Surat LPG Crisis: LPG संकट की मार, प्रवासियों का पलायन, रेलवे स्टेशन पर भगदड़-लाठीचार्ज से हाहाकार

Surat LPG Crisis: गुजरात के सूरत स्थित उधना रेलवे स्टेशन पर 19 अप्रैल की सुबह 11:30 बजे के आसपास एक ऐसी भगदड़ मच गई कि पुलिस और आरपीएफ को लाठियां बरसानी पड़ीं। यूपी-बिहार जाने वाली ट्रेनों में सीट पाने के लिए हजारों प्रवासी मजदूर स्टेशन (Udhna Railway Station) पर उमड़ पड़े। लाइन तोड़कर आगे बढ़ने की कोशिश में स्थिति बिगड़ी, तो सुरक्षा बलों ने भीड़ को काबू में करने के लिए लाठीचार्ज कर दिया। सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में यात्री लोहे की जालियों पर चढ़कर कूदते नजर आए। इस दौरान गर्मी, प्यास और हताशा ने माहौल और तनावपूर्ण बना दिया।

ये महज एक ट्रेन की भीड़ नहीं थी। ये मिडिल ईस्ट जंग और उसके चलते भारत में फैले एलपीजी संकट का सीधा नतीजा था, जिसने सूरत की टेक्सटाइल इंडस्ट्री को हिला दिया है। लाखों मजदूर बिना खाना पकाने के ईंधन के मजबूर होकर घर लौट रहे हैं। समर वेकेशन की छुट्टियों ने भीड़ को और बढ़ा दिया। मामला सिर्फ एक स्टेशन की अफरा-तफरी नहीं, बल्कि वैश्विक संघर्ष का स्थानीय असर है। जहां दूर-दराज के गांवों से आए मजदूर अब शहर छोड़ने को विवश हैं।

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Surat LPG Crisis: एलपीजी संकट की जड़, मिडिल ईस्ट जंग और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज

भारत अपनी लगभग 60% एलपीजी जरूरतें आयात से पूरा करता है, और इनमें से 90% से ज्यादा सप्लाई स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (Strait of Hormuz) से गुजरकर आती है। 2026 में ईरान से जुड़े पश्चिम एशिया (मिडिल ईस्ट) संघर्ष ने इस महत्वपूर्ण जलमार्ग को प्रभावित किया। जहाजों की आवाजाही रुकी या धीमी पड़ गई, जिससे एलपीजी की सप्लाई चेन बाधित हो गई। मार्च-अप्रैल 2026 में भारत के आयात में भारी कमी आई। कुछ अनुमानों के मुताबिक 40-50% तक। घरेलू रिफाइनरियों ने उत्पादन बढ़ाने की कोशिश की, लेकिन मांग को पूरा नहीं कर पाईं।

सरकार ने घरेलू उपभोक्ताओं को प्राथमिकता दी, जिससे कमर्शियल और ओपन मार्केट सप्लाई और सिकुड़ गई। ब्लैक मार्केट में सिलेंडर की कीमतें आसमान छूने लगीं। सूरत जैसे औद्योगिक शहरों में मजदूरों के लिए स्थिति और बदतर हो गई। ज्यादातर प्रवासी मजदूर स्थानीय राशन कार्ड नहीं रखते, इसलिए उन्हें ओपन मार्केट से गैस खरीदनी पड़ती है। जब सप्लाई ही नहीं रही, तो खाना पकाना मुश्किल हो गया। कई मजदूर भूखे रहने या महंगे विकल्पों पर निर्भर होने लगे।

सूरत की टेक्सटाइल और पावरलूम इंडस्ट्री, जो भारत की सबसे बड़ी वीविंग हब है, बुरी तरह प्रभावित हुई। रिपोर्ट्स के मुताबिक, इंडस्ट्री को रोजाना करीब 15,000 गैस सिलेंडर की जरूरत होती है, लेकिन सप्लाई धीमी पड़ गई। उत्पादन घटकर 6.5 करोड़ मीटर से 4.5 करोड़ मीटर प्रतिदिन रह गया। करीब 30% यानी लगभग 3 लाख मजदूर पहले ही पलायन कर चुके थे। कई फैक्टरियां हफ्ते में 1-2 दिन बंद करने या उत्पादन कम करने पर मजबूर हुईं। कुछ यूनिट्स पूरी तरह बंद हो गईं। मजदूरों की कमी से इंडस्ट्री को और नुकसान का खतरा मंडरा रहा है।

Udhna Railway Station पर क्या हुआ? घटना का विस्तार

19 अप्रैल (रविवार) को उधना स्टेशन पर स्थिति तनावपूर्ण थी। समर सीजन और एलपीजी संकट के कारण यूपी-बिहार (UP-Bihar) जाने वाली ट्रेनों की मांग आसमान छू रही थी। रेलवे ने स्पेशल ट्रेनें चलाईं, लेकिन भीड़ अनियंत्रित हो गई।

सुबह करीब 11:30 बजे उधना-हसनपुर ट्रेन के लिए कतार लगाई जा रही थी। कुछ लोगों ने लाइन तोड़कर आगे बढ़ने की कोशिश की। स्थिति बिगड़ते देख पुलिस और आरपीएफ ने लाठीचार्ज किया। वायरल वीडियो में यात्री जालियों पर चढ़कर कूदते दिखे, बचने की कोशिश में। दोपहर तक 6 ट्रेनों से 21,000 से ज्यादा यात्री रवाना किए गए। पहली ट्रेन रात 1:30 बजे जयनगर के लिए, फिर मधुबनी आदि के लिए। स्टेशन के बाहर 3 किलोमीटर लंबी कतारें लगीं। गर्मी में घंटों इंतजार, कई लोग बेहोश हुए। पानी की भारी कमी और बोतलों के लिए धक्का-मुक्की शुरू हो गई।

रेलवे अधिकारी अनुभव सक्सेना ने बताया कि समर सीजन में स्पेशल ट्रेनें चलाई जा रही हैं और यात्रियों की संख्या की लगातार मॉनिटरिंग हो रही है। उन्होंने कहा कि लाइन तोड़ने की कोशिश हुई, इसलिए लाठीचार्ज करना पड़ा। रेलवे मुस्तैद है, लेकिन व्यवस्था बनाए रखना जरूरी है। रेलवे डीएसपी दीपक गौड़े ने भी कहा कि यात्रियों की संख्या अनुमान से कहीं ज्यादा थी। उन्होंने बच्चों वाले परिवारों से अनावश्यक इंतजार न करने की अपील की और अतिरिक्त ट्रेनों की जानकारी देने का आश्वासन दिया। यात्रियों ने रेलवे पर प्लानिंग की कमी का आरोप लगाया।

प्रवासी मजदूरों की मजबूरी: काम छोड़कर घर क्यों लौट रहे?

सूरत में लाखों मजदूर मुख्य रूप से बिहार, उत्तर प्रदेश, ओडिशा, पश्चिम बंगाल आदि से आते हैं। टेक्सटाइल, पावरलूम, डायमंड और संबंधित इंडस्ट्री में काम करते हैं। दिहाड़ी 300-700 रुपये तक होती है, लेकिन महंगाई और गैस संकट ने जीना मुहाल कर दिया। बिना गैस के खाना नहीं पक सकता, और ब्लैक मार्केट में कीमतें सामर्थ्य के बाहर हैं।

कई मजदूरों ने बताया कि वे कुछ दिन भूखे रहे या लकड़ी-कोयला जैसे विकल्पों पर निर्भर हुए। फैक्टरियों में काम कम होने से आय भी प्रभावित हुई। नतीजा ये है कि घर लौटने का फैसला लिया। ओडिशा के गंजाम जिले से आने वाले सात लाख से ज्यादा मजदूरों में से सैकड़ों पहले ही लौट चुके हैं। कुछ बसों से 1900 किलोमीटर का सफर तय कर रहे हैं।

COVID-19, Lockdown जैसा पलायन का नजारा?

ये पलायन कोविड काल की याद दिलाता है, जब लॉकडाउन में लाखों मजदूर पैदल घर लौटे थे। अब वैश्विक संघर्ष की वजह से बिना किसी सरकारी घोषणा के ही मजदूरों का एक्सोडस शुरू हो गया है।

व्यापक असर: इंडस्ट्री, अर्थव्यवस्था और समाज पर

  • टेक्सटाइल इंडस्ट्री: सूरत भारत की टेक्सटाइल एक्सपोर्ट का बड़ा केंद्र है। मजदूरों की कमी से उत्पादन प्रभावित, ऑर्डर डिले का खतरा।
  • अन्य शहर: मुंबई, बेंगलुरु, चेन्नई, हैदराबाद आदि में भी इसी तरह की स्थिति की खबरें आईं।
  • सरकारी प्रयास: घरेलू सप्लाई प्राथमिकता, पाइप्ड गैस कनेक्शन बढ़ाने की कोशिशें। कुछ जगहों पर इमरजेंसी कम्युनिटी किचन भी लगाए गए।
  • लंबी अवधि का खतरा: अगर होर्मुज की स्थिति नहीं सुधरी तो आयात और महंगा हो सकता है। भारत पाइप्ड नेचुरल गैस और वैकल्पिक स्रोतों (अमेरिका, रूस आदि) पर निर्भरता बढ़ाने की दिशा में सोच रहा है।

उधना स्टेशन की घटना एक चेतावनी है। वैश्विक भू-राजनीति का असर स्थानीय मजदूरों की रसोई तक पहुंच सकता है। भीड़ प्रबंधन, स्पेशल ट्रेनों की बेहतर प्लानिंग और संकट के समय मजदूरों के लिए वैकल्पिक सहायता की जरूरत उजागर हुई है। साथ ही, भारत को ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करने की जरूरत है। ताकि दूर के संघर्ष हमारे घरेलू जीवन और अर्थव्यवस्था को इस कदर न हिला सकें।

फिलहाल सूरत में स्थिति तनावपूर्ण बनी हुई है। रेलवे अतिरिक्त ट्रेनें चलाने की कोशिश कर रहा है, लेकिन एलपीजी संकट जड़ से हल न हुआ तो ऐसे दृश्य और देखने को मिल सकते हैं। हजारों मजदूर गर्मी, थकान और अनिश्चितता के बीच अभी भी घर लौटने का इंतजार कर रहे हैं।

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