नेताओं के घर इफ्तार पार्टी ही क्यों, जागरण, लंगर या क्रिसमस क्यों नहीं?

[अजय मोहन] दिल्ली में राष्ट्रपति भवन से लेकर लखनऊ के राजभवन तक हर साल रमज़ान के महीने में इफ्तार पार्टी का आयोजन होता है। नेताओं की बात करें तो सोनिया गांधी हों या मुलायम सिंह यादव। नीतीश कुमार या फिर लालू प्रसाद यादव। इनमें से शायद ही कोई बचा होगा जिसने अपने घर में इफ्तार पार्टी का आयोजन नहीं किया हो। सच पूछिए तो यह बहुत ही नेक काम है, लेकिन देश के सभी नेताओं से मेरा सवाल है कि नवरात्रि के दिनों में जागरण का आयोजन क्यों नहीं करवाते?

महज इसी एक सवाल पर आप कहेंगे कि मैं मुस्ल‍िम विरोधी बात कर रहा हूं। इससे पहले कि आप कुछ अनाप-शनाप बकें मैं आपको बताना चाहूंगा कि मेरा बचपन तीन मुस्ल‍िम परिवारों के बीच बीता है। लखनऊ में मुस्ल‍िम परिवारों के बीच रहकर ही मैंने बोलना सीखा और उन्हीं के बीच सीखा कि किसी व्यक्त‍ि या धर्म का अदब कैसे करना चाहिये।

फिर मैंने भारतीय संविधान पढ़ा

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 15(1), जिसमें कहा गया है कि सरकार किसी भी नागरिक के साथ उसके धर्म, रंग, जाति, लिंग, जन्मस्थान, आदि के आधार पर भेदभाव नहीं कर सकती। तो देश के अलग-अलग धर्मों के बीच ऐसा भेदभाव क्यों?

खैर मैं अपने सवाल पर आता हूं। देश के नेता नवरात्रि में जागरण क्यों नहीं करवाते? पार्टी कार्यालयों से उत्तर मिला- हम अल्पसंख्यकों के हितैशी हैं, इसलिये।

अब मेरा अगला सवाल

अगर मुस्ल‍िम अल्पसंख्यक हैं और आप उनके लिये हर साल इफ्तार पार्टी पार्टी का आयोजन रखते हैं, तो ईसाई और सिख भी तो अल्पसंख्यक हैं? तो क्रिसमस पर राजभवन में केक क्यों नहीं काटा जाता? गुरुनानक जयंती पर मुख्यमंत्री आवास पर लंगर का आयोजन क्यों नहीं किया जाता?

इन सवालों का जवाब शायद किसी भी पार्टी कार्यालय के पास नहीं होगा, क्योंकि इफ्तार से ही उनकी राजनीति की रफ्तार जुड़ी हुई है।

इफ्तार या राजनीति की रफ्तार?

इसे समझना भी बहुत जरूरी है। यदि आप गौर करें, तो जिन राज्यों में चुनाव नजदीक हैं, या फिर जिन राज्यों में सरकार की चूलें हिलीं हुई हैं, वहां पर इफ्तार पार्टी का आयोजन वृहद स्तर पर हो रहा है। सबसे बड़ा उदाहरण बिहार है। बिहार में सुशील मोदी, राम विलास पासवान से लेकर लालू-नीतीश तक सब इफ्तार के बहाने मुस्ल‍िम वोट पक्का करने में जुटे हुए हैं। वहीं यूपी और मध्य प्रदेश में सरकारों की चूलें हिली होने की वजह से इफ्तार के आयोजन धड़ाधड़ किये जा रहे हैं। जिन राज्यों में चुनाव दूर हैं वहां कुछ खास आयोजन नहीं हो रहा। जैसे कर्नाटक, तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश।

भारतीय मुसलमानों की वास्तविक स्थ‍िति

  • 52.3 प्रतिशत मुसलमान गरीबी रेखा के नीचे है, यानी मासिक आय 150 रुपए से कम है।
  • शहरों में गरीबी रेखा से नीचे के मुसलमानों की संख्या 38.4 प्रतिशत है।
  • 59.1 प्रतिशत मुसलमान शैक्ष‍िक हैं। जबकि देश की साक्षरता दर 65.1 प्रतिशत है।
  • 6-14 साल की उम्र के मुसलमान बच्चे कभी स्कूल नहीं गये, या फिर स्कूल छूट गया।
  • हाईस्कूल से ज्यादा पढ़े भारतीयों में सिर्फ 4 प्रतिशत मुसलमान हैं।
  • जवाहर नवोयदय विद्यालयों में मुसलमान बच्चों का एनरोलमेंट न के बराबर है।
  • स्नातक कक्षा तक पढ़े हुए भारतीयों में देखें तो 25 में से मात्र 1 एक मुसलमान है।
  • परास्नातक कक्षा तक पढ़े भारतीयों में देखें तो 50 में से सिर्फ 1 मुसलमान है।
  • मात्र 3 प्रतिशत मुस्ल‍िम बच्चे हैं जो मदरसों में पढ़ते हैं।
  • सरकारी नौकरी करने वाले लोगों में मात्र 4.4 प्रतिशत मुसलमान हैं।
  • सरकारी सहायता से बिजनेस शुरू करने वाले भारतीयों में मात्र 3.7 प्रतिशत मुसलमान हैं।
  • सरकारी बैंकों से लोन प्राप्त करने वाले भारतीयों में मात्र 5 प्रतिशत मुसलमान हैं।
  • सरकार से लोन लेने वाले भारतीयों में मात्र 2 प्रतिशत मुसलमान हैं।
  • विभ‍िन्न मंत्रालयों में क्लास 1 और 2 स्तर के पदों पर मात्र 1.7 फीसदी मुस्ल‍िम अफसर हैं।
  • देश की ब्यूरोक्रेसी में मुसलमानों की भागीदारी मात्र 2.5 प्रतिशत है।
  • सच्चर कमेटी की रिपोर्ट कहती है कि भारतीय मुसलमानों के हालात एससी-एसटी से भी खराब हैं।
  • आईएएस पास करने वालों में मात्र 3 प्रतिशत ही मुसलमान हैं।
  • आईपीएस की परीक्षा पास करने वालों में मात्र 4 प्रतिशत मुसलमान हैं।
  • भारतीय रेल में नौकरी करने वालों में मात्र 4.5 प्रतिशत मुसलमान हैं।
  • सरकार द्वारा चलायी जाने वाली सहायक योजनाओं में मात्र 3 से 14 प्रतिशत हिस्सा ही मुसलमानों को मिलता है।

यह तो महज कुछ बिंदु हैं, जो भारतीय मुसलमानों की आर्थ‍िक व सामाजिक स्थ‍िति को दर्शाते हैं। वास्तव में स्थिति तो इससे कहीं ज्यादा गंभीर है।

कभी-कभी ऐसा प्रतीत होता है कि देश के नेता जानबूझ कर मुसलमानों को महज वोटबैंक के रूप में इस्तेमाल करना चाहते हैं। वे जानते हैं कि जिस दिन ये आगे बढ़ गये, उस दिन एक बड़ा वोट-बैंक खत्म हो जायेगा। और अगर ऐसा हो गया तो यही इफ्तार पार्टियां इन्हीं नेताओं को बोझ लगने लगेंगी।

ऐसे में मेरा सवाल उन नेताओं से है, कि वे मुसलमानों के जीवन की रफ्तार बढ़ाने के प्रयास कब करेंगे? क्योंकि अगर ये सारी इफ्तार पार्टियां इस 13.4 प्रतिशत आबादी के साथ महज छल है, तो इससे बड़े दु:ख की बात और कुछ नहीं हो सकती। सच पूछिए तो देश के मुसलमानों को भी इस बात की गंभीरता को समझना होगा, नहीं तो ये इफ्तार सिर्फ नेताओं की रफ्तार बढ़ायेगी, न कि मुसलमानों की।

अगर आप मेरी बात से सहमत हों, तो यह आर्टिकल अपने मुसलमान दोस्तों के साथ जरूर शेयर कीजियेगा। हमारा यह लेख कैसा लगा, इसका जवाब आप नीचे कमेंट में दे सकते हैं। लेकिन उससे पहले जरूर पढ़ें कुछ सवाल जो तस्वीरों के साथ स्लाइडर में हैं। ये सवाल उन नेताओं से हैं, जो मुसलमानों को तभी याद करते हैं, जब वोट चाहिये होते हैं।

हम आगे स्लाइड में चंद नेताओं से कुछ सवाल पूछेंगे

हम आगे स्लाइड में चंद नेताओं से कुछ सवाल पूछेंगे

हम आगे स्लाइड में चंद नेताओं से कुछ सवाल पूछेंगे। हमें पता है उनके जवाब हमें नहीं मिलने वाले, लेकिन फिर भी सवाल तो बनते ही हैं।

सवाल नीतीश कुमार से

सवाल नीतीश कुमार से

किशनगंज में 78% मुसलमान हैं, क‍टीहर में 43%। 10 साल से आप शासन में हैं, फिर भी ये दोनेां जिले अति पिछड़े जिलों में क्यों गिने जाते हैं?

सवाल लालू प्रसाद यादव से

सवाल लालू प्रसाद यादव से

बिहार के अति पिछड़े जिलों जो मुस्ल‍िम बहुल्य हैं, में विकास नहीं हुआ तो आपने सरकार का अबतक विरोध क्यों नहीं किया?

सवाल मुलायम सिंह यादव से

सवाल मुलायम सिंह यादव से

मुस्ल‍िम बहुल्य जिलों अमरोहा, संबलपुर, रामपुर, बदायूं और मुरादाबाद में विकास की रफ्तार बढ़ क्यों नहीं रही है?

अख‍िलेश यादव से सवाल

अख‍िलेश यादव से सवाल

मुजफ्फरनगर दंगों के बाद भी यहां के मुसलमानों को धमकियां मिल रही हैं। आज भी लोग अपने घर छोड़ना चाहते हैं। क्यों?

सवाल राहुल गांधी से

सवाल राहुल गांधी से

आपकी पार्टी ने ऐसे कैसे राज किया कि सच्चर कमेटी को कहना पड़ा कि मुसलमानों के हालात एससी-एसटी से भी खराब हैं?

सवाल ममता बनर्जी से

सवाल ममता बनर्जी से

पश्च‍िम बंगाल के 65 फीसदी मुसलमान बेहद गरीब हैं। क्या आपकी सरकार ने उनकी गरीबी दूर करने के ठोस कदम उठाये?

सवाल सोनिया गांधी से

सवाल सोनिया गांधी से

कांग्रेस ने लंबे समय कैसा शासन किया था जो सच्चर कमेटी की रिपोर्ट में निगेटिव प्वाइंट्स ज्यादा, पॉजिटिव बहुत कम निकले?

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