देते हुए भीम आर्मी नेता रूपेश केन शनिवार को अपनी टीम के साथ हाईकोर्ट के बाहर पहुंचे। वे शांतिपूर्वक खड़े थे, लेकिन जैसे ही शाम 5 बजे कोर्ट से वकील निकले, उन्होंने भीम आर्मी कार्यकर्ताओं को देखकर हंगामा शुरू कर दिया। पुलिस बल पहले से मौजूद था, फिर भी भीम आर्मी नेता के साथ मारपीट हुई। उन्हें सड़क पर घेरकर पीटा गया।
Ambedkar statue: जातीय तनाव की जमीन तैयार
यह विवाद अब सिर्फ मूर्ति स्थापना का नहीं रहा। यह साफ तौर पर वकीलों और दलित संगठनों के बीच जातीय संघर्ष की तस्वीर पेश कर रहा है। संविधान निर्माता की मूर्ति लगाने पर हुआ यह विरोध एक गहरी सामाजिक दरार को उजागर करता है, जो देश की न्यायिक व्यवस्था के सबसे प्रतिष्ठित परिसर में खुलेआम फूट रही है।
प्रशासन की भूमिका पर सवाल
पूरे घटनाक्रम के दौरान पुलिस बल मौनदर्शक बना रहा। न तो उन्होंने हमलावरों को रोका, न ही पीड़ितों की सुरक्षा सुनिश्चित की। भीम आर्मी का आरोप है कि यह हमला पूर्व नियोजित था और वकीलों ने उन्हें जानबूझकर उकसाकर घेरा। वहीं वकील पक्ष कह रहा है कि भीम आर्मी ने अनावश्यक रूप से हाईकोर्ट के बाहर आकर प्रदर्शन किया।
Ambedkar statue: अब आगे क्या?
- भीम आर्मी ने पूरे घटनाक्रम की एफआईआर दर्ज कराने की बात कही है।
- ग्वालियर पुलिस प्रशासन ने अब तक कोई औपचारिक प्रेस बयान नहीं दिया है।
- बार एसोसिएशन मूर्ति स्थापना पर आंदोलन की चेतावनी दे चुकी है।
- पूरे ग्वालियर में कानून व्यवस्था को लेकर अलर्ट जारी किया गया है।
सवाल जो उठ रहे हैं
- क्या हाईकोर्ट परिसर में जातीय संघर्ष का यह पहला उदाहरण है?
- क्या वकील समुदाय की ओर से हिंसा स्वीकार्य है, विशेषकर जब बात न्याय की हो?
- क्या संविधान निर्माता की मूर्ति पर विवाद, संवैधानिक मूल्यों के अपमान की श्रेणी में नहीं आता?
- पुलिस बल की निष्क्रियता की जिम्मेदारी किसकी?
नेताओं की प्रतिक्रियाएं
भीम आर्मी प्रमुख चंद्रशेखर आज़ाद ने कहा, "ग्वालियर में संविधान पर हमला हुआ है। हम बाबा साहब के सम्मान में पीछे नहीं हटेंगे।" दलित संगठन और अन्य सामाजिक कार्यकर्ता अब इस मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर उठाने की तैयारी कर रहे हैं।
ग्वालियर हाईकोर्ट परिसर में अंबेडकर की प्रतिमा को लेकर शुरू हुआ विवाद अब सिर्फ मूर्ति लगाने या न लगाने का मुद्दा नहीं रहा, यह एक आदर्श, पहचान और अधिकार की लड़ाई बन चुका है। आने वाले दिनों में यह मध्यप्रदेश की राजनीति और सामाजिक विमर्श का बड़ा केंद्र बन सकता है।












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