Gujarat Chunav 2022: गुजरात में मछुआरों के लिए राहत का ऐलान, भाजपा को मिलेगा कितना फायदा ?
Gujarat assembly elections 2022: गुजरात में दिवाली से ठीक पहले सरकार ने मछुआरा समाज को खुश करने की बड़ी कोशिश की है। उनकी कई ऐसी लंबित मांगों को हरी झंडी दिखाई गई है, जिसके चलते भाजपा सरकार से उनका मोहभंग होना शुरू हो गया था। विपक्ष का कहना है कि मछुआरा समाज भाजपा सरकार की ओर से आखिरी वक्त में किए गए चुनावी ऐलानों की चाल समझता है, लेकिन बीजेपी से जुड़े मछुआरा समाज के नेताओं की राय अलग है। आइए जानते हैं कि बीजेपी सरकार के लिए चुनावों के ऐलान से ठीक पहले ये घोषणाएं क्यों जरूरी हो गई थी।

9 विधानसभा क्षेत्रों में प्रभावी भूमिका में हैं मछुआरे
गुजरात विधानसभा चुनावों की घोषणा का इंतजार हो रहा है। इस दौरान गुजरात में सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी हर उस समाज को राहत देने की कोशिश में दिख रही है, जिसको लेकर उसे किसी तरह के खतरे का अंदेशा है। इसी कड़ी में उसने गुजरात के मछुआरों को खुश करने के लिए कदम उठाया है, जिनके वोट कम से कम 9 विधानसभा सीटों पर काफी मायने रखते हैं। गुजरात सरकार के ताजा फैसले के बाद अब मछुआरे राज्य में किसी भी सरकारी मान्यता प्राप्त पेट्रोल पंपों से पेट्रोल खरीद सकते हैं, जबकि पहले उन्हें यह सुविधा सिर्फ गुजरात मत्स्य केंद्रीय सहकारी संघ की ओर से संचालित या इससे जुड़े सहकारी संघों के पेट्रोल पंपों पर ही उपलब्ध थी।

यह फैसले बहुत जरूरी थे- बीजेपी नेता
गुजरात सरकार मछुआरों को डीजल पर वैट में भी अधिकतम 15 रुपए प्रति लीटर की सब्सिडी देती है। लेकिन, मिट्टी के तेल से चलने वाले मोटर-बोट के लिए दी जाने वाली प्रति लीटर 25 रुपए की सब्सिडी को बढ़ाकर 50 रुपए प्रति लीटर कर दिया गया है। अब राज्य सरकार ने घोषणा की है कि मछुआरों के जो बोट पेट्रोल से चलते हैं, उन्हें भी मिट्टी के तेल वाली सब्सिडी योजना का लाभ मिलेगा। भाजपा को मछुआरों के लिए की गई इन घोषणाओं को लेकर काफी उम्मीदें हैं। इंडियन एक्सप्रेस ने बीजेपी के पूर्व राज्यसभा सांसद और मछुआरों के नेता चुनी गोहिल के हवाले से बताया है, 'यह बहुत ही अच्छी घोषणाएं हैं। मछुआरों ने बीजेपी से दूर जाना शुरू कर दिया था, क्योंकि लंबे समय से उनकी मांगें लंबित थीं और यह सोचने लगे थे कि उन्हें पार्टी से उनकी मांगें कभी पूरी नहीं होंगी।'

1.5 करोड़ लोग मछली कारोबार से जुड़े हैं
गुजरात की तटीय सीमा 1,600 किलोमीटर लंबी है, जिसकी वजह से यह देश का एक प्रमुख समुद्री मछली उत्पादक राज्य है। साल 2019-20 में इसके राष्ट्रीय उत्पादन में प्रदेश का 7.01% योगदान था। गुजरात में लगभग 29,000 मछली पकड़ने वाली नौकाएं पंजीकृत हैं, जिनमें से करीब 20,000 अपनी गतिविधियों में लगी रहती हैं। मछली व्यवसाय राज्य में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से करीब 1.5 करोड़ लोगों को रोजगार उपलब्ध करवा रहा है। गोहिल ने राज्य के मछुआरों के लिए की गई घोषणाओं का श्रेय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को देते हुए कहा, 'हमेशा गुजरात के मछुआरों से जुड़े विषयों के प्रति संवेदनशील रहे हैं।'

भाजपा को मिलेगा कितना फायदा ?
हालांकि, अखिल भारतीय मछुआरा संघ के अध्यक्ष वेल्जी मसानी ने सरकारी घोषणाओं का स्वागत तो किया है, लेकिन उनके मुताबिक इतना पर्याप्त नहीं है। उनका कहना है कि डीजल का कोटा मछुआरों की मांग से काफी कम है और उत्पाद शुल्क सब्सिडी की मांग अभी भी पूरी नहीं हो पाई है। मसानी भी बीजेपी से ही जुड़े हुए हैं। उनका कहना है कि करीब 18 जातियां परंपरागत मछुआरे हैं। इनमें खारवास (सबसे ज्यादा आबादी), मोहिला कोली, मछियारा मुस्लिम, भील, टंडेल मच्छी, कहार, वघेर और सेलार शामिल हैं। पोरबंदर असेंबली सीट पर यह दूसरे सबसे बड़े वोटरों का समूह है। सोमनाथ में भी यह नतीजों का रुख पलट सकते हैं। गोहिल अकेले व्यक्ति हैं, जो मछुआरा समाज से विधानसभा (1998) या लोकसभा (2014) का चुनाव जीते हैं। पोरबंदर और सोमनाथ के अलावा मछुआरे वेरावल, द्वारका, मंगरोल,राजुला, मांडवी (कच्छ), कोडिना और उना में भी काफी संख्या में हैं।

विपक्ष उठा रहा है फैसले पर सवाल
लेकिन, मछुआरा समाज के हित के लिए उठाए गए कदमों को लेकर अलग नजरिया भी देखने को मिल रहा है। पोरबंदर में खारवा चिंतन समिति के अध्यक्ष जीवन जुंगी का कहना है कि किसी भी पेट्रोल पंप से डीजल खरीदने की मछुआरों को छूट देने का फैसला बैकफायर कर सकता है, क्योंकि को-ऑपरेटिव सोसाइटी के पंप भी मछुआरों के द्वारा ही चलाए जाते हैं और इस फैसले से उन्हें नुकसान होगा। उन्हें अपने पंप बंद कर देने पड़ेंगे। जुंगी हाल ही में कांग्रेस छोड़कर आम आदमी पार्टी में शामिल हुए हैं और पोरबंदर सीट से चुनाव लड़ने वाले हैं। उनका कहना है कि मछुआरा समाज चुनाव से पहले भाजपा के इन घोषणाओं के चक्कर में नहीं आने वाले हैं। (तस्वीरें- सांकेतिक)












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