दंगा करने वालों...जैसा दर्द तुम्हारा...वैसा ही दर्द मेरा भी ..फिर हम अलग कैसे हैं?'

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नई दिल्ली। धर्म के नाम पर दंगा, मजहब के नाम पर जंग, भारत या पाकिस्तान का दर्द नहीं है बल्कि ये दर्द हर उस देश का है, जहां धर्म के नाम पर लोगों का बेरहमी से कत्ल होता है, कभी 'जिहाद' के नाम पर तो कभी 'इस्लाम' के नाम पर, विश्व के कई कोनों में मासूम लोगों को मौत की भेंट चढ़ा दिया जा रहा है।

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इस दर्द से यूके भी अब अछूता नहीं है, यहां के आकंड़ों की अगर बात की जाए तो यहां पिछले एक साल के अंदर करीब 1200 से ज्यादा ऐसे मामले दर्ज हुए हैं, जिसमें इस्लाम के नाम पर हिंसा फैलाई गई है।

लंदन यूनिवर्सिटी की सुहायमा मंजूर खान

इसी दर्द को बयां कर रही है लंदन यूनिवर्सिटी की सुहायमा मंजूर खान की ये कविता, जो कि इन दिनों फेसबुक पर तेजी से वायरल हो रही है,  लंदन विवि की हिजाब पहनने वाली छात्रा की इस कविता के एक-एक अल्फाज में पीड़ा का अहसास है।

सुहायमा की कविता...

सुहायमा कहती हैं, जंग के बाद रोते तुम भी हो,

हम भी हैं फिर हम अलग कैसे हैं।

जिंदगी के मायने तुम्हें भी सिखाए गए मुझे भी सिखाए गए

जैसा बचपन तुम्हारा था, वैसा ही मेरा भी था,

फिर हम अलग कैसे हैं?

आखिर कैसे हम जिंदगी बचाने के लिए जिंदगियां ले सकते हैं..

जैसा दर्द तुम्हारा है...वैसा ही दर्द मेरा भी है...

फिर हम अलग कैसे हैं?

आपको जानकर हैरत होगी कि सुहायमा का ये वीडियो सोशल मीडिया के हॉट टॉपिक में से एक है, इस वीडियो को फेसबुक पर महज 10 दिन में इसे 13 लाख से ज्यादा बार देखा गया है। ये कविता सुहायामा ने The Last Word Festival 2017 में पढ़ी है।

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English summary
UK is witnessing a surge in anti-Muslim hate crime reports. 7. At a time like this, a poem by a 22-year-old Muslim woman in UK has touched the right chord.
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