Sri Guru Harkrishan: कौन थे गुरु हरकिशन सिंह साहब...

नई दिल्ली। गुरु हरकिशन साहिब सिखों के 8वें गुरु थे, उनका जन्म बिक्रम सम्वत 1713 (7 जुलाई 1656) को कीरतपुर साहिब में हुआ। वे गुरु हर राय साहिब जी और माता किशन कौर के दूसरे पुत्र थे। राम राय जी गुरु हरकिशन के बड़े भाई थे। 8 साल की छोटी सी आयु में गुरु हरकिशन साहिब को गुरुपद प्रदान किया गया था, इस बात से ही नाराज होकर राम राय ने औरंगजेब से इस बात की शिकायत की थी। राम राय का व्यवहार अच्छा नहीं था, जिसके कारण उन्हें घर से बाहर कर दिया गया था, इसी बात से वो अपने छोटे भाई हरकिशन से नाराज रहते थे।

औरंगजेब ने हरकिशन को दिल्ली बुलाया था...

औरंगजेब ने हरकिशन को दिल्ली बुलाया था...

श्री रामराय के कहने के कारण औरंगजेब ने राजा जयसिंह को कहा कि अपना विशेष आदमी भेजकर गुरु को दिल्ली बुलाओ। जयसिंह ने ऐसा ही किया। राजा जयसिंह की चिट्ठी पढ़ने के बाद हरकिशन दिल्ली आ गए। लेकिन हरकिशन साहब की उदारता को उनके बड़े भाई कम नहीं कर पाए।

गुरु हरकिशन सिंह ने की हैजा पीड़ितों की सेवा

गुरु हरकिशन सिंह ने की हैजा पीड़ितों की सेवा

जब गुरु हरकिशन सिंह दिल्ली पहुंचे तो वहां कुछ समय बाद हैजा जैसी महामारी फैली। मुगल राज जनता के प्रति असंवेदनशील था। जात-पात और ऊंच नीच को दरकिनार करते हुए गुरु साहिब ने सभी पीड़ित जनों की सेवा का अभियान चलाया। खासकर दिल्ली में रहने वाले मुस्लिम उनकी इस मानवता की सेवा से बहुत प्रभावित हुए और उन्हें 'बाला पीर' कहकर पुकारने लगे।

गुरु साहब खुद भी बीमारी की चपेट में आ गए....

गुरु साहब खुद भी बीमारी की चपेट में आ गए....

जनभावना एवं परिस्थितियों को देखते हुए औरंगजेब भी उन्हें नहीं छेड़ सका। दिन रात महामारी से ग्रस्त लोगों की सेवा करते करते गुरु साहब खुद भी बीमारी की चपेट में आ गए लेकिन जब उनकी हालत कुछ ज्यादा ही गंभीर हो गयी तो उन्होंने अपनी माता को अपने पास बुलाया और कहा कि उनका अंत अब निकट है। जब लोगों ने कहा कि अब गुरु गद्दी पर कौन बैठेगा तो उन्हें अपने उत्तराधिकारी के लिए केवल 'बाबा- बकाला' का नाम लिया, जिसका अर्थ था कि उनका उत्तराधिकारी बकाला गांव में ढूंढा जाए। जो आगे चलकर गुरू तेजबहादुर सिंह के रूप में सही साबित हुआ, जिनका जन्म बकाला में हुआ था।

हरकिशन सिंह साहब ने दुनिया को अलविदा कह दिया...

हरकिशन सिंह साहब ने दुनिया को अलविदा कह दिया...

अपने अंत समय में गुरु हरकिशन साहिब ने सभी लोगों को निर्देश दिया कि कोई भी उनकी मृत्यु पर रोयेगा नहीं और इसके बाद बाला पीर ने 30 मार्च, 1664 को दुनिया को अलविदा कह दिया।

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