DDU University: गंगा के तराई मैदानी क्षेत्र में वायु प्रदूषण पर DDUGU के वैज्ञानिकों का महत्वपूर्ण शोध
DDU University News Uttar Pradesh: जलवायु परिवर्तन और वायु प्रदूषण पर गहन शोध करते हुए दीन दयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय (DDUGU) के वैज्ञानिकों ने गंगा के तराई मैदानी क्षेत्र (Indo-Gangetic Plain, IGP) में ब्लैक कार्बन (Black Carbon, BC) एरोसोल के प्रभाव का विस्तृत अध्ययन किया है।
इस अध्ययन का नेतृत्व डॉ. प्रभुनाथ प्रसाद (भौतिकी विभाग, DDUGU) ने किया, जिसमें डॉ. प्रयागराज सिंह, प्रो. शांतनु रस्तोगी, डॉ. आदित्य वैश्य, डॉ. मुकुंदा एम. गोगोई और डॉ. एस. सुरेश बाबू भी शामिल रहे।
शोध की मुख्य बातें
ब्लैक कार्बन जीवाश्म ईंधन (fossil fuels), जैव ईंधन (biofuels) और बायोमास जलाने (biomass burning) से उत्पन्न होता है और यह जलवायु परिवर्तन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह अध्ययन 2013 से 2023 के बीच गोरखपुर में भूमि-आधारित (ground-based) और उपग्रह (satellite) डेटा के माध्यम से ब्लैक कार्बन के बदलते रुझानों, स्रोतों और इसके नीति-निर्माण पर प्रभाव को समझने के लिए किया गया।

प्रमुख निष्कर्ष:
✅ मौसमी बदलाव:
ब्लैक कार्बन की सांद्रता सर्दियों में अधिकतम और मानसून में न्यूनतम पाई गई।
✅ बायोमास जलाने का प्रभाव:
खासतौर पर मानसून के बाद पराली जलाने के कारण ब्लैक कार्बन का स्तर बढ़ा हुआ पाया गया।
✅ उत्सर्जन में गिरावट:
शोध में पाया गया कि जीवाश्म ईंधन से उत्पन्न ब्लैक कार्बन में कमी आई है, जो यह दर्शाता है कि प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना (PMUY), राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (NCAP) और भारत स्टेज (BS) मानकों जैसी सरकारी नीतियाँ प्रभावी रही हैं।
✅ बायोमास जलाने की चुनौती:
बायोमास जलाने से उत्पन्न ब्लैक कार्बन में कमी नगण्य रही, जिससे इसका समग्र योगदान 1.17% प्रति वर्ष की दर से बढ़ रहा है। इससे स्पष्ट होता है कि पराली जलाने जैसी समस्याओं से निपटने के लिए लक्षित नीति-निर्माण की जरूरत है।
✅ प्रमुख स्रोत:
गोरखपुर में ब्लैक कार्बन प्रदूषण का मुख्य स्रोत गंगा के तराई क्षेत्र के पश्चिमी भाग से आने वाला प्रदूषण है।
बादलों और वायुमंडलीय संरचना पर अध्ययन
शोधकर्ताओं ने गोरखपुर में बादलों और वायुमंडलीय सीमा (Atmospheric Boundary Layer, ABL) की ऊँचाई का भी अध्ययन किया। मार्च 2024 में सीलोमीटर लिडार (CL-31) और स्वचालित मौसम स्टेशन स्थापित किए गए, जिनसे यह निष्कर्ष निकले:
• मानसून के दौरान बादलों की ऊँचाई कम पाई गई, जबकि प्री-मानसून में अधिक ऊँचाई पर बादल दिखे।
• बारिश के दिनों में बादलों की ऊँचाई में ज्यादा बदलाव हुआ, जबकि शुष्क दिनों में यह स्थिर रही।
• सैटेलाइट डेटा से तुलना में पाया गया कि ऊँचे बादलों की गणना में उपग्रह डेटा सीमित हो सकता है।
DDUGU की शोध उपलब्धियों पर कुलपति प्रो. पूनम टंडन का बयान
DDUGU की कुलपति प्रो. पूनम टंडन ने इस महत्वपूर्ण शोध पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा:
"यह शोध न केवल वैज्ञानिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह नीति-निर्माताओं को वायु प्रदूषण से निपटने के लिए ठोस दिशा भी देता है। गोरखपुर और संपूर्ण गंगा के तराई क्षेत्र के पर्यावरण और जलवायु पर इस शोध का गहरा प्रभाव पड़ेगा। यह दिखाता है कि हमारी नीतियाँ सही दिशा में हैं, लेकिन पराली जलाने जैसी चुनौतियों पर और अधिक ध्यान देने की जरूरत है।"
शोध दल और प्रकाशन
इस अध्ययन को भौतिकी विभाग, दीन दयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय के ARFI लैब में किया गया, जहाँ एथेलोमीटर, मौसम अध्ययन उपकरण और उपग्रह डेटा का उपयोग किया गया। शोधपत्र "Atmospheric Research" जैसी प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय पत्रिका में प्रकाशित हुआ है और इसे URSI-RCRS 2024 तथा FGRC-2025 में प्रस्तुत किया गया है।
अधिक जानकारी के लिए संपर्क करें:
डॉ. प्रभुनाथ प्रसाद
भौतिकी विभाग, दीन दयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय
ईमेल: [email protected]
DDUGU के बारे में
दीन दयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय (DDUGU) भारत के अग्रणी शिक्षण और अनुसंधान संस्थानों में से एक है। यह विश्वविद्यालय वायु प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन, खगोल भौतिकी और अंतरिक्ष विज्ञान जैसे क्षेत्रों में अत्याधुनिक अनुसंधान के लिए प्रसिद्ध है |












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