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Mental Health: मानसिक स्वास्थ्य की चिंताजनक हालत? जानिए खुद को ठीक रखने के उपाय

मानसिक स्वास्थ्य की चर्चा आम बात है, क्योंकि हर साल करोड़ों लोग इनसे पीड़ित होते हैं। एक अनुमान के अनुसार हर तीन में से एक महिला और पांच में से एक पुरुष अपने जीवन में कभी न कभी बड़े अवसाद का अनुभव करते हैं। लाखों लोग सिज़ोफ्रेनिया यानि खंडित मानसिकता के भी शिकार हैं।

पूर्व पॉप स्टार, रैपर और डांसर ऐरोन कार्टर, दुनिया के सबसे प्रतिभाशाली गणितज्ञ जॉन नैश , भारत की पूर्व सिने स्टार परवीन बॉबी और मनीषा कोइराला जैसी मशहूर हस्तियां भी मानसिक रोग के शिकार हो चुकी हैं।

Worrying mental health condition? Know the ways to keep yourself healthy

10 अक्तूबर को वैसे तो पूरी दुनिया में हर साल विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस के तौर पर मनाया जाता है और इसका उद्देश्य लोगों को मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूक करना और मानसिक बीमारियों के बारे में जानकारी देना है, इसलिए हमें भी जानना चाहिए कि मानसिक विकार से बचने के लिए क्या करना जरूरी है।

वर्तमान जीवनशैली में युवा हों या बुजुर्ग, सभी उम्र के लोगों में दबाव, चिंता और किसी तरह की परेशानी के कारण वे मानसिक बीमारियों के शिकार हो रहे हैं। मानसिक विकार शरीर पर तो प्रभाव डालता ही है। साथ ही व्यक्ति के मन में आत्महत्या तक के ख्याल आने का कारण बन जाता है। इन्हीं मानसिक विकारों के प्रति लोगों के बीच जागरूकता फैलाने के उद्देश्य से विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस मनाया जाता है।

विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस का इतिहास
विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस को मनाने की शुरुआत 10 अक्टूबर, 1992 में हुई। जब संयुक्त राष्ट्र के उप महासचिव रिचर्ड हंटर और वर्ल्ड फेडरेशन फॉर मेंटल हेल्थ ने इसकी पहल की। दरअसल वर्ल्ड फेडरेशन फॉर मेंटल हेल्थ तकरीबन 150 देशों वाला एक वैश्विक मानसिक स्वास्थ्य संगठन है। इसके बाद साल 1994 में संयुक्त राष्ट्र के तत्कालीन महासचिव यूजीन ब्रॉडी ने मानसिक स्वास्थ्य दिवस की एक थीम का निर्धारण कर इसे मनाने की सलाह दी। उस साल पहली बार 'दुनिया भर में मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता में सुधार' थीम के साथ विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस मनाया गया। वहीं इस साल की थीम 'मेंटल हेल्थ इज ए यूनिवर्सल ह्यूमन राइट' यानी 'मानसिक स्वास्थ्य एक सार्वभौमिक मानव अधिकार है'।

क्या है ये मानसिक बीमारी?
मानसिक बीमारी एक तरह का मानसिक स्वास्थ्य विकार है। ऐसे में व्यक्ति डिप्रेशन, टेंशन, सिजोफ्रेनिया और ईटिंग डिसऑर्डर इत्यादि का शिकार हो जाता है। दुनिया समेत भारत में भी बहुत से मानसिक रोगी बदनामी की वजह से अपना इलाज करवाने से कतराते हैं। उन्हें लगता है कि लोग क्या सोचेंगे? मेयो क्लिनिक वेबसाइट पर उपलब्ध जानकारी के मुताबिक मानसिक रोग के लक्षण कई हैं।

• हर समय उदास या निराश महसूस करना
• ध्यान केंद्रित न कर पाना या मन में बेचैनी रहना
• बहुत चिंता या भय का होना
• अपराध की भावनाएं महसूस करना
• मानसिक स्थिति में बहुत बदलाव होना
• समाज, परिवार और दोस्तों से दूर रहना
• शरीर में थकान और ऊर्जा में कमी
• नींद ज्यादा या बहुत कम आना
• वास्तविकता से अलग भ्रम की स्थिति में रहना
• अपने रोजमर्रा के काम में हद से ज्यादा आलस आना
• आत्महत्या करने के विचार आना

भारत में लोगों का मानसिक स्वास्थ्य
1982 में राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम भारत में शुरू किया गया था। इसका उद्देश्य मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को विकसित करना था। इसे लेकर साल 2016 में नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरो साइंस ने देश के 12 राज्यों में एक सर्वे कराया था। जिसके मुताबिक करीब 3 प्रतिशत लोग डिप्रेशन जैसे कॉमन मेंटल डिसऑर्डर से जूझ रहे थे। जबकि 5 प्रतिशत से ज्यादा लोग कभी न कभी अतीत में ऐसी ही मानसिक समस्याओं से जूझ चुके हैं।
इस सर्वे के मुताबिक भारत में करीब 15 करोड़ से ज्यादा लोगों को किसी ना किसी तरह की मानसिक परेशानी थी। ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजीज (जीबीडी) स्टडी इंडिया का अनुमान है कि 2017 में भारत में 10 साल से अधिक उम्र के 46 मिलियन लोग अवसादग्रस्त थे। उम्र के साथ इसकी व्यापकता बढ़ती जा रही है और 60 वर्ष से अधिक की आयु वाले 6·5 प्रतिशत लोगों में यह दर ज्यादा है।

कम लोगों को उपलब्ध है इलाज
साइंस मैगजीन लैंसेट की एक रिपोर्ट की मानें तो एक दशक पहले भारत में 10 जरूरतमंद लोगों में से सिर्फ एक को ही डॉक्टरी मदद मिल पाती थी। अब भी भारत में हालत ज्यादा नहीं सुधरे हैं। अक्टूबर, 2019 में बीबीसी में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में मानसिक समस्या से ग्रसित लोगों की संख्या बहुत तेजी से बढ़ रही है और आने वाले दस सालों में दुनियाभर के मानसिक समस्याओं से ग्रसित लोगों की एक तिहाई संख्या भारतीयों की हो सकती है। क्योंकि, भारत में बड़े स्तर पर बदलाव हो रहे हैं। गांव खत्म हो रहे हैं और शहर फैल रहे हैं। आधुनिक सुविधाएं बढ़ी हैं और लोग गांवों से पलायन कर शहरों में भीड़ बढ़ा रहे हैं। इन सब का असर लोगों के मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ेगा। लिहाजा डिप्रेशन जैसी समस्या के बढ़ने की आशंका है।

मेंटल हेल्थ पर सरकार क्या कर रही है?
भारत सरकार की बात करें तो देशभर में मानसिक स्वास्थ्य सेवा उपलब्ध कराने के लिए 'टेली मेंटल हेल्थ असिस्टेंस एंड नेटवर्किंग एक्रॉस स्टेट्स' नाम से एक हेल्पलाइन शुरू की गई है। एक रिपोर्ट के मुताबिक अक्टूबर, 2022 में शुरू हुई इस हेल्पलाइन पर अभी तक करीब साढ़े तीन लाख से ज्यादा कॉल्स आ चुकी हैं। यहां पर लोग अपनी समस्या के बारे में एक्सपर्ट से खुलकर बात करते हैं।

'टेली मानस' पर प्राप्त होने वाली अधिकांश कॉल उदासी, तनाव, अनिद्रा और परीक्षा से जुड़ी चिंताओं के बारे में होती है। प्रतिदिन 20 अलग-अलग भाषाओं में 1300 से ज्यादा कॉल्स आती हैं। हेल्पलाइन पर जितने लोगों ने कॉल की उनमें से 75 प्रतिशत की उम्र 18 से 45 साल के बीच है। इनमें से 56 प्रतिशत पुरुष और 44 प्रतिशत महिलाएं हैं। ये आंकड़े चिंताजनक हैं, क्योंकि, इनसे जाहिर होता है कि युवाओं में भी डिप्रेशन, एंग्जायटी जैसी समस्याएं बढ़ रही हैं।
ब्रिटेन की वेबसाइट माइंड डॉट ओआरजी के अनुसार आप इन उपायों को अपनाकर अपना मानसिक स्वास्थ्य ठीक कर सकते हैं।

  • आराम करने और तनाव कम करने का प्रयास करें
  • सीखने और रचनात्मक होने के तरीके खोजें
  • प्रकृति में समय बिताएं
  • दूसरों से जुड़ें
  • अपने शारीरिक स्वास्थ्य का ध्यान रखें
  • अपनी नींद को बेहतर बनाने का प्रयास करें
  • इसके अलावा यह जानने के लिए खुद को समय दें कि आपके मन की शांति के लिए कौनसा उपाय काम करता है।
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