'अनगिनत आक्रमण, अटूट आस्था', सोमनाथ मंदिर पर हमले के 1000 साल, पीएम मोदी ने लिखा भावुक ब्लॉग
Attack Somnath temple 1000 years: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक भावुक और विचारोत्तेजक ब्लॉग के माध्यम से सोमनाथ मंदिर की हजार वर्षों की संघर्षपूर्ण, लेकिन गौरवशाली यात्रा को शब्द दिए हैं। यह ब्लॉग केवल एक मंदिर के इतिहास का वर्णन नहीं है, बल्कि भारत की सभ्यता, आस्था, स्वाभिमान और पुनर्जागरण की अदम्य शक्ति का प्रतीक है। सोमनाथ, जो बार-बार विध्वंस के बाद भी पुनः खड़ा हुआ, आज भी भारत की आत्मा का शाश्वत प्रतीक बना हुआ है।
सोमनाथ: भारत की आत्मा का प्रतीक
प्रधानमंत्री मोदी ने लिखा कि "सोमनाथ" नाम सुनते ही मन में गौरव और आस्था का भाव जाग उठता है। गुजरात के प्रभास पाटन में स्थित यह ज्योतिर्लिंग भारत की आध्यात्मिक चेतना और सांस्कृतिक निरंतरता का प्रतीक है। द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्रम में सोमनाथ का उल्लेख सबसे पहले आता है, जो इसकी सभ्यतागत और धार्मिक महत्ता को दर्शाता है।

बार-बार हुआ विध्वंस: आस्था पर आक्रमण
प्रधानमंत्री ने स्मरण कराया कगुजरात के प्रभास पाटन में स्थित सोमनाथ मंदिर पर पहला बड़ा हमला जनवरी 1026 ईस्वी में महमूद गजनवी द्वारा किया गया था, जिसने पवित्र ज्योतिर्लिंग को खंडित कर दिया। इसके बाद अलाउद्दीन खिलजी (1299), जफर खान (1395) और औरंगजेब (1706) जैसे शासकों ने भी इस श्रद्धा केंद्र पर आक्रमण किए। इन हमलों का उद्देश्य केवल भौतिक विनाश नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की आस्था और सांस्कृतिक चेतना को तोड़ना था। प्रत्येक हमले के बावजूद, मंदिर के पुनर्निर्माण के प्रयास लगातार जारी रहे। भारत की स्वतंत्रता के उपरांत, सरदार वल्लभभाई पटेल की दूरदर्शी पहल पर इसका वर्तमान भव्य स्वरूप निर्मित हो सका, जो 1951 में पूर्ण हुआ।
1026 से 2026: एक हजार वर्षों की गाथा
प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि वर्ष 2026 विशेष महत्व रखता है, क्योंकि यह सोमनाथ पर हुए पहले आक्रमण के 1000 वर्ष पूरे होने का साक्षी है। उन्होंने इसे मानव इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदियों में से एक बताया, लेकिन साथ ही यह भी रेखांकित किया कि इतनी बर्बरता के बावजूद सोमनाथ आज भी पूरे गौरव के साथ खड़ा है।
हर विध्वंस के बाद पुनर्निर्माण
प्रधानमंत्री ने लिखा कि हर हमले के बाद भारत की सभ्यता ने सोमनाथ को फिर से खड़ा किया। यह मंदिर विध्वंस की कहानी नहीं, बल्कि पुनर्जन्म और पुनर्निर्माण की जीवंत मिसाल है। 1026 के बाद कई बार इसके पुनर्निर्माण के प्रयास हुए, जो अंततः स्वतंत्र भारत में साकार हो सके।
स्वतंत्र भारत और सरदार पटेल की भूमिका
मोदी ने विशेष रूप से सरदार वल्लभभाई पटेल के योगदान को स्मरण किया। 1947 में दिवाली के समय सोमनाथ दर्शन के बाद सरदार पटेल ने इसके पुनर्निर्माण का संकल्प लिया। 11 मई 1951 को मंदिर का भव्य उद्घाटन हुआ, जिसमें तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद उपस्थित रहे। यह संयोग था कि सरदार पटेल उस ऐतिहासिक क्षण को देख नहीं पाए, लेकिन उनका सपना साकार हुआ।
नेहरू, राजेंद्र प्रसाद और ऐतिहासिक निर्णय
प्रधानमंत्री ने उल्लेख किया कि पंडित जवाहरलाल नेहरू इस समारोह को लेकर आशंकित थे और इसे धर्मनिरपेक्षता से जोड़कर देखते थे। इसके बावजूद डॉ. राजेंद्र प्रसाद अपने निर्णय पर अडिग रहे। उनका यह कदम भारत के इतिहास में एक साहसिक और निर्णायक क्षण बन गया।
के.एम. मुंशी और सभ्यता की अमरता
प्रधानमंत्री मोदी ने के.एम. मुंशी के योगदान को अविस्मरणीय बताया और उनकी पुस्तक "सोमनाथ: द श्राइन इटरनल" को अवश्य पढ़ने योग्य बताया। भगवद्गीता के श्लोक "नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि..." का उल्लेख करते हुए मोदी ने कहा कि सोमनाथ का ढांचा भले टूटा हो, लेकिन उसकी चेतना कभी नष्ट नहीं हुई।
विवेकानंद, अहिल्याबाई और आध्यात्मिक चेतना
मोदी ने स्वामी विवेकानंद की सोमनाथ यात्रा और उनके विचारों को याद किया, जिन्होंने इसे "राष्ट्रीय मन" और "राष्ट्रीय जीवन धारा" कहा था। साथ ही देवी अहिल्याबाई होलकर के योगदान को भी नमन किया, जिन्होंने पूजा और पुनर्स्थापन के प्रयास किए।
सोमनाथ: विनाश नहीं, विश्वास की कथा
प्रधानमंत्री ने कहा कि महमूद गजनवी जैसे आक्रमणकारी इतिहास के फुटनोट बन गए, जबकि सोमनाथ आज भी आशा, आस्था और सृजन का प्रकाश फैला रहा है। यह मंदिर सिखाता है कि घृणा में विनाश की शक्ति होती है, लेकिन आस्था में सृजन की अनंत क्षमता निहित है।
आज का संदेश और भविष्य का संकल्प
प्रधानमंत्री मोदी ने आह्वान किया कि यदि सोमनाथ हजार वर्षों के संघर्ष के बाद फिर खड़ा हो सकता है, तो भारत भी अपनी प्राचीन समृद्धि और गौरव को पुनः प्राप्त कर सकता है। उन्होंने विकसित भारत के संकल्प के साथ आगे बढ़ने का आग्रह किया और कहा कि आज पूरी दुनिया भारत को आशा और विश्वास की दृष्टि से देख रही है।












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