कैसे होगा देश का विकास क्योंकि चरमरा रही है प्राथमिक शिक्षा?

लखनऊ। प्राथमिक शिक्षा किसी व्यक्ति के जीवन की वह नींव है जिस पर उसके सम्पूर्ण जीवन का भविष्य तय होता है लेकिन दुःख है की शिक्षा अधिकार अधिनियम 2009, जो की 1 अप्रैल 2010 से प्रभावी तौर पर लागु होने के बावजूद भी हमारे सपने कहीं भी वो आकार लेते नज़र नही आते जिन्हें ध्यान में रख कर यह मुहीम चालू की गयी थी।

अगर बात करे उत्तर प्रदेश की तो यहाँ पर शिक्षा दर की हालात काफी चिंताजनक है। यहाँ के प्राइमरी पाठशालाओं में गरीबों एवं निम्न तबके के बच्चे भी नहीं आते हैं जिसकी वजह पढाई का एक स्वस्थ माहौल न होना है।

प्राथमिक शिक्षा को सार्वभौमिक रूप प्रदान करना

वर्ष 2009 में भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के 86 वे संशोधन में यह निर्देशित किया गया कि 6 से 14 साल के बच्चों को मुफ़्त और अनिवार्य शिक्षा के प्रावधान को मौलिक अधिकार बनाया जाए। इसका उद्देश्य साल 2010 तक संतोषजनक गुणवत्ता वाली प्राथमिक शिक्षा को सार्वभौमिक रूप प्रदान करना था।

दम तोड़तीं व्यवस्थाएं

लड़कियों को शिक्षित करने के उद्देश्य के तहत 2004 में कस्तूरबा गांधी विद्यालय की शुरुआत की गयी। जिसके तहत लड़कियों को प्राथमिक शिक्षा अनिवार्य रूप से दी जाने की योजना बनाई गयी लेकिन 2016 तक ज़मीनी स्तर पर सर्व शिक्षा अभियान का सच एक भयावह तस्वीर प्रस्तुत करता है।

अध्यापक अयोग्य होते हैं..

विद्यालयों में नियुक्त अध्यापको की निष्क्रियता भी सबसे महत्वपूर्ण कारण है इसके पीछे। ऐसा नहीं है कि यहाँ के अध्यापक अयोग्य होते हैं लेकिन फिर भी पढ़ाई का स्तर निम्नस्तर पर है। अभिभावको का अशिक्षित होना भी एक बड़ा कारण है।

अधिकारियों को ही अपनी व्यवस्था पर भरोसा नहीं

इसलिए भी वह इस व्यवस्था के खिलाफ सामान्यता चुप ही रहते हैं। एक और वजह जिसका उल्लेख करना ज़रूरी हो जाता है वह है छात्रों के अनुपात में शिक्षकों की कमी। प्राथमिक शिक्षा के जिम्मेदारों एवं अधिकारियो की लापरवाही भरा नज़रिया इसमें चार चाँद लगाता है क्योंकि इन बड़े अफसरों के बच्चे तो महंगे कान्वेंट स्कूलो में ही पढ़ते हैं।

अंग्रेजी से कोई सरोकार नहीं

उत्तर प्रदेश में 90 प्रतिशत बच्चे यूँ तो परिषदीय स्कूलो में पढ़ते हैं, फिर भी इनकी हालत बेहद ही ख़राब है। इस बात का अंदाजा आप असर संस्था द्वारा घोषित एक रिपोर्ट से लगा सकते हैं जिसके तहत 91.2 प्रतिशत तीसरी कक्षा के बच्चे अंग्रेजी का एक वाक्य भी नही पढ़ पाते हैं।

विद्यालयो में लड़कियों के लिए शौचालय नहीं

75.8 प्रतिशत पांचवी कक्षा के बच्चे भाग का सवाल तक नही हल कर पाते हैं।साथ ही साथ 31 प्रतिशत विद्यालयो में लड़कियों के लिए शौचालय की व्यवस्था नही है जिसकी वजह से अधिक्तर लड़किया स्कूल नही जा पाती।

शिक्षको की कमी को पूरा करने में जागरूकता दिखाये सरकार

ऐसे में अभिभावक अपने बच्चों के लिए जो सुनहरे ख्वाब और सपने देखते हैं वह इन परिस्थितियों में रह कर पुरे नही हो सकते क्योंकि अंग्रेजी और मिशनरी स्कूलों में शिक्षा का जो अत्याधुनिक स्तर है उसके सामने इन प्राथमिक स्कूलों की शिक्षा और व्यवस्था रत्ती भर नहीं टिकती।

सरकार को करने होंगे ज्यादा प्रयास

आने वाले दिनों में अगर हमारी सरकार इन परिषदीय विद्यालयो में गुणवत्ता युक्त परिवेश,पर्याप्त सुविधाए और छात्रो के अनुपात में शिक्षको की कमी को पूरा करने में जागरूकता दिखाती है तो एक सुनहरे भविष्य की कल्पना की जा सकती है।

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