गरीब देशों के प्राकृतिक संसाधन भी छीन ले रहे विकसित देश

बर्लिन, 07 मई। अभी मई महीने की शुरुआत ही हुई है, लेकिन जर्मनी का ओवरशूट डे आ गया है. दूसरे शब्दों में कहें, तो प्रति व्यक्ति के हिसाब से जर्मनी ने सिर्फ चार महीनों में इतने प्राकृतिक संसाधनों का इस्तेमाल कर लिया है जिसके फिर से उत्पादन के लिए प्रकृति को एक साल का समय चाहिए. अगर दुनिया भर के लोग जर्मनी की तरह रहने लगें, तो हमें उनकी जरूरतों को पूरा करने के लिए पृथ्वी जैसे तीन ग्रह चाहिए होंगे. हालांकि, हमारे पास सिर्फ एक ग्रह ही है. जर्मन डेवलपमेंट नेटवर्क आईएनकेओटीए में रिसोर्स जस्टिस की वरिष्ठ नीति सलाहकार लारा लुइजा जीवर ने कहा, "इसे चेतावनी का संकेत माना जाना चाहिए, जो हमें स्थिति की गंभीरता दिखाता है. यह हम सभी नागरिकों के साथ-साथ नेताओं और उद्योगों के लिए भी चेतावनी है कि हम इस तरह की स्थिति को लंबे समय तक जारी नहीं रख सकते." ओवरशूट डे निर्धारित करने का काम अंतरराष्ट्रीय थिंक टैंक ग्लोबल फुटप्रिंट नेटवर्क से जुड़े शोधार्थी करते हैं. वे कई सारे कारकों पर ध्यान देते हैं, जैसे कि हम कितना उपभोग करते हैं, किस मात्रा में और कितने समय में उत्पाद बनाते हैं, जनसंख्या कितनी है, और प्रकृति फिर से कितना उत्पादन कर सकती है. पर्यावरण और सतत विकास एनजीओ जर्मनवाच के प्रेस प्रवक्ता स्टेफन कूपर कहते हैं कि जर्मनी में ओवरशूट डे जल्दी आने की वजह यह है कि कृषि क्षेत्र और इमारतों में इस्तेमाल होने वाली ऊर्जा के लिए संसाधनों का काफी ज्यादा इस्तेमाल हुआ है. वह कहते हैं, "और यह जर्मनी के उधारी पर जीने और पृथ्वी के संसाधनों का जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल करने की दिशा में ले जा रहा है."
कोई सुधार नहीं
यह पहली बार नहीं है जब जर्मनी ने इतनी जल्दी अपने हिस्से के संसाधनों का इस्तेमाल कर लिया है. दरअसल, देश का आधिकारिक ओवरशूट डे पिछले कई वर्षों से एक ही तारीख के आसपास रहा है. कूपर कहते हैं, "और यह सबसे दुखद बात है. हम कम संसाधनों का इस्तेमाल करने या ग्रीनहाउस गैसों का कम उत्सर्जन करने की दिशा में कोई वास्तविक और दर्ज की जा सकने लायक प्रगति नहीं कर रहे हैं. इससे दूसरे देशों को गलत संदेश जाता है. हो सकता है कि वे देश जर्मनी को देखकर यह जानना चाहते हों कि वह उत्सर्जन की समस्या से कैसे निपट रहा है."
उन्होंने आगे कहा, "वह देख रहे हैं कि जर्मनी अपने जलवायु लक्ष्यों तक पहुंचने के लिए कोई खास प्रगति नहीं कर रहा है. ऐसे में, वे सोचेंगे कि यह उनके लिए भी प्राथमिकता का विषय नहीं है. इसलिए, जर्मनी को यह दिखाने के लिए बड़े और जरूरी कदम उठाने होंगे कि उसने न सिर्फ लक्ष्य निर्धारित किए, बल्कि उस तक पहुंचने के लिए कुछ काम भी कर रहा है."
ज्यादा संसाधन इस्तेमाल कर रहे अमीर देश
जर्मनी ऐसा पहला देश नहीं है जो साल की पहली तिमाही में ही ओवरशूट डे की सीमा-रेखा को पार कर गया. कतर, लक्जमबर्ग, कनाडा, संयुक्त अरब अमीरात और संयुक्त राज्य अमेरिका सहित कई अन्य देश इस सीमा-रेखा को काफी पहले पार कर चुके हैं. जीवर का कहना है कि एक सच्चाई यह है कि औद्योगिक रूप से विकसित देश, कम विकसित देशों के संसाधनों पर आश्रित हैं. जमैका, इक्वाडोर, इंडोनेशिया, क्यूबा और इराक जैसे देश साल के अंत तक भी ओवरशूट डे की सीमा-रेखा तक नहीं पहुंचेंगे. ये तुलनात्मक रूप से काफी कम संसाधनों का इस्तेमाल करते हैं.

जीवर ने कहा, "जर्मनी दुनिया में कच्चे माल का पांचवां सबसे बड़ा उपभोक्ता है और दक्षिणी गोलार्ध के देशों से 99 फीसदी खनिजों और धातुओं का आयात कर रहा है. दक्षिणी गोलार्ध के ये देश, विकसित देशों की तुलना में समान मात्रा में कच्चे माल का उपभोग नहीं करते हैं, लेकिन मानवाधिकारों का हनन और पर्यावरणीय क्षति जैसी कीमत चुकाते हैं."
पिछले कई दशक से जारी दोहन
करीब 50 साल पहले तक, पृथ्वी पर इतने संसाधन मौजूद थे जो इंसानों की जरूरत को पूरा करने से काफी ज्यादा थे, लेकिन धीरे-धीरे इंसानों की खपत बढ़ती गई और 'अर्थ ओवरशूट डे' होने लगा. अब यह तारीख हर साल के कैलेंडर में दिखने लगी है. इस वर्ष अभी तक अर्थ ओवरशूट डे की घोषणा नहीं की गई है. इससे पहले साल 2020 में यह 22 अगस्त थी. वहीं, 1970 में 30 दिसंबर और 1990 में 10 अक्टूबर थी. 2010 में यह तारीख 6 अगस्त को पड़ी थी. कूपर कहते हैं, "मुझे यह बात सबसे ज्यादा चिंतित करती है कि हम दशकों से अपने संसाधनों का काफी ज्यादा इस्तेमाल कर रहे हैं. यह पूरी दुनिया में हो रहा है. हमें संसाधनों के तेजी से बढ़ते इस्तेमाल पर तुरंत रोक लगाने की जरूरत है."
क्या बदलाव होना चाहिए?
अर्थ ओवरशूट डे को लेकर जो सबसे ज्यादा जिम्मेदार कारक हैं उनमें से एक है कार्बन उत्सर्जन. फिलहाल, पूरी दुनिया में मानवीय क्रियाकलापों की वजह से 60 फीसदी कार्बन का उत्सर्जन होता है. अगर हम कार्बन उत्सर्जन को आधा कर देते हैं, तो तीन महीने बाद अर्थ ओवरशूट डे पर पहुंचेंगे.
अक्षय ऊर्जा के इस्तेमाल को बढ़ावा देना, उत्सर्जन में कटौती के सबसे कारगर तरीकों में से एक है. हालांकि, जीवर का कहना है कि हमें अक्षय ऊर्जा को विकसित करने में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल से जुड़ी लागत पर भी ध्यान देना होगा. वह कहती हैं, "हर कोई अक्षय ऊर्जा के इस्तेमाल को बढ़ावा देने की बात कर रहा है, लेकिन हमें इसके लिए खनिज और धातुओं की जरूरत होती है, जैसे कि कोबाल्ट, लीथियम, और निकल. हम अक्सर भूल जाते हैं कि वैश्विक कार्बन डाइ ऑक्साइड उत्सर्जन का 11 फीसदी इन धातुओं के प्रसंस्करण के दौरान निकलता है." जीवर सिविल सोसायटी के साथ काम कर रही हैं, ताकि दूसरे देशों से कच्चे माल के आयात और उसके इस्तेमाल में कमी लाई जा सके. इसका फायदा होता भी दिख रहा है. जर्मन सरकार ने अपने समझौते में कच्चे माल की खपत कम करने की योजना बनाई है.
बदलाव के लिए भी हो रहे प्रयास
नागरिकों की कई पहल, नगरपालिकाओं की नीतियां, और कारोबार से जुड़ी रणनीतियां पहले से ही कई तरह का बदलाव ला रही हैं, जिनका असर आने वाले वर्षों में जर्मनी के ओवरशूट डे पर हो सकता है. पश्चिमी जर्मनी के शहर वुपरटाल में, नागरिकों ने पुराने रेलमार्ग को साइकिल के लिए इस्तेमाल होने वाली सड़क के रूप में बदलने की शुरुआत की है. उम्मीद की जा रही है कि अगले 30 वर्षों में इस सड़क का इस्तेमाल साइकिल चलाने वाले 9 करोड़ लोग करेंगे.
नीति-निर्माताओं ने जर्मनी के आखेन शहर को 2030 तक कार्बन-न्यूट्रल बनाने के लिए रणनीतिक तैयारियां की है. यहां मौजूद इमारतों की छतों पर सोलर प्लेट लगाए जाएंगे जिससे इलाके के सभी लोगों को पर्याप्त बिजली मिलेगी. 150 रूफटॉप सोलर प्लेट को इंस्टॉल करने के लिए पैसे की व्यवस्था हो चुकी है. इस साल 1000 और सोलर प्लेट लगाने की दिशा में काम किया जा रहा है. कूपर का मानना है कि फ्राइडे फॉर फ्यूचर जैसे अभियानों से नेताओं पर दबाव बढ़ता है और इस तरह के कदम उठाए जाते हैं. उनका कहना है कि अर्थ ओवरशूट डे जैसी तारीखें दुनिया भर में चेतावनी देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है. वह कहते हैं, "जब हमने अन्य संगठनों के साथ ओवरशूट डे के बारे में जागरूकता बढ़ाना शुरू किया, तो शायद ही किसी को इसके बारे में पता था. हालांकि, अब काफी लोग इसे लेकर जागरूक हो गए हैं. हमें इसकी जरूरत है. जनता के दबाव के बिना कोई भी बदलाव संभव नहीं है." वह कहते हैं, "जब हमने अन्य संगठनों के साथ ओवरशूट डे के बारे में जागरूकता बढ़ाना शुरू किया, तो शायद ही किसी को इसके बारे में पता था. हालांकि, अब काफी लोग इसे लेकर जागरूक हो गए हैं. हमें इसकी जरूरत है. जनता के दबाव के बिना कोई भी बदलाव संभव नहीं है."
Source: DW
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