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Suspension of MPs: सांसदों को किसलिए किया जाता है निलंबित, जानें लोकसभा-राज्यसभा के नियम

कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी को 10 अगस्त को लोकसभा से सस्पेंड कर दिया गया। जबकि उससे पहले आम आदमी पार्टी के सांसद सुशील कुमार रिंकु, राघव चड्ढा, संजय सिंह (राज्यसभा) को निलंबित किया जा चुका है।

ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर किस नियम के तहत सांसदों का निलंबन किया जाता है? साथ ही किन-किन परिस्थितियों में होता है? वहीं सांसदों के पास अपने निलंबन को रोकने का क्या अधिकार है?

Suspension of MPs

कब और क्यों होता है सांसदों का निलंबन?
सामान्य सिद्धांत यह है कि लोकसभा के अध्यक्ष और राज्यसभा के सभापति की भूमिका और कर्तव्य सदन की व्यवस्था बनाये रखना है। उनका काम सदन को सुचारू तौर पर चलाना और सदन की कार्यवाही सही तरीके से हो, यह सुनिश्चित करना है। स्पीकर और चेयरमैन दोनों को ही इस काम में बाधा डालने वाले किसी भी सदस्य को निलंबित करने का अधिकार है। स्पीकर या चेयरमैन ऐसे सांसदों को एक दिन, या एक निश्चित अवधि या फिर पूरे सत्र के लिए सस्पेंड कर सकते हैं।

सांसद किस नियम के तहत होते हैं निलंबित?
सभापति व अध्यक्ष के पास कुछ शक्तियां होती हैं। इसके जरिए वह सांसदों को निलंबित कर सकते हैं। इन शक्तियों का जिक्र लोकसभा व राज्यसभा की रूलबुक में है। इस रूलबुक के मुताबिक अगर सदन (लोकसभा, राज्यसभा) में कोई संसद सदस्य अव्यवस्था फैला रहे हैं तो उन्हें निलंबित किया जा सकता है। राज्यसभा में नियम 255 और 256 के तहत सभापति सदस्यों को निलंबित करने की ताकत रखते हैं। जबकि लोकसभा के अध्यक्ष के पास रूलबुक के नियम 373 और 374 के तहत ऐसी समान शक्तियां हैं।

क्या हैं राज्यसभा के नियम 255 व 256?
रूलबुक के नियम 255 के तहत राज्यसभा के सभापति को अगर लगता है कि किसी सांसद के कार्य, व्यवहार सदन के लिहाज से उचित नहीं है, तब सभापति उस संबंधित सांसद को सदन से बाहर जाने को कह सकते हैं। अगर सभापति को यह लगता है कि संबंधित सांसद का व्यवहार सदन में उग्र है या बिल्कुल ठीक नहीं है, और उनके समझाने और कहने के बाद भी वो नहीं सुन रहे हैं तब रूलबुक 256 नियम के तहत ऐसे सदस्यों को सभापति निलंबित करने का प्रस्ताव सदन में रख सकते हैं। इस मामले में सभापति स्वयं सदस्यों को निलंबित नहीं करते हैं। सभापति पहले सदन के सामने उन सदस्य का निलंबन का प्रस्ताव रखते हैं। जब सदन से सहमति मिलती है फिर उसके बाद सांसदों का निलंबन किया जाता है।

क्या हैं लोकसभा के नियम 373 व 374?
रूलबुक के नियम 373, 374 व 374 (A) के तहत लोकसभा के अध्यक्ष को यह अधिकार होता है कि वह किसी भी सांसद को निलंबित कर सकता है। नियम 373 के तहत अध्यक्ष किसी सदस्य के आचरण में गड़बड़ी पाये जाने पर उसे तुरंत सदन से हटने का आदेश दे सकता है। जिन सदस्यों को हटने का आदेश दिया गया है वे तुरंत ऐसा करेंगे और शेष दिन की बैठक के दौरान अनुपस्थित रहेंगे।

नियम 374 अध्यक्ष उस सांसद का नाम ले सकते हैं, जो अध्यक्ष के अधिकार की अवहेलना करता है या सदन के नियमों का लगातार और जान-बूझकर उल्लंघन कर कार्य में बाधा डालता है। इस प्रकार नामित सदस्य को शेष सत्र की अनधिक अवधि के लिये सदन से निलंबित कर दिया जायेगा। इस नियम के अधीन निलंबित कोई सदस्य सदन से तुरंत हट जायेगा।

नियम 374A पर गौर करने वाली बात यह है कि यह नियम दिसंबर, 2001 में लोकसभा की नियम पुस्तिका में शामिल किया गया था। इसके मुताबिक घोर उल्लंघन या गंभीर आरोपों के मामले में अध्यक्ष द्वारा नामित किये जाने पर सदस्य सदन की लगातार पांच बैठकों या सत्र की शेष अवधि के लिये स्वतः निलंबित हो जायेगा।

आखिर सांसदों का निलंबन कैसे होता है वापस?
सांसदों के निलंबन को खत्म करने का अधिकार राज्यसभा के सभापति और लोकसभा अध्यक्ष के पास ही होता है। इसके अलावा निलंबन के खिलाफ प्रस्ताव को भी सदन में लाया जा सकता है। अगर प्रस्ताव सदन में पास हो जाता है तो सांसदों का निलंबन रद्द हो सकता है।

निलंबन के दौरान सुविधाओं से वंचित हो जाते हैं सांसद?
तकनीकी रूप से कहें तो सांसदों के निलंबन के बावजूद उनके अधिकारों और सुविधाओं पर कोई विशेष फर्क नहीं पड़ता है। क्योंकि संसद में व्यवधान डालने वाले सांसदों को निलंबन के समय भी पूरा वेतन व अधिकार मिलता है। हालांकि, जो सांसद निलंबित है वो सदन में प्रवेश नहीं कर सकते हैं। न ही किसी तरह की सरकारी समितियों की बैठकों में भाग ले सकते हैं। साथ ही वह सदन में चर्चा या नोटिस देने के पात्र भी नहीं होते हैं।

निलंबन को सांसद कोर्ट में कर सकते हैं चैलेंज?
संविधान का अनुच्छेद 122 कहता है कि संसदीय कार्यवाही पर कोर्ट के समक्ष सवाल नहीं उठाया जा सकता है। वहीं इसके उलट संविधान के अनुच्छेद 105(2) के तहत संसद में किसी भी व्यवहार के लिए सांसद किसी कोर्ट के प्रति उत्तरदायी भी नहीं होता है। सदन में कही गयी किसी भी बात को कोर्ट में नहीं ले जाया जा सकता है।

हालांकि, इसका मतलब यह नहीं कि सांसदों को संसद में कुछ भी करने की छूट है। एक सांसद जो कुछ राज्यसभा या लोकसभा में बोलेगा वो वहां की रूल बुक से कंट्रोल होता है। इस पर सिर्फ लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा के सभापति ही कार्रवाई कर सकते हैं।

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