World Energy Report: अक्षय ऊर्जा के उत्पादन में वृद्धि, पर अब भी कोयले का उपयोग ज्यादा
World Energy Report: पृथ्वी के बढ़ते तापमान को लेकर पूरी दुनिया चिंतित है। सभी इस कोशिश में जुटे हैं कि ऊर्जा के लिए ऐसी तकनीक विकसित की जाये, जिससे ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन कम हो सके। इन गैसों के उत्सर्जन के लिए इंसान की बेरोकटोक गतिविधियां ही जिम्मेदार है। क्योंकि जीवाश्म ईंधन का जरूरत से ज्यादा प्रयोग, औद्योगिक विकास, जंगलों की कटाई ने ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में भारी वृद्धि की है।
इसलिए ऊर्जा के प्राकृतिक विकल्पों को अपने जीवन का तेजी से हिस्सा बनाना होगा। यह स्त्रोत प्रदूषणकारी नहीं होते। इन्हें अक्षय ऊर्जा भी कहा जाता है। इसमें सौर ऊर्जा, जल, पवन, ज्वार-भाटा, भूताप इत्यादि शामिल हैं।

द एनर्जी इंस्टीट्यूट की आई नयी रिपोर्ट
26 जून 2023 को यूनाइटेड किंगडम स्थित द एनर्जी इंस्टीट्यूट ने 'वर्ल्ड एनर्जी रिपोर्ट' जारी की। इसके मुताबिक दुनियाभर में वैश्विक ऊर्जा की मांग में 1% की वृद्धि हुई है। जबकि अभी भी कुल ऊर्जा का 82% हिस्सा हम कोयले से पूरा कर रहे हैं।
वहीं बीते साल रूस-यूक्रेन जंग की वजह से पूरी दुनिया के ऊर्जा बाजार में उथल-पुथल देखने को मिली। इसकी वजह से यूरोप और एशिया में गैस व कोयले की कीमतों में भारी बढ़ोतरी हो गयी थी। वैसे इस रिपोर्ट के मुताबिक 2022 में अक्षय ऊर्जा की पैदावार में रिकॉर्ड 12% की वृद्धि देखी गयी लेकिन ऊर्जा बाजार पर अभी भी कोयले, तेल और गैस का ही कब्जा बरकरार है।
ग्रीन हाउस उत्सर्जन को करना होगा कम
इस रिपोर्ट में विशेषज्ञों का कहना है कि अगर पेरिस समझौते में तय किये गये लक्ष्यों को हासिल करना है तो ग्रीन हाउस गैसों (कार्बन डाईऑक्साइड, जलवाष्प, मैथेन, नाइट्रस ऑक्साइड, क्लोरोफ्लोरो कार्बन) का उत्सर्जन साल 2030 तक हमें कम करना ही होगा।
संयुक्त राष्ट्र की जनवरी 2022 में आयी एक रिपोर्ट के मुताबिक यूएन जलवायु सम्मेलन कॉप-26 के दौरान, यूरोपीय संघ और अमेरिका ने वैश्विक मीथेन संकल्प शुरू किया था। जिसके तहत 100 से ज्यादा देश, साल 2030 तक जीवाश्म ईंधन, कृषि और कूड़ा प्रबन्धन क्षेत्रों में, मीथेन उत्सर्जन में 30 प्रतिशत कमी करने के लक्ष्य पर काम करने के लिए प्रतिबद्ध हुए थे। क्योंकि वातावरण में मौजूद ऑक्सीजन और नाइट्रोजन जैसी अन्य गैसों के उलट, ग्रीनहाउस गैसें वातावरण में ही ठहर जाती हैं और पृथ्वी से दूर नहीं जातीं। इसकी वजह से तापमान में वृद्धि होती है और जलवायु पर परिवर्तन देखने को मिलता है। इनकी वजह से बाढ़ आना, सूखा पड़ना, जंगलों में भीषण आग लगना और तूफान आना शामिल हैं।
भारत का ग्रीनहाउस उत्सर्जन बहुत कम है
अक्टूबर 2022 में इसी ग्रीनहाउस गैस के उत्सर्जन से संबंधित संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम के तहत 'Emissions Gap Report 2022: The Closing Window' रिपोर्ट जारी की गयी। रिपोर्ट में बताया गया था कि जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए कई देशों ने इस सदी में वैश्विक तापमान में वृद्धि को 2 डिग्री सेल्सियस से नीचे तक सीमित करने के लिए साल 2015 के पेरिस समझौते को अपनाया। इस समझौते में वैश्विक तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित करने का लक्ष्य रखा गया है।
जबकि साल 2020 में विश्व औसत प्रति व्यक्ति ग्रीनहाउस गैस (GHG) उत्सर्जन 6.3 टन कार्बन डाइऑक्साइड (tCO2e) था। जबकि अमेरिका 14 tCO2e के साथ इस स्तर से बहुत ऊपर था। इसके बाद रूस में 13, चीन में 9.7, ब्राजील और इंडोनेशिया में लगभग 7.5 और यूरोपीय संघ में 7.2 tCO2e है। वहीं भारत में इस दौरान प्रतिव्यक्ति 2.4 tCO2e के बराबर ग्रीनहाउस गैस का उत्सर्जन हुआ, जो विश्व के ग्रीनहाउस गैस औसत उत्सर्जन की तुलना में बहुत कम है।
ऊर्जा का उपभोग
इस बीच द एनर्जी इंस्टीट्यूट की नयी 'वर्ल्ड एनर्जी रिपोर्ट' पर बात करें तो इसके मुताबिक वैश्विक स्तर पर उर्जा की मांग को देखें तो साल 2021 में ऊर्जा का उपभोग 5.5% बढ़ गया था। जबकि पूरी दुनिया में जितनी ऊर्जा का इस्तेमाल हुआ, उसमें अक्षय ऊर्जा का हिस्सा 7.5% रहा। हालांकि, इसका जीवाश्म ईंधनों (कोयला, पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस, तेल शैल, बिटुमेन, टार रेत और भारी तेल) के उपभोग पर कोई असर नहीं पड़ा और वह लगभग 82% के स्तर पर बना रहा।
जबकि साल 2021 के मुकाबले 2022 में 2.3% ज्यादा बिजली पैदा हुई। पवन और सौर ऊर्जा की हिस्सेदारी भी 12% तक बढ़ गयी। वहीं परमाणु ऊर्जा में 4.4% की कमी दर्ज की गयी। अक्षय ऊर्जा स्रोतों में उसकी हिस्सेदारी 84% रही। साथ ही बिजली उत्पादन में कोयले की हिस्सेदारी 2022 में लगभग सबसे ज्यादा 35.4% की रही।
तेल की खपत
2022 में तेल की खपत 2.9 मिलियन बैरल प्रति दिन (बीपीडी) बढ़कर 97.3 मिलियन बीपीडी प्रतिदिन हो गयी थी। वैसे यह ग्रोथ 2021 के मुकाबले कुछ धीमी रही।
रिपोर्ट के मुताबिक अधिकांश तेल की मांग जेट ईंधन और डीजल व उससे जुड़े उत्पादों की ओर से आयी है। इससे तेल का उत्पादन 2022 में 3.8 मिलियन बैरल प्रतिदिन बढ़ गया। जिसमें सबसे बड़ा हिस्सा ओपेक देशों और अमेरिका से आया। जबकि नाइजीरिया के उत्पादन में सबसे ज्यादा गिरावट देखी गयी। जबकि आर्थिक सहयोग और विकास संगठन (ओईसीडी) वाले देशों में ऑयल रिफाइनिंग कैपेसिटी में 534,000 बैरल प्रतिदिन की वृद्धि हुई।
प्राकृतिक गैस
यूरोप और एशिया में प्राकृतिक गैस की रिकॉर्ड कीमत बढ़ने की वजह से वैश्विक स्तर पर गैस की मांग में 3% की गिरावट आई है। कुल उर्जा उपभोग में इसकी हिस्सेदारी 24% है, जो पिछले साल 2021 से थोड़ी कम है।
बता दें कि गैस का उत्पादन सालों से स्थिर है लेकिन लिक्वीफाइड नेचुरल गैस (एलएनजी) का कुल उत्पादन 542 बिलियन क्यूबिक मीटर (बीसीएम) रहा। यह बीते साल से 5% ज्यादा था। फिलहाल एलएनजी की सबसे ज्यादा मांग यूरोप में है। वहीं एशिया-प्रशांत क्षेत्र और दक्षिण और मध्य अमेरिका के देशों ने इसकी खरीद कम कर दी है। गौरतलब है कि जापान दुनिया के सबसे बड़े एलएनजी आयातक के रूप में चीन की जगह ले चुका है।
कोयला की मांग बढ़ी
रिपोर्ट के मुताबिक साल 2022 में कोयले की कीमतें रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गयी थी। यह दरें यूरोप में 145% और जापान में 45% तक बढ़ गयी थी। कोयले की खपत 0.6% बढ़ गयी है, जो 2014 से उच्चतम स्तर पर है। इसका कारण चीन और भारत में कोयले पर अधिक निर्भरता है। जबकि उत्तरी अमेरिका और यूरोप में कोयले की खपत में गिरावट आई है। बड़ी बात यह है कि चीन, भारत और इंडोनेशिया कोयले का उत्पादन साल 2021 की तुलना में 7% अधिक हुआ था।
अक्षय उर्जा
पनबिजली को छोड़ दें तो अक्षय ऊर्जा से कुल बिजली उत्पादन में योगदान 14% पहुंच गया है। वहीं सौर और पवन उर्जा में 266 गीगावाट की रिकॉर्ड वृद्धि दर्ज की गयी है। इसमें भी सौर ऊर्जा का योगदान ज्यादा है। फिलहाल दुनिया में चीन ने सौर और पवन जैसे विकल्पों पर सबसे अधिक निवेश करना शुरू किया है।
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