Breastfeeding Week: 31 साल पहले शुरू हुआ था विश्व स्तनपान सप्ताह, 2025 तक 50% लक्ष्य
महिलाओं में गर्भावस्था की अवधि 40 सप्ताह या 280 दिन की होती है। प्रसव के बाद 10 मिनट से लेकर आधे घंटे के भीतर मां द्वारा शिशु को स्तपपान करना अनिवार्य है।
ताकि शिशु में शारीरिक एवं बौद्धिक विकास सही ढंग से हो सके। प्रथम 24 घंटे या कभी कभी 48 घंटे तक स्तनों से एक हल्का पीले रंग का तरल पदार्थ स्रावित होता है, जिसे कोलोस्ट्रम कहते है।

मां का प्रथम दूध शिशु के पोषण एवं स्वस्थ्य के लिए अत्यन्त उपयोगी माना जाता है। इस दूध में रोगों से लड़ने की शक्ति विद्यमान होती है।
कोलोस्ट्रम में पानी 87%, शर्करा 6%, वसा 4%, प्रोटीन 2%, और खनिज लवण 1% होते हैं। यह पौष्टिक एवं सभी आवश्यक गुणों से भरपूर होता है। इसमें प्रोटीन लैक्टएल्ब्यूमिन होता है, जो शीघ्र ही पच जाता है। इन्हीं स्वास्थ्य संबंधी जानकारियों के प्रचार-प्रसार के लिये दुनियाभर में 1 से 7 अगस्त तक विश्व स्तनपान सप्ताह मनाया जाता है। जिसमें मां के दूध से होने वाले फायदों की जानकारी देने के लिए विभिन्न कार्यक्रम व कार्यशालाएं आयोजित की जाती हैं।
भारत में तीन साल में तकरीबन 8 प्रतिशत बढ़ा ब्रेस्ट फीडिंग
नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे 2019-21 (एनएफएचएस-5) के अनुसार देश के शहरी क्षेत्रों में 59.9 प्रतिशत तथा ग्रामीण क्षेत्र में 65.1 प्रतिशत सहित कुल 63.7 प्रतिशत ब्रेस्ट फीड कराई जाती है। वहीं नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे 2015-16 में शहरी क्षेत्र में 52.1 व ग्रामीण क्षेत्र में 55.9 प्रतिशत सहित कुल 54.9 प्रतिशत ब्रेस्ट फीड कराई जा रही है। इस प्रकार 8 साल में तकरीबन 8 प्रतिशत ब्रेस्ट फीडिंग में बढ़ोतरी दर्ज की गई। जबकि 2005-06 में यह आंकड़ा मात्र 46.4 प्रतिशत ही था। इस प्रकार देखा जाए साल दर साल स्तनपान को लेकर आमजन में जागरूकता बढ़ती जा रही है और ब्रेस्ट फीडिंग का प्रतिशत भी बढ़ रहा है।
कब शुरू हुआ विश्व स्तनपान सप्ताह
स्तनपान के प्रति जन जागरूकता और समर्थन पैदा करने के लिए 1992 में विश्व स्तनपान सप्ताह (वर्ल्ड अलायंस फॉर ब्रेस्टफीडिंग एक्शन- डब्ल्यूबीडब्ल्यू) की शुरुआत की गयी थी। आधिकारिक तौर पर यह हर साल 1 से 7 अगस्त तक मनाया जाता है। दूसरी ओर यूनिसेफ का मानना है कि स्तनपान से वंचित रहने वाले बच्चों की संख्या आज भी अधिक है, विशेष रूप से दुनिया के सबसे अमीर देशों में, जहां हर साल लगभग 76 लाख बच्चों को स्तनपान नहीं कराया जाता।
उच्च आय वाले देशों में अनुमानित 21 प्रतिशत बच्चे कभी स्तनपान नहीं करते हैं। निम्न और मध्यम आय वाले देशों में, यह दर 4 प्रतिशत है। 2018 तक क्षेत्र के सभी शिशुओं में से लगभग 54 प्रतिशत को 6 महीने की उम्र तक विशेष रूप से स्तनपान कराया गया, जो 2015 से 47 प्रतिशत से अधिक है। 2025 तक कम से कम 50 प्रतिशत नवजात शिशुओं को विशेष रूप से स्तनपान कराए जाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।
संस्थागत प्रसव की तर्ज पर योजना बनाने की आवश्यकता
एक्सक्लूसिव ब्रेस्ट फिड नहीं होने से बच्चों की रोग प्रतिरोधक क्षमता पर असर पड़ता है। अनेक बार गर्भावस्था के दौरान कॉम्पिलिकेसी के चलते शिशु पर अन्य संक्रमण का असर अधिक होता है, इससे उसकी मृत्यु भी हो सकती है। जन्म से ही रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होने से उसे जिन्दगी भर बीमारियों से संघर्ष करना पड़ता है। बदलते मौसम, गर्मी, बारिश में भी उसके बीमार होने की संभावना अधिक रहती है।
ऐसे में अगर शिशु के जन्म लेते ही माता एक्सक्लूसिव ब्रेस्ट फिड की थ्योरी अपना ले तो मां और शिशु दोनों का स्वास्थ्य उत्तम बना रहेगा, साथ ही भविष्य में भी अन्य बीमारियों की शंका भी नगण्य रहेगी। शिशु को मिलने वाला दूध 'कोलोस्ट्रम' न केवल उसकी रोग प्रतिरोधक क्षमता बढाएगा, वरन उसके बौद्धिक विकास में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।
प्रसूता को 6 माह तक ब्रेस्ट फिडिंग के लिए प्रेरित करें
चिकित्साकर्मियों के सहयोग व जन जागरूकता से आज संस्थागत प्रसव शहरी क्षेत्र में 97.5 तथा ग्रामीण क्षेत्रों में 94.2 सहित कुल 94.9 प्रतिशत ( एनएफएचएस-5) तक पहुंच गया है। ऐसे में जन्म लेते ही चिकित्साकर्मी मां को एक्सक्लूसिव ब्रेस्ट फिड के लिए प्रेरित करने के साथ ही अस्पताल से छुटटी मिलने के बाद भी प्रसूता को कम से कम 6 माह तक शिशु को बेस्ट फिडिंग के लिए प्रेरित करते हैं। ऐसा करने पर वह दिन दूर नहीं जब एक्सक्लूसिव ब्रेस्ट फीडिंग का आंकड़ा 90 प्रतिशत से उपर चला जाए और देश की आने वाली पीढ़ी चुस्त, दुरस्त व तन्दुरूस्त बनी रहे।
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