Ghazipur Bridge: गाजीपुर के इस गांव में मिसाल बनी जनशक्ति, चंदा और श्रमदान से बना रहे पुल, 50 गांवों को फायदा
Ghazipur Bridge News: उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले का एक छोटा सा गांव क्यामपुर छावनी इन दिनों पूरे इलाके में चर्चा का विषय बना हुआ है। वजह भी खास है-यहां के लोग बिना किसी सरकारी सहायता के अपने दम पर नदी पर पुल बना रहे हैं। यह कोई मामूली कोशिश नहीं, बल्कि एक ऐसा संकल्प है जो हजारों लोगों की जिंदगी आसान बना देगा।
मगई नदी पर बनने वाला यह पुल केवल क्यामपुर ही नहीं, बल्कि आसपास के दर्जनों गांवों के लिए राहत की सांस होगा। अब तक लोग स्कूल, अस्पताल या जिला मुख्यालय तक पहुंचने के लिए लंबा चक्कर काटते थे या फिर जर्जर नावों पर जान जोखिम में डालते थे। अब इस पुल से ये सारी मुश्किलें दूर हो जाएंगी।

इस काम की सबसे खास बात यह है कि इसे न सरकारी योजना से फंड मिला है, न ही किसी बड़े ठेकेदार ने इसे हाथ में लिया है। गांववालों ने खुद अपने स्तर पर चंदा इकट्ठा किया, श्रमदान किया और तकनीकी मदद भी जुटाई। आज यह पुल ग्रामीण एकता और आत्मनिर्भरता की सबसे बड़ी मिसाल बनता जा रहा है।
बरसों की परेशानी ने बनाया संकल्प
मगई नदी के पार बसे गांवों के लिए जिला मुख्यालय पहुंचने का सीधा रास्ता लगभग 10 किमी का है, लेकिन पुल न होने की वजह से यह दूरी 40 किमी तक पहुंच जाती थी। ग्रामीणों को स्कूल, अस्पताल, बाजार या सरकारी दफ्तर तक जाने में काफी परेशानी उठानी पड़ती थी।
स्कूल जाने वाले बच्चों की नाव पलटने की घटनाएं भी सामने आ चुकी हैं। ग्रामीण रोजाना जान हथेली पर लेकर नदी पार करते थे, जिससे कई बार हादसों का खतरा बना रहता था। इस सबने गांववालों को मजबूर कर दिया कि वे खुद कुछ करें।
बदलाव की शुरुआत और झटका
क्यामपुर गांव में बदलाव की बयार जून 2022 में बहनी शुरू हुई। ग्राम प्रधान शशिकला उपाध्याय ने ब्लॉक प्रमुख मनोज गुप्ता की मदद से पुल के प्रावधान की दिशा में कदम बढ़ाया। मनरेगा के तहत तटबंध पर काम भी शुरू हुआ, लेकिन प्रशासनिक अड़चनों के चलते इसे रोक दिया गया।
योजना अटकने से ग्रामीणों में निराशा फैल गई, लेकिन उम्मीद की एक नई किरण जनवरी 2024 में जागी जब सेना के रिटायर्ड इंजीनियर कैप्टन रवींद्र यादव अपने पैतृक गांव लौटे। उन्होंने देखा कि हालात आज भी जस के तस हैं और तब उन्होंने खुद कमान संभालने का फैसला किया।
रिटायर्ड अफसर ने उठाई जिम्मेदारी
कैप्टन रवींद्र यादव ने न केवल पुल का डिजाइन तैयार किया, बल्कि उसके निर्माण के लिए ग्रामीणों को संगठित भी किया। उन्होंने अपने संपर्कों से आर्किटेक्ट्स, ब्रिज इंजीनियर और स्थानीय लोगों का सहयोग लिया। जिनके पास पैसे नहीं थे, उन्होंने सामान या श्रमदान किया।
100 रुपए से लेकर सीमेंट, रेत, सरिया जैसी सामग्री तक-लोगों ने जो बन पड़ा, उसमें योगदान दिया। धीरे-धीरे यह एक सामूहिक अभियान बन गया, जिसमें गांववालों की मेहनत और लगन दिखने लगी। यह सिर्फ एक निर्माण नहीं, बल्कि पूरे समुदाय की भावना को दर्शाता है।
25 फरवरी, 2024 को गांववालों के बुलावे पर इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस शेखर कुमार यादव गांव पहुंचे और भूमि पूजन समारोह में हिस्सा लिया। उन्होंने ग्रामीणों के जज्बे की जमकर सराहना की और कहा कि यह एक प्रेरणादायक उदाहरण है, जिसे हर कोई अपनाना चाहेगा।
अब तक दोनों किनारों पर रिटेनिंग वॉल बन चुकी है और चार पिलर खड़े किए जा चुके हैं। स्लैबिंग का काम भी तेजी से चल रहा है। अनुमान है कि पुल का निर्माण पूरा होने में अब लगभग 30 लाख रुपये की और जरूरत है।
पुल के निर्माण में अब तक करीब 65 लाख रुपये खर्च हो चुके हैं। इस पूरे काम का हिसाब गांव के ही एक व्यक्ति कालिका रख रहे हैं। उनकी देखरेख में पारदर्शिता से सारा खर्च और सहयोग दर्ज किया जा रहा है। ग्रामीणों को भरोसा है कि यह पुल न केवल आवागमन बल्कि उनके आत्मसम्मान की राह भी खोलेगा।












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