Maldives: क्या चीन के दवाब में भारत की मित्रता भूल जायेगा मालदीव

Maldives: मालदीव में नए राष्ट्रपति के चुनाव के बाद यह आशंका जताई जा रही है कि इस छोटे से द्वीप में भारत विरोधी गतिविधियां बढ़ सकती हैं, क्योंकि मालदीव के नए राष्ट्रपति के रूप में चुने गये मोहम्मद मुइज्जू चीन के समर्थक हैं और उन्होंने अभी से ही भारत के खिलाफ बयान भी देना शुरू कर दिया है। पर क्या वह भारत का विरोध करते रहेंगे और क्या मालदीव के लोग भारत के अहसानों को भूल पाएंगे, यह भी एक बड़ा सवाल है। भारत शुरू से ही मालदीव की सुरक्षा और जरूरतों की चिंता करता रहा है।

1988 में ऑपरेशन कैक्टस के जरिए भारत ने ही मालदीव में तख्तापलट होने से बचाया था, जब राष्ट्रपति मौमून अब्दुल गयूम की सरकार को पद से हटाने के लिए व्यवसायी अब्दुल्ला लुथुफ़ी के नेतृत्व में श्रीलंका के तमिल अलगाववादी संगठन पीपुल्स लिबरेशन ऑर्गनाइजेशन ऑफ तमिल ईलम (पीएलओटीई) के भाड़े के सैनिकों ने हमला बोल दिया था। तब भारत ने अपने सैनिक भेज कर उन हथियारबंद लोगो को मार भगाया था।

Will Maldives forget Indias relationship under pressure from China?

उसी प्रकार जब 26 दिसंबर, 2004 को मालदीव में सुनामी आई तब मालदीव को राहत और सहायता पहुंचाने वाला भारत पहला देश था। पर उसी मालदीव के राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज़्ज़ू ने अपने चुनाव अभियान में 'इंडिया आउट' यानी भारत को देश से बाहर करने का नारा दिया।

भारत-मालदीव का इतिहास

298 वर्ग किमी में फैले मालदीव और भारत के बीच संबंध सैकड़ों साल पुराना है। प्राचीन काल से ही दोनों देशों के बीच भाषायी, सांस्कृतिक, धार्मिक और वाणिज्यिक संबंध रहे हैं। अंग्रेजों से साल 1965 में मालदीव की आजादी के बाद मालदीव को मान्यता देने और उसके साथ राजनयिक संबंध स्थापित करने वाले प्रारंभिक देशों में भारत शामिल था।

भारत-मालदीव के बीच राजनयिक संबंध काफी प्रगाढ़ रहे हैं। भारत के लगभग सभी प्रधानमंत्री एक बार जरूर मालदीव की यात्रा पर जा चुके हैं। मालदीव के भी पूर्व राष्ट्रपति मौमून अब्दुल गयूम, पूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद नशीद और राष्ट्रपति इब्राहीम सोलिह ने अपने कार्यकाल के दौरान भारत के दौरे किए। दोनों देशों के बीच मंत्रिस्तरीय यात्राओं का भी सिलसिला चलता रहा। भारत और मालदीव ने संयुक्त राष्ट्र, राष्ट्रमंडल, गुटनिरपेक्ष आंदोलन तथा दक्षेस जैसे बहुपक्षीय मंचों में लगातार एक-दूसरे का समर्थन भी किया है।

मालदीव का हिंद महासागर के दक्षिण-पश्चिम में 1,200 प्रवाल द्वीपों तक फैलाव है, जिनमें से केवल 202 द्वीपों पर ही लोग निवास करते हैं। जहां इन द्वीपों की औसत ऊंचाई समुद्रतल से लगभग एक मीटर है। यहां का प्रमुख धर्म इस्लाम है, जो कुल जनसंख्या का लगभग 99.04 प्रतिशत है।

भारत के लिए मालदीव का महत्व?

भारत के लक्षद्वीप समूह से महज 700 किमी. दूर बसा मालदीव एक ऐसा देश है, जो हिंद महासागर में सामरिक रूप से काफी महत्वपूर्ण जगह पर स्थित है। जिसके समुद्री मार्ग से होकर चीन, जापान और भारत जैसे कई देशों को ऊर्जा की आपूर्ति होती है। भारत का करीब 97 प्रतिशत अंतरराष्ट्रीय व्यापार हिंद महासागर के द्वारा ही होता है। इसलिए यह समझा जा सकता है कि इसके मार्गों को सुरक्ष‍ित करना भारत के लिए कितना महत्वपूर्ण है। जबकि चीन ने हिंद महासागर में एंटी पायरेसी अभियान के नाम पर बीते कुछ सालों में अपने नौसैनिक जहाज भेजने शुरू कर दिए है। इसकी वजह से मालदीव का महत्व लगातार बढ़ता रहा है और अब यह अंतरराष्ट्रीय राजनीति का केंद्र बन गया है।

मालदीव में चीन का बढ़ता प्रभाव निश्चित रूप से भारत के लिए चिंता की बात है, क्योंकि दशकों से मालदीव के भारत के साथ करीबी रिश्ते रहे हैं। चीन का दूतावास मालदीव में 2011 में ही खुला है। जबकि भारत 1972 में ही वहां अपना दूतावास खोल चुका था।

मालदीव एक सुन्नी मुसलमान बहुल देश है और इधर कुछ साल से वहां चरमपंथी ताकतों को प्रोत्साहित भी किया जा रहा है। पूर्व राष्ट्रपति यामीन ने देश में धार्मिक कट्टरता को बढ़ावा देने वाली नीतियों को प्रश्रय दिया। कहा जाता है कि मालदीव में बेरोजगार बैठे युवा सीरिया जाकर आईएसआईएस में भर्ती होने लगे हैं। आगे भी इसी बात का डर है कि आर्थिक रूप से कमजोर मालदीव धार्मिक अतिवादियों और कट्टरपंथियों का पनाहगाह न बन जाए। यदि ऐसा हुआ तो भारत के लिए भी चिंता की बात होगी।

चीन के कर्ज में दबा मालदीव

दरअसल चीन 'पैसा फेंको, तमाशा देखों' की नीति पर चलता है। वह पहले किसी भी देश को कर्ज देता है फिर चुकाए न जाने की स्थिति में वहां की जमीन हथिया लेता है। चीन ने ऐसा ही मालदीव में किया है। चीन ने मालदीव को बड़ा कर्ज दिया है। राजधानी माले को अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे से जोड़ने वाला पुल भी चीन के निवेश से बना है। साथ ही साल 2016 में मालदीव ने चीन को अपना एक द्वीप महज 40 लाख डॉलर में 50 सालों के लिए लीज पर दिया था। मालदीव पर चीन का करीब एक बिलियन डॉलर का कर्ज है, जो चीन ने वहां की इंफ्रास्ट्रक्चर योजनाओं में लगाने के लिए दिया है।

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