Anand Mohan: जानें कौन हैं आनंद मोहन, जो सड़क से संसद तक हंगामा मचाने में रहे माहिर
बाहुबली आनंद मोहन को जेल से 'आजादी' मिल गई है और इसी के बाद से बिहार में सियासी नफा-नुकसान को लेकर राजनीति गरम हो गई।

Anand Mohan: बाहुबली नेता और पूर्व सांसद आनंद मोहन जेल से रिहा हो गये। एक आईएएस (IAS) अधिकारी जी. कृष्णैया की हत्या के मामले में दोषी ठहराए जाने के बाद वह उम्रकैद की सजा काट रहे थे। गौरतलब है कि बिहार की नीतीश सरकार ने कारा अधिनियम में बदलाव करके आनंद मोहन समेत 27 कैदियों को रिहा किया है।
आनंद मोहन की रिहाई के बाद से बिहार समेत पूरे देश की राजनीति गरमा गई है। आखिर कौन हैं आनंद मोहन और क्यों उन्होंने गोपालगंज के जिलाधिकारी जी कृष्णैया की थी हत्या? और नीतीश सरकार ने क्या बदलाव किया कारा अधिनियम में? आनंद मोहन की रिहाई से किसे मिलेगा फायदा? आइए, इन्हीं प्रश्नों का उत्तर जानने की कोशिश करते हैं।
कौन हैं आनंद मोहन सिंह?
बिहार के सहरसा जिले के पचगछिया गांव का रहने वाला आनंद मोहन एक स्वतंत्रता-सेनानी के परिवार से है। 17-18 साल की कम उम्र में ही युवा आनंद जेपी आंदोलन से जुड़ गया। इमरजेंसी के दौरान दो साल तक जेल में भी रहा और बाहर आते ही अपनी दबंगई शुरू कर दी थी। बिहार के कोसी इलाके में उसकी सियासी तूती बोलने लगी थी।
साल 1980 में आनंद मोहन ने 'समाजवादी क्रांति सेना' का गठन किया। इसका मकसद था निचली जातियों के उत्थान का विरोध करना, क्योंकि वो अगड़ी जातियों का नेता बनता जा रहा था। इसी दौरान वर्चस्व को लेकर राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव और आनंद मोहन की दुश्मनी खूब चर्चाओं में रहने लगी। कहा जाता है कि उस वक्त इन दोनों की दुश्मनी के कारण कोसी क्षेत्र में गृह युद्ध जैसे हालात हो गये थे। तभी 1990 के विधानसभा चुनाव में आनंद मोहन जनता दल के टिकट पर महिषी से चुनाव लड़े और जीत गये।
मंडल आयोग का विरोधी था आनंद मोहन
ये वो समय था जब देश में मंडल आयोग की सिफारिशें लागू की गई थीं। सरकारी नौकरियों में ओबीसी को 27% का आरक्षण दिया गया था। जनता दल ने भी इसका समर्थन किया, तो आनंद मोहन ने पार्टी से दूरी बना ली क्योंकि वो इस आरक्षण का विरोधी था। इसके बाद उसने 1993 में जनता दल से अलग होकर अपनी पार्टी 'बिहार पीपुल्स पार्टी' बनाई। हालांकि, बाद में इसने समता पार्टी से हाथ मिला लिया।
साथी की हत्या ने बनाया हत्यारा?
उसी दौरान 4 दिसंबर, 1994 को बिहार के मुजफ्फरपुर में कुख्यात गैंगस्टर छोटन शुक्ला, जो आनंद मोहन की पार्टी का एक नेता, करीबी दोस्त और दाहिना हाथ कहा जाता था, उसकी हत्या कर दी गई। इस घटना से आनंद मोहन आगबबूला हो गया, पूरे मुजफ्फरपुर में तनाव का माहौल फैल गया। उसने भड़काऊ भाषण दिये और लोग प्रशासन के खिलाफ हो गये। तभी 5 दिसंबर को हजारों लोग छोटन शुक्ला की लाश सड़क पर रखकर प्रदर्शन कर रहे थे।
उसी समय गोपालगंज के तत्कालीन डीएम जी. कृष्णैया हाजीपुर से एक बैठक में शामिल होने के बाद गोपालगंज लौट रहे थे। उनकी गाड़ी पर लालबत्ती लगी थी। डीएम कृष्णैया को इस बात का जरा भी आभास नहीं था कि आगे हाइवे पर हंगामा हो रहा है। उनकी कार जैसे ही प्रदर्शनकारियों के करीब पहुंची सरकारी गाड़ी देखकर भीड़ भड़क उठी। उन्होंने कार पर पथराव शुरू कर दिया।
डीएम को गाड़ी से निकालकर मार डाला?
इस दौरान जी. कृष्णैया भीड़ को यह बताने की कोशिश कर रहे थे कि वो गोपालगंज के डीएम हैं, मुजफ्फरपुर के नहीं। लेकिन किसी ने उनकी नहीं सुनी। भीड़ ने उन्हें कार से बाहर खींचकर पहले मारा फिर गोली मार दी। डीएम जी. कृष्णैया की हत्या ने बिहार समेत पूरे देश को हिलाकर रख दिया। इस हत्या का सीधा आरोप कुख्यात बाहुबली आनंद मोहन पर लगा। आरोप था कि उन्होंने भीड़ को उकसाया था।
डीएम के ड्राइवर ने सुनाई आपबीती
उस हत्याकांड के तीन चश्मदीद थे। डीएम कृष्णैया का बॉडीगार्ड टी.एम हेम्ब्रम, दूसरा एक फोटोग्राफर पी.एल टांगरी और तीसरा उनका ड्राइवर दीपक कुमार। दीपक कुमार ने नवभारत टाइम्स को दिये एक साक्षात्कार में कहा कि 5 दिसंबर 1994 की शाम को मुजफ्फरपुर होते हुए हम सब हाजीपुर से वापस गोपालगंज जा रहे थे। तभी मुजफ्फरपुर किसी का जुलूस जा रहा था, किसका था ये उस वक्त मालूम नहीं था। तभी अचानक से हमें आगे-पीछे से कुछ लोगों ने घेर लिया और बॉडीगार्ड को गाड़ी से खींच लिया। मैंने गाड़ी को भगाया लेकिन डीएम साहब को अपने बॉडीगार्ड की चिंता थी शायद।
उन्होंने मुझे गाड़ी रोकने को कहा, गाड़ी रुकते ही भीड़ ने हमें फिर घेर लिया और मेरी गर्दन दबाने लगे। मुझे किसी ने मुक्का मारा और मेरे कान से खून आने लगा। डीएम साहब को वो खींचकर ले गये। थोड़ी देर में भीड़ चली गई, तभी मैंने पुलिस की गाड़ी देखी तो रुकवाई। आगे बढ़े तो देखा कि हमारी गाड़ी उलटी पड़ी थी और डीएम साहब खाई में गिरे थे। वहां से उनको अस्पताल लेकर गये। अगर गाड़ी नहीं रुकवाते तो डीएम साहब बच जाते।
कौन थे IAS कृष्णैया?
तेलंगाना के महबूबनगर के एक दलित परिवार में जन्में कृष्णैया के पिता कुली थे। उन्होंने परिवार को आर्थिक सपोर्ट करने के लिए अपने पिता के साथ कुली का काम शुरू किया था। साथ ही पढ़ना जारी रखा और कुछ वक्त पत्रकारिता के क्षेत्र में भी काम किया। इसके बाद वो कुछ समय के लिए अकेडमिक फील्ड में आ गए और लेक्चरर के तौर पर भी काम किया लेकिन कृष्णैया का सपना कुछ और था। उन्होंने आईएएस बनने का सपना देखा था, इसके लिए दिन रात एक कर दिया।
तभी साल 1985 में उनकी यह मेहनत रंग लाई और वे आईएएस अफसर बने। उन्हें बिहार कैडर दिया गया। कृष्णैया की पहली पोस्टिंग पश्चिमी चंपारण में हुई थी। यहां उन्होंने भूमि सुधारों पर सराहनीय काम किया था। इसके बाद उन्हें 1994 में गोपालगंज का जिलाधिकारी बनाया गया था। और इसी साल उनकी हत्या कर दी गई थी।
आनंद मोहन ने जेल से चमकाई राजनीति
इस हत्याकांड के बाद एक-दो दिन बाद ही घटना स्थल से 50 किमी दूर आनंद मोहन और उनकी पत्नी लवली आनंद को गिरफ्तार किया जाता है। पुलिस चार्जशीट में आनंद मोहन, लवली आनंद, भुटकुन शुक्ला, मुन्ना शुक्ला को आरोपी बनाया गया।
बता दें कि आनंद मोहन ने 13 मार्च, 1991 को लवली सिंह से शादी की थी। लवली स्वतंत्रता सेनानी माणिक प्रसाद सिंह की बेटी हैं। शादी के तीन साल बाद आनंद मोहन ने उपचुनाव से 1994 में लवली आनंद की राजनीति में एंट्री करा दी थी। वो वैशाली लोकसभा सीट से जीतकर पहली बार संसद पहुंच चुकी थी और ये जेल पहुंच चुके थे।
इसके बाद 1996 में लोकसभा चुनाव हुआ और आनंद मोहन अपनी बाहुबली छवि की बदौलत जेल से ही समता पार्टी के टिकट पर शिवहर से जीत गये। इसके बाद 1998 में फिर इसी सीट से चुनाव जीत गये। इसके बाद 1999 और 2004 के लोकसभा चुनाव में आनंद मोहन खड़ा हुये, लेकिन तब वो हार गये। इसके बाद दोषी साबित हो गये और चुनाव लड़ने पर रोक लग गई।
फांसी की सजा सुनाई गई
साल 2005 में बीजेपी से गठबंधन करके नीतीश कुमार दूसरी बार बिहार के मुख्यमंत्री बने थे। इसी दौरान उन्होंने आनंद मोहन मामले पर फोकस किया और 2007 में निचली अदालत ने उन्हें मौत की सजा सुनाई। आनंद मोहन देश के पहले पूर्व सांसद और पूर्व विधायक हैं, जिन्हें मौत की सजा मिली थी। हालांकि, बाद में पटना हाईकोर्ट ने दिसंबर 2008 में मौत की सजा को उम्रकैद में बदल दिया। तब सुप्रीम कोर्ट ने भी जुलाई, 2012 में पटना हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा। तब से आनंद मोहन जेल में ही थे।
आनंद मोहन के कुछ अन्य विवादित बोल
17 फरवरी 1995 को बिहार में चुनाव का माहौल था। तभी बिहार पीपल्स पार्टी के प्रमुख आनंद मोहन ने चुनाव आयोग के 'कोड ऑफ कंडक्ट' की धज्जियां उड़ा दी थी। उन्होंने कहा था कि भाड़ में जाए कोड ऑफ कंडक्ट। एक जनसभा को संबोधित करते हुए उसने कहा था मैं लात मारता हूं कोड ऑफ कंडक्ट को, हमारा मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव एक भालू है। उसको उठाकर बाहर फेंकना है। उसी दौरान उन्होंने कहा कि हमारा प्रधानमंत्री वी.पी. सिंह एक ठेपी (बोतल का ढक्कन) है और जनता दल का नेता राम विलास पासवान एक भोग विलास है।
14 जुलाई 1998 को जब सदन (संसद) में महिला आरक्षण बिल को लेकर बहस चल रही थी। तब बार-बार सदन के काम में व्यवधान डालने के कारण आनंद मोहन से स्पीकर जी.एम.सी. बालयोगी नाराज हो गये थे। बार-बार निवेदन करने पर भी आनंद मोहन चुप नहीं बैठ रहे थे, तभी स्पीकर के कहने पर उन्हें मार्शलों ने सदन से उठाकर बाहर कर दिया था। इस दौरान तीन मार्शल और आनंद मोहन के बीच जबरदस्त खींचतान हुई और उनका हाथ एक शीशे पर जा लगा, जिसकी वजह से उनका हाथ लहूलुहान हो गया था। जिसके बाद डॉक्टरों ने उन्हें देखा और अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा।
नीतीश कुमार ने बदल दिये नियम?
जनवरी 2023 में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार एक मंच से खुलेआम कहा है कि वो आनंद मोहन को बाहर लाने की कोशिश कर रहे हैं। हालांकि, उसकी रिहाई में कानून आड़े आ रहा था। तब बिहार सरकार ने 10 अप्रैल को कानून में संशोधन कर उस अड़चन को दूर किया। नीतीश सरकार ने बिहार जेल मैनुअल, 2012 के नियम 484 (I) में बदलाव किया।
इस नियम में लिखा है कि कुछ खास क्राइम वाले कैदियों की समय से पहले रिहाई नहीं हो सकती। सरकार ने इसमें से सिर्फ 5 शब्द हटाए- a civil servant on duty यानी ऑन ड्यूटी सरकारी कर्मचारी की हत्या वाली धारा हटा दी, क्योंकि आनंद मोहन इसी के तहत दोषी थे। नियमों में इस बदलाव की बाद से आनंद मोहन को अब रिहाई मिली है।
इसकी रिहाई से किसे मिलेगा फायदा?
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आनंद मोहन बिहार में राजपूत समुदाय के बड़े नेता माने जाते हैं। उनका असर शिवहर, सहरसा, वैशाली और औरंगाबाद के आसपास के इलाकों में देखने को मिलता है। इसके अलावा बिहार के राजपूत बेल्ट आरा, छपरा, रोहतास, सासाराम जैसे इलाकों में भी आनंद मोहन का असर है। बिहार में राजपूत 40 विधानसभा सीटों और 10 लोकसभा सीटों पर मजबूत असर रखते हैं।
आनंद मोहन के कद का अंदाजा इसी बात से लगा सकते हैं कि कोई भी दल खुलकर विरोध नहीं कर पा रहा है। बिहार सरकार में शामिल सात दल आनंद मोहन की रिहाई का खुलकर समर्थन कर रहे हैं तो विपक्षी बीजेपी दुविधा में फंसी हुई है और चाहकर भी विरोध नहीं कर पा रही है।












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