jnu में नेत्रहीन से पुलिस की बर्बरता पर फफक पड़े दादा और मां, कहा- न्‍याय की लड़ाई में बेटे के साथ

गोरखपुर। जेएनयू में फीस को लेकर प्रदर्शन के दौरान नेत्रहीन छात्र के साथ पुलिस ने बर्बरता की और लाठियों से पीटते रहे। जब छात्र ने नेत्रहीन होने का हवाला दिया, फिर भी पुलिसवालों का दिल नहीं पसीजा और गालियां देते हुए लाठियां चटकाते रहे। पुलिस का इस अमानवीय व्‍यवहार की सोशल मीडिया से लेकर हर जुबां पर भर्त्‍सना हो रही है। नेत्रहीन बेटे के दादा और मां की पुलिस की इस बर्बरता पर फफक पड़े। उसने बेटे का साथ देते हुए कहा कि न्‍याय की लड़ाई में वो बेटे के साथ खड़ी है।

रातोंरात सुर्खियों में आए नेत्रहीन शशि भूषण पांडेय

रातोंरात सुर्खियों में आए नेत्रहीन शशि भूषण पांडेय

जेएनयू से इतिहास विषय में रिसर्च स्‍कॉलर शशि भूषण पांडेय उस समय रातोंरात सुर्खियों में आ गए, जब पुलिस ने धरना-प्रदर्शन के दौरान उनके ऊपर जमकर लाठियां बरसाईं। शशि भूषण संतकबीरनगर जिले के दुधारा इलाके के रजापुर सरैया गांव के रहने वाले हैं। उनकी मां ऊषा पांडेय किसान डिग्री कालेज से स्‍नातक हैं। उन्‍होंने बताया कि दो बहनों के बीच छोटे और इकलौते शशि बचपन से ही नेत्र से दिव्‍यांग हैं। दोनों बहनों शादी हो चुकी है। उन्‍होंने बताया कि किसी के भी बच्‍चे को पुलिसवाले मारेंगे, तो भला किसे अच्‍छा लगेगा। इतनी बुरी तरह से उनका बेटे को मारा गया। न्‍याय की लड़ाई में वे उनके साथ हैं।

क्या बोले छात्र के दादा और मां

क्या बोले छात्र के दादा और मां

दादा फूलचंद पांडेय ने बताया कि वे बचपन से ही मेधावी हैं। शायरी, गीत-संगीत भी वे अच्‍छा गा लेते हैं। परिवार के लोगों ने उनकी प्रतिभा को देखते हुए आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया। इसी वजह से पिता अरविंद पांडेय ने उनका दाखिला गोरखपुर के लालडिग्‍गी स्थित‍ दृष्टि दिव्‍यांग विद्यालय में करा दिया। वहां पर उन्‍होंने कक्षा 8 तक की शिक्षा ग्रहण की। इसी बीच 11 साल की उम्र में साल 2007 में उनके पिता का निधन भी हो गया। उसके बाद वे वाराणसी के हनुमान प्रसाद अंध विद्यालय से इंटरमीडिएट किए।

सरकार से न्याय की उम्मीद

सरकार से न्याय की उम्मीद

दादा के मुताबिक, उसके बाद उन्‍होंने बीएचयू और इलाहाबाद में इंट्रेंस एग्‍जाम दिया। वे दोनों जगह पास कर गए और बीएचयू में उनका प्रवेश हुआ। उनके दादा ने कहा कि जिस तरह उनके साथ बर्बरता की गई है, वे रोने के अलावा कुछ नहीं कर सकते हैं। 750 किमी दूर होने के कारण रोने के अलावा उनके पास कोई चारा नहीं है। वे झट से पहुंच भी नहीं पा रहे हैं। वे सरकार से उम्‍मीद करते हैं कि सरकार उनकी ही नहीं, सारे गरीब बच्‍चों की सुनें। इसके साथ ही अपने अभिरक्षा में रखें, जिससे वे जीवन में कुछ कर सकें।

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