Project Tiger: क्यों घटने लगे थे बाघ, जो शुरू करना पड़ा प्रोजेक्ट टाइगर? जानें इसका इतिहास
प्रोजेक्ट टाइगर ने हाल में 50 साल पूरे किए हैं। इस मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बाघ गणना 2022 के आंकड़े जारी किए। नये आंकड़ों से साफ है कि देश में बाघों की संख्या बढ़ रही है।

Project Tiger: नाम और नयी गणना से साफ है कि प्रोजेक्ट टाइगर को बाघों को संरक्षित करने के लिए शुरू किया गया था। दरअसल, आजादी से पहले देश में लगभग 40 हजार टाइगर थे। मगर, अगले करीब ढाई दशकों में यानी 1970 के आसपास इनकी संख्या तेजी से घटकर 2 हजार से भी कम रह गयी।
हम जानते हैं कि बाघ यानी टाइगर देश का राष्ट्रीय पशु है। इसका प्राकृतिक और धार्मिक दोनों महत्व है। केंद्र सरकार द्वारा जारी आंकड़ों के बाद से बाघों को लेकर उत्सुकता बढ़ने लगी है। बाघों की गणना क्यों होती है? इसकी जरूरत क्यों पड़ी? बाघों की संख्या इतना मायने क्यों रखती है? जैसे कई सवाल लोगों के मन में आने लगे हैं। आइए आपको इन सबके बारे में बताते हैं।
कैसे शुरू हुआ प्रोजेक्ट टाइगर?
साल 1970 में अंतरराष्ट्रीय संस्था ने टाइगर को लुप्तप्राय प्रजाति घोषित कर दिया था। इसके बाद साल 1972 में भारत सरकार ने देश में बाघों की गणना कराई, तब करीब 1820 बाघ ही बचे थे। देश के राष्ट्रीय पशु की यह स्थिति चिंताजनक थी। सरकार को लगा कि ऐसी स्थिति रही, तो बाघ विलुप्त हो जाएंगे। इसे देखते हुए उसी साल प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने वन्यजीव संरक्षण अधिनियम लागू कर दिया। इसी क्रम में एक अप्रैल 1973 को इंदिरा गांधी ने बाघों के संरक्षण के लिए उत्तराखंड के जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क से प्रोजेक्ट टाइगर की शुरुआत की।
कैलाश सांखला को सौपी टाइगर प्रोजेक्ट की कमान
एक बार राजस्थान कैडर के अधिकारी कैलाश सांखला बाघ के दो शावकों को टोकरी में लेकर दिल्ली में प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी से मिले। जानकारी के अनुसार रणथंभौर में एक बाघिन ने दो शावकों को जन्म देते ही दम तोड दिया था। यह शावक उसी बाघिन के थे जिन्हें कैलाश सांखला प्रधानमंत्री के पास ले आए थे। सांखला ने उन्हें बताया कि जंगल बचाने के लिए बाघों को बचाना कितना जरूरी हो गया है। इसके बाद ही टाइगर प्रोजेक्ट की घोषणा हुई और सांखला को इस प्रोजेक्ट की कमान सौंपी गई। इस प्रोजेक्ट में 'टाइगर गुरु' के नाम से विख्यात फतेह सिंह राठौर जैसे नाम भी जुड़े।
क्यों तेजी से घटने लगे थे टाइगर?
देश में बाघों की संख्या तेजी से घटने के पीछे कई वजह रही हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह बाघों का शौकिया और तस्करी के लिए शिकार करना रहा है। साथ ही जंगलों में इंसानों की बस्तियां बसने से भी बाघों के प्राकृतिक हैबिटेट पर बुरा प्रभाव पड़ा। बाघों की संख्या तेजी से घटने का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अंग्रेजों के समय देश में इतने टाइगर थे कि अखबारों में टाइगर स्लेयर्स का विज्ञापन भी दिया जाता था। यानी इंसानों के आसपास भी टाइगर रहते थे और अंग्रेज अपने शौक और सुरक्षा दोनों के लिए शिकारियों को नौकरी पर रखते थे।
इसी प्रकार बॉम्बे जूलॉजिकल सोसाइटी की रिकार्ड बुक के अनुसार देशी रियासतों के राजा और महाराजा भी बाघों के शिकार को अपने पराक्रम के साथ डिग्रियों की भांति जोडते थे। रीवा राज्य के महाराजा रघुराज सिंह (1850) से लेकर आखिरी महाराजा मार्तण्ड सिंह तक चार महाराजाओं ने मिलकर लगभग 2700 बाघों का शिकार किया। यह आकंड़े बॉम्बे जूलॉजिकल सोसाइटी की रिकार्ड बुक में आज भी दर्ज है।
एक बार इंदिरा गांधी को रीवा के महाराजा ने जब तोहफे में बाघ की खाल भेजी थी। राजीव गांधी को 7 सितबर 1956 मे लिखे एक पत्र में इंदिरा गांधी उल्लेख करती है, "हमें तोहफे में एक बड़े बाघ की खाल मिली है। रीवा के महाराजा ने दो महीनों पहले इस बाघ का शिकार किया था। खाल, बॉलरूम में पड़ी है। जितनी बार मैं वहां से गुजरती हूं, मुझे गहरी उदासी महसूस होती है। मुझे लगता है कि यहां पड़े होने की जगह यह जंगल में घूमकर दहाड़ रहा होता।"
इसी प्रकार 1961 में जब ब्रिटेन की महारानी एलिजाबेथ भारत के दौरे पर थी तब भी सवाई माधोपुर (रणथम्भौर) के जंगलों में टाइगर का शिकार किया गया था। तक़रीबन आठ फीट नौ इंच लंबे बाघ का शिकार ड्यूक ऑफ एडिनबर्ग ने किया और इस तमाशे को एलिजाबेथ ने 30 यार्ड की दूरी पर बने एक मचान से देखा। गौरतलब है कि इस शिकार की 'सफलता' को महारानी और ड्यूक ने जंगल के अन्दर ही दोपहर के भोजन के साथ सेलिब्रेट किया था।
1973 में प्रोजेक्ट टाइगर शुरू होने के बाद भी अवैध रूप से बाघों का शिकार और तस्करी की खबरें प्रकाशित होती रहती थी। टाइम्स ऑफ इंडिया में 27 मई 1984 को बाघ के चमड़े की अवैध तस्करी की एक चौंकाने वाली खबर छपी थी। इस रिपोर्ट में कहा गया था कि दिल्ली और मुंबई से हर साल 50-60 बाघों की खाल (चमड़ा) अवैध तरीके से एक्सपोर्ट होती है। इन्हें यूएस में एक एंटीक डीलर को भेजा जाता है। इस चमड़े की कीमत उस समय करीब $10 लाख आंकी गई थी।
बाघ के चमड़े और हड्डियों की अवैध तस्करी साल 2000 के आसपास भी सामने आती रही है। टाइम्स ऑफ इंडिया में 20 जून 2010 को खबर छपी थी कि बाघ और कुछ अन्य जानवरों की हड्डियां चीन भेजे जाने के दौरान पकड़ी गई हैं। दो शिपमेंट में इन हड्डियों को चीन भेजा जा रहा था, जिन्हें कस्टम अधिकारियों ने गुवाहाटी एयरपोर्ट पर पकड़ा था। उस समय इंटरनेशनल मार्केट में इनकी कीमत करीब ₹2 करोड़ बताई गयी थी।
कुछ रियासतों ने संवर्धन के भी प्रयास किये
ब्रिटिश भारत में डूंगरपुर रियासत के बाघ एक भीषण अकाल के कारण लगभग विलुप्य हो गए थे। रियासत के प्रमुख महारावल बिजय सिंह बाघों की घटती संख्या के चलते बहुत चिन्तित थे लेकिन जब तक वह कुछ ठोस कदम उठा पाते, साल 1918 में उनकी मृत्यु हो गयी। फिर उनके पुत्र लक्ष्मण सिंह गद्दी पर बैठे तो साल 1928 में उन्होंने डूंगरपुर में पुनः बाघ लाने का निर्णय लिया। उन्होंने एक व्यापारी से संपर्क किया और उसने दो बाघों को ग्वालियर के जंगल से पकड़ा और रेल की मदद से गुजरात के तालोड तक ले आया। फिर दोनों बाघों को सड़क मार्ग से डूंगरपुर लाकर छोड़ा गया।
इनकी सुरक्षा के लिए कई तरह के नियम-कायदे बनाये गये थे। शुरुआती दौर में बाघों के शिकार को रोका गया और उनके लिए पानी की समुचित व्यवस्था की गयी। सुरक्षा दल का गठन किया गया। यदि कोई बाघ पालतू पशु आदि का शिकार करता है तो उसके मालिक को मुआवजा देने का भी प्रावधान जोड़ा गया। अतः 1935 के आते-आते बाघों की संख्या बढ़कर 20 हो गयी। गौरतलब है कि 1930 से 1937 के मध्य इन बाघों ने 45 शावकों को जन्म दिया था।
2009 में आई रिपोर्ट ने बढ़ाई चिंता
इंदिरा गांधी द्वारा शुरू किये गये प्रोजेक्ट टाइगर का मिलाजुला असर देखने को मिल रहा था। दरअसल, साल 2005 में राजस्थान के सरिस्का टाइगर रिजर्व में 35 बाघ शिकार के चलते गायब हो गये थे। इस पर देशभर में इतना हंगामा मचा कि तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को सरिस्का का दौरा करना पड़ गया था। इस दौरे पर देशभर में मुद्दा गरमाने के बाद भी बाघों की संख्या लगातार गिर रही थी।
9 अगस्त 2009 को टाइम्स ऑफ इंडिया में बाघों को लेकर प्रकाशित एक रिपोर्ट ने चिंता और बढ़ा दी थी। इस खबर का शीर्षक ही चिंता बढ़ाने के लिए काफी था। इसमें कहा गया था कि 'अब शायद टाइगर दिखने का यह आखिरी समय हो'। साल 2006 में सेंसस की रिपोर्ट में कहा गया था कि देश में 1411 टाइगर हैं। इसके बाद 2009 में यह आंकड़ा 1300 पर पहुंच गया। उस समय पन्ना टाइगर रिजर्व में एक भी बाघ नहीं बचे थे।
2006 से 2022 तक ऐसे बढ़ी बाघों की संख्या
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने बाघ संरक्षण के लिए प्रोजेक्ट टाइगर का पुनर्गठन किया और राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) की स्थापना की। एनटीसीए को शिकार की जांच करने और बाघों की आबादी को संरक्षित करने के लिए अधिक शक्तियां दी गईं थी।
इसके अलावा, समय-समय पर जंगलों से इंसानी बस्तियों को स्थानांतरित करने के लिए केंद्र सरकारों ने जरुरी वित्तीय और प्रशासनिक संसाधन उपलब्ध करवाए। उदाहरण के तौर पर साल 2010 की एक संसदीय रिपोर्ट के मुताबिक देश के लगभग 26 टाइगर रिजर्व के अन्दर बसे 1487 गांवों में 64,951 परिवार बसे हुए थे। इन परिवारों को जंगलों से बाहर निकालकर दूसरी जगह बसाया जा रहा है। इसके अलावा, जब प्रोजेक्ट टाइगर की शुरुआत हुई तो तब देश में 28 टाइगर रिजर्व थे जोकि साल 2023 में बढ़ाकर 53 कर दिए गए हैं।
इन क्रम में, प्रोजेक्ट टाइगर के 50 साल पूरे होने पर पीएम मोदी ने इस समय देश में मौजूद बाघों की संख्या की जानकारी दी। ताजा सेंसस डेटा के अनुसार, इस समय देश में 3,167 टाइगर हैं। 2006 से अभी तक का डेटा देखें तो धीरे-धीरे ही सही लेकिन बाघों की संख्या अब बढ़ रही है। डेटा के अनुसार साल 2006 में देश में 1,411 टाइगर थे। साल 2014 में 2,226 और 2018 में यह बढ़कर 2,976 हो गई थी जो अब 3,167 हैं।
भारत में बाघों का धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व
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देश के राष्ट्रीय पशु बाघ का धार्मिक महत्व भी है। कई ग्रंथों में हिंदू धर्म में बाघों की पूजा का जिक्र मिलता है। बाघ को देवी पार्वती और भगवान अयप्पा का वाहन बताया गया हैं। वहीं, महाभारत काल के दौरान भी बाघों का जिक्र मिलता है। महाभारत युद्ध से पहले पांडवों की तरफ से कौरवों को एक संधि प्रस्ताव भेजा गया था, जिसमें कहा गया था कि पांडव सिर्फ 5 गांव लेकर संधि करने को तैयार हैं। इसमें एक गांव मौजूदा समय का बागपत भी था। महाभारत काल में बागपत को व्याघ्रप्रस्थ कहा जाता था। व्याघ्रप्रस्थ का मतलब होता है बाघों के रहने की जगह। व्याघ्रप्रस्थ में बाघ पाए जाते थे लेकिन मुगलकाल से व्याग्रप्रस्थ को बागपत के नाम से जाना जाने लगा।
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